मनोज कुमार सिँह 'मयंक'

राष्ट्र, धर्म, संस्कृति पर कोई समझौता स्वीकार नही है। भारत माँ के विद्रोही को जीने का अधिकार नही है॥

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राष्ट्र धर्म पर जीवन वारो

Posted On: 12 Nov, 2012 में

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क्षणभंगुर अपने जीवन की बाती बना – बना कर बारो |

सबकुछ केवल राष्ट्र – धर्म का, राष्ट्र – धर्म पर जीवन वारो ||

चलो करोड़ो दीप जलाएँ,

इस मरघट में रौनक लाएँ |

हम धरती के टिम – टिम तारे –

महासूर्य को शौर्य दिखाएँ ||

रश्मिरथी हम ज्योतिपुत्र हैं, तमस म्लेच्छ को जम कर मारो |

क्षणभंगुर अपने जीवन की बाती बना – बना कर बारो ||

सतत प्रवाहित शाश्वत धारा,

युग आते जाते रहते हैं |

हम अक्षय अनंत जीवन हैं,

जो डरते हैं वे मरते हैं ||

छल – बल – कल केवल मात्राएँ, जीत लक्ष्य है कभी न हारो |

क्षणभंगुर अपने जीवन की बाती बना – बना कर बारो ||

इस कपाल गह्वर में जाने

कितने कापालिक रहते हैं |

महाभैरवी के प्राणों में –

महारुद्र बन कर जलते हैं ||

इनका केवल एक मंत्र है, घृणा कभी ना मन में धारो |

क्षणभंगुर अपने जीवन की बाती बना – बना कर बारो ||

राष्ट्रोत्सव दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं | हर हर महादेव ||



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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
November 15, 2012

रश्मिरथी हम ज्योति पुत्र हैं , तामस म्लेच्छ को जमकर मारो !…. वाह-वाह !……. अपूर्व लय , अपूर्व प्रवाह , उत्तम कोटि का शब्द-संयोजन ! उत्कृष्ट छांदस रचना के लिए हार्दिक आभार ! श्रद्धेय वर ! आप के लिए दीपोत्सव की मेरी और से अशेष मंगल कामनाएं सेवा में समर्पित हैं ! पुनश्च !!

Santlal Karun के द्वारा
November 14, 2012

बलिपंथी राष्ट्रीयता की प्रभावपूर्ण संवेदनात्मक कविता; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! ज्योतिपर्व की मंगल कामनाएँ ! “इस कपाल गह्वर में जाने कितने कापालिक रहते हैं | महाभैरवी के प्राणों में – महारुद्र बन कर जलते हैं || इनका केवल एक मंत्र है, घृणा कभी ना मन में धारो | क्षणभंगुर अपने जीवन की बाती बना – बना कर बारो ||”

    jlsingh के द्वारा
    November 15, 2012

    “इनका केवल एक मंत्र है, घृणा कभी ना मन में धारो | क्षणभंगुर अपने जीवन की बाती बना – बना कर बारो ||” बहुत ही सुन्दर राष्ट्र प्रेम से ओत प्रोत!


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