मनोज कुमार सिँह 'मयंक'

राष्ट्र, धर्म, संस्कृति पर कोई समझौता स्वीकार नही है। भारत माँ के विद्रोही को जीने का अधिकार नही है॥

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बगरयो बसंत है

Posted On: 13 Feb, 2013 Others में

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कूलन में, केलि में, कछारन में, कुंजन में,

क्यारिन में, कलिन में, कलीन किलकंत है |

कहे पद्माकर परागन में, पौनहू में,

पानन में, पीक में, पलासन पगंत है |

द्वार में, दिसान में, दुनी में, देस-देसन में,

देखौ दीप-दीपन में, दीपत दिगंत है |

बीथिन में, ब्रज में, नवेलिन में, बेलिन में,

बनन में, बागन में, बगरयो बसंत है |

बसंत की नैसर्गिक सुषमा ने पद्माकर ही नहीं पता नहीं कितनों को अभिभूत किया होगा? नीलकमल, मल्लिका, आम्रमौर, चम्पक और शिरीष कुसुम धारी नवजात मन्मथ बसंत पंचमी की शुभ वेला में अपने त्रैलोक्य विजयी बाणों से समग्र वसुधा में अपने शुभागमन का मंगल उद्घोष करेगा किन्तु संकेत अभी से मिलने लगे हैं| इसे अपना परिचय देने के लिए वर्तमान प्रचार तन्त्र का सहारा नहीं लेना है| यह मधुमास की वेला है, इसलिए इसमें वेलेंटाइन दिवस जैसी उच्छृंखलता नहीं| इसे प्रणय निवेदन करने के लिए चीखना नहीं होता| इसे प्यार जताने के लिए चिल्लाना नहीं पड़ता| यह विरोध के ऊपर स्वीकृति की विजय पताका है, जो झुकना नहीं जानती| यह ‘क्षणे क्षणे यन्नवतामुपैती तदेव रूपं रमणीयताया:’ से प्रेरित होकर प्रतिपल नवीन है, जो रुकना नहीं जानती| यह चरैवेति, चरैवेति का जीवन गीत है| यह ध्वंस की पीठिका पर सृजन का मधुमय संगीत है| यह केले की तरह कटता है, फिर भी फलता है| यह विरही हृदयों में संताप बन कर पलता है|

कोयलें कूकने लगी हैं| भ्रमर मँडराने लगे हैं| तितलियों का झुण्ड अमिधा, लक्षणा और व्यंजना में कलियों से मृदु संवाद कर रहा है| वसुधा ने भी षोडश श्रृंगार कर लिया है| प्रकृति वसुधा देवी के शरीर पर चन्दन, अगर और कालीयक का अंगराग मल चुकी है| दशों दिशाओं के दिग्पालों ने गगन में यायावरों की भाँती विचरते फेनकों को एकत्रित कर वसुधा देवी को जलविहार के लिए समर्पित कर दिया है| सरसों के पीत वस्त्र पहन कर पृथ्वी अपने प्राकृतिक सौंदर्य पर आत्ममुग्ध है| देवि उषा और देवि संध्या ने अरुणिमा और गोधूलि के रूप में धरती को मांग सजाने के लिए सिंदूर प्रदान किये हैं| गेंदा और गुलाब के पुष्पों से वसुंधरा ने अपने नखों, तलुवों और ओष्ठ पर महावर सजाये हैं| पुरवैया के मादक झोंकों ने धात्री की केश सज्जा की है| केसर के पुष्पों से विश्वम्भरा ने मस्तक पर तिलक धारण किया है और टेसू के पुष्पों का मुखराग लगाया है| दुग्ध धवल चन्द्रिका रत्नगर्भा की दंतराग है| देवि निशा ने अपनी समस्त कालिमा सर्वेसृहा को नेत्रों में काजल लगाने के लिए दिया है| समस्त जीवधारी मेदिनी के आभूषण हैं| पर्वत काश्यपी के कटी पर मेखला की भांति सुशोभित हो रहे हैं|

वह कौन है जिसे मदन ने मथा नहीं है और बसंतोत्सव के परिप्रेक्ष्य में तो सभी झूम उठें है| देखो, इसे अपने बाजारवाद से दूर रखना| यह कृष्ण की विभूति है ‘ऋतूनां कुसुमाकर:’,
इसमें दिव्यता है, भव्यता है, गौरव है, चेतना है और तारुण्य है| क्या तुम देखते नहीं की आबाल वृद्ध नर नारी सभी मस्ती में भर कर झूम रहे हैं किन्तु किसी ने भी दामिनी को लपकने की चेष्टा नहीं की|
मुन्नी बदनाम होती हो तो हो, शीला जवान होती हो तो हो| बसंत ने मुन्नी और शीला की आत्मचेतना का हरण नहीं किया|
बसंत सर्वव्यापी है| वह रावण की रंगशाला में भी है और राम की कुटिया में भी| वह सीता की सौम्यता में भी है और शूर्पणखा की कुत्सा में भी| वह अपर्णा के तप में भी है और रूद्र के संयम में भी| यही बसंत एक स्थान पर राग है तो दुसरे स्थान पर वैराग्य भी| यह कृष्ण के हांथों की बांसुरी है तो प्रलयंकर के नयनों से निकली प्रलयाग्नि भी| काम अंगी था तो विकलांग था, अनंग हुआ तो सर्वांग हो गया| बसंत पंचमी के मौन और होलिका दहन की कोलाहल के बाद रंगोत्सव| यह है मधुमास का दर्शन| क्या तुम्हारा समग्र सप्ताह (वेलेंटाइन वीक) हमारे एक निमिष के भी समक्ष स्थिर रह पाने में सक्षम है?



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24 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yogi sarswat के द्वारा
February 21, 2013

अत्यधिक सुन्दर अलंकारिक अभिव्यक्ति…किन्तु हिंदी का शब्दकोश लेकर बैठना होगा, बड़े कठिन शब्द दिए हैं कहीं कहीं ! …बधाई हो

    atharvavedamanoj के द्वारा
    February 26, 2013

    आभार योगी जी

    atharvavedamanoj के द्वारा
    February 18, 2013

    आभार शालिनी जी भारत माँ के विद्रोही को जीने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है …और होना भी नहीं चाहिए …आपको अच्छा लगा मैं कृतार्थ हुआ …यदि यही बात हमारे नेतृत्व वर्ग को अच्छी लगेगी तो मैं कृतकृत्य हो जाऊँगा ..वंदे मातरम

Dr. Rajeev Ranjan के द्वारा
February 17, 2013

अत्यधिक सुन्दर अलंकारिक अभिव्यक्ति…किन्तु हिंदी का शब्दकोश लेकर बैठना होगा…बधाई हो

    atharvavedamanoj के द्वारा
    February 18, 2013

    इतना कठिन भी नहीं है डा. साहब …बस थोडा सा ध्यान देकर पढेंगे तो सब कुछ समझ में आ जाएगा…सधन्यवाद वंदे मातरम

Ravinder kumar के द्वारा
February 17, 2013

महोदय, सादर प्रणाम. ऋतुराज के वासंती अंकन के लिए आपको बधाई.

    atharvavedamanoj के द्वारा
    February 18, 2013

    आभार रविन्द्र भाई

Ajay Verma के द्वारा
February 17, 2013

वाह क्या बात है….बसंत ऋतू की मनोहारी प्रस्तुति के लिए ढेरों बधाइयाँ…प्रश्न का उत्तर नकारात्मक ही है

    atharvavedamanoj के द्वारा
    February 18, 2013

    आभार अजय वर्मा जी

vasudev tripathi के द्वारा
February 16, 2013

बहुत ही उत्कृष्ट आलंकारिक वर्णन मनोज जी.! प्रकृतिक और बनावटी के मध्य के विभेद को सहजता से स्वसिद्ध करता प्रशंसनीय आलेख! हार्दिक साधुवाद।

    atharvavedamanoj के द्वारा
    February 17, 2013

    प्रिय वासुदेव भाई…उत्साहजनक प्रतिक्रिया हेतु कोटिशः आभार…वैसे भी सदाकत छुप नहीं सकती बनावट के उसूलों से की खुसबू आ नहीं सकती कभी कागज़ के फूलों से …बनावटी सुगंधि तो अस्थायी ही होती है

आर.एन. शाही के द्वारा
February 16, 2013

बसन्त को बसन्त की तरह ही प्रस्तुति देना अत्यन्त सराहनीय है मनोज जी । शास्त्रीय-सांस्कृतिक संगम पर ॠतुराज के पवित्र स्नान का सा आभास मिल रहा है । बधाई !

    atharvavedamanoj के द्वारा
    February 16, 2013

    आदरणीय शाही जी आपकी प्रोत्साहक प्रतिक्रिया पाकर अभिभूत हुआ…बसंत के शास्त्रीय वर्णन में हमारे पूर्व पुरुषों ने जिस तरह का योगदान दिया है उसके समक्ष मेरा यह आलेख नगण्य है..फिर भी एक अकिंचन प्रयास पर सभी का अनुमोदन पाकर मैं धन्य हुआ हूँ …वंदे मातरम

alkargupta1 के द्वारा
February 15, 2013

वासंती रंगों में सराबोर वसंत के सौन्दर्य का सुन्दर चित्रण ! आलेख की अंतिम पंक्ति का उत्तर मेरी दृष्टि में नकारात्मक है…

    atharvavedamanoj के द्वारा
    February 16, 2013

    आदरणीय अलका जी..प्रतिक्रिया हेतु आभार..जिसे भी सौम्यता और सहजता से प्रीति होगी वह आलेख के अंतर्गत उठाये गए प्रश्न का नकारात्मक उत्तर ही देगा…क्योंकि उसे सकारात्मक होने का तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता

chaatak के द्वारा
February 15, 2013

भाई मयंक जी, बसती रंग से रंगा बसंत का ये बासंती लेख और उस पर ये खूबसूरत अलंकारिक उद्धरण| अति सुन्दर, अति सुन्दर! बधाई हो!

    atharvavedamanoj के द्वारा
    February 16, 2013

    स्नेही चातक जी ..सादर वंदे मातरम आपकी मित्रतापूर्ण प्रतिक्रिया पाकर गदगद हो गया…आभार

ashvinikumar के द्वारा
February 14, 2013

प्रिय अनुज .. चार बांस चौबीस गज अंगुल अष्ट प्रमाण ता ऊपर सुल्तान है मत चूको चौहान ,,,यही समय है अभी नही तो कभी नही प्रणो देवी सरस्वती वाजेभिर्वजिनीवती धीनामणित्रयवतु,,,माँ सरस्वती इस बसंत के पावन पर्व पर विद्वता की प्रखरता एवं पराकाष्ठा से भारतीयों को भारतीय बना दे इसी शुभ कामना के साथ …….जय भारत

    atharvavedamanoj के द्वारा
    February 16, 2013

    आदरणीय अग्रज… आह्वान करती हुई प्रतिक्रिया पाकर कृतार्थ हुआ…सरस्वती सरस है और भारत की भारती हैं..देश, काल और परिस्थितियां भारत के लिए प्रतिकूल सहीं किन्तु निराशाजनक नहीं है ….शीघ्र ही अरुणोदय होगा ….हर हर महादेव

nishamittal के द्वारा
February 14, 2013

बसंत महिमा और बासंती सौन्दर्य जो प्रकृति स्वयम बिखेरती है,धरा पर, बहुत सुन्दर और मनोहारी वर्णन शुभकामनाएं ,वेलेंतायीं दिवस बाज़ार से ही उपजा है और उसको इतने विज्ञापन की जरूरत है,पर दुःख है बाज़ार की ओर भागता जनमानस

    atharvavedamanoj के द्वारा
    February 16, 2013

    आदरणीय निशा जी..उत्साहजनक प्रतिक्रिया के लिए सादर अभिवादन..बाजार क्षणिक है स्थायी नहीं…यस्य पार्श्वे टका नास्ति हाटके टकटकायते की तरह जब धन समाप्त हो जाता है तो व्यक्ति बाजारवाद छोड़कर आत्मचिंतन की ओर उन्मुख होता है और यही स्थायी भी है

jlsingh के द्वारा
February 14, 2013

नहीं…नहीं, कदापि नहीं!

    atharvavedamanoj के द्वारा
    February 14, 2013

    सहमति व्यक्त करती प्रतिक्रिया हेतु आभार…वंदे मातरम


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