मनोज कुमार सिँह 'मयंक'

राष्ट्र, धर्म, संस्कृति पर कोई समझौता स्वीकार नही है। भारत माँ के विद्रोही को जीने का अधिकार नही है॥

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युपीटीईटी : अंधेर नगरी, चौपट राजा

Posted On: 27 Jul, 2012 Others,लोकल टिकेट में

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ली फिगारो नामक फ्रांसीसी समाचार पत्र में समाजवाद की १५०० से भी अधिक परिभाषाएँ प्रकाशित हुई| ई. एम. जोड ने चिढ़कर लिखा,’’ समाजवाद एक ऐसी टोपी के समान है, जिसकी शक्ल बिगड चुकी है, क्योंकि इसे लगभग सभी सिरों ने धारण किया है|” जब सात समुन्दर पार कर पश्चिम का समाजवाद भारत में आया तब भी स्थितियां इतनी बुरी नहीं थी की समाजवाद से घृणा किया जाय, यहाँ तक की हमारे संविधान ने भी समाजवाद की अवधारणा को मुक्त हस्त से अपनाया|राम मनोहर लोहिया, राजनारायण, जय प्रकाश नारायण, कर्पूरी ठाकुर सभी ने समाजवादी आदर्श को अपने व्यक्तित्व में जिया|अन्याय के विरुद्ध, आतंक के विरुद्ध, शोषण के विरुद्ध इनका आंदोलन अविराम चलता रहा|सम्पूर्ण क्रान्ति की वकालत करने वालों ने अपना सारा जीवन एक पाँव रेल में और एक पाँव जेल में बिता दिया|आज स्थितियां बदल चुकी हैं|अंबानी समाजवाद बन चुके हैं|पूरब के छोकरे ने मर्रे और डार्लिंग की धारा में नहा कर गंगा में अपना मूत्र विसर्जित कर दिया है|

बात युपीटीईटी के सन्दर्भ में हो रही है, हो सकता है कि ये बातें कतिपय मीडिया वालों को भी बुरी लगे, हो सकता है कि निहित स्वार्थ वाले गाली-गलौज पर उतर आये किन्तु इस भय से सत्य और न्याय के पथ से तो विचलित नहीं हुआ जा सकता और सत्य यह है कि पूर्ववर्ती सरकार द्वारा बेसिक शिक्षा अधिनियम के मानकों को बदलने का संकेत देकर वर्तमान सरकार ने योग्यता के मुँह पर जिस तरह का तमाचा जड़ा है उसकी आवाज आने वाले कई युगों तक भविष्य के अभ्यर्थियों को मुक्त प्रतिस्पर्धा के लिए हतोत्साहित करती रहेगी|केंद्रीकृत व्यवस्था को बदल कर विकेन्द्रीकृत व्यवस्था को पुनर्स्थापित करना कहाँ का समाजवाद है?२३ जुलाई को उत्तर प्रदेश के राज्य मंत्री परिषद ने प्रदेश में बेसिक शिक्षा के सन्दर्भ में दो बड़े निर्णय लिए – पहला निर्णय युपीटीईटी को मात्र पात्रता माना गया|दूसरे निर्णय के अंतर्गत प्रदेश के प्राथमिक विद्यालयों को किसी तरह नकली ऑक्सीजन देकर महज जिन्दा रखने वाले शिक्षा शत्रुओं को नियमित अध्यापक के रूप में नियुक्त करने का तुगलकी फरमान सुनाया गया|विधि के आलोक में दोनों ही निर्णय आत्मघाती हैं और प्रदेश की प्राथमिक शिक्षा प्रणाली में श्री श्री रविशंकर के अनुसार नक्सलीकरण का वृक्षारोपण करने के समान हैं|

मंत्रिपरिषद के इस निर्णय की गाज सर्वप्रथम उन मेधावी छात्रों पर पड़ेगी जिनका अकादमिक कमजोर है किन्तु प्रतिस्पर्धात्मक रूप से जिनका मुकाबला किया ही नहीं जा सकता और अकादमिक की बात हमारे मूर्खमंत्री के दिमाग में इसीलिए आई क्योंकि परीक्षा पास करने वाले छात्रों की संख्या लाखों में है|पूर्ववर्ती सरकार ने यहीं पर चूक कर दी|परीक्षा का स्वरूप इतना लचर रखा की सारे घास भूंसे पास हो गए|एक राजनैतिक कुचक्र रचकर बिकी हुई मीडिया के माध्यम से इस परीक्षा में धांधली के झूठे ख़बरों को प्रकाशित किया गया|कौन नहीं जानता कि इस देश में मीडिया फिक्सिंग भी हुआ करती है?अमर उजाला नाम के प्रतिदिन निंदनीय समाचार पत्र ने पत्रकारिता की मर्यादा को तार तार करके रख दिया|युपीटीईटी परीक्षा के बाद से इस समाचार पत्र ने लगभग प्रतिदिन स्थायी स्तंभ की भांति उत्तर प्रदेश की प्राथमिक शिक्षा में शिक्षक चयन संबंधी नितांत काल्पनिक गल्प ख़बरों को गढना प्रारम्भ कर दिया|सबसे पहले इसी समाचार पत्र ने पात्रता और अर्हता में अतार्किक,विधि विरुद्ध विभेद स्थापित कर शब्दों के माध्यम से एक सामान्य अभ्यर्थी ही नहीं बल्कि जनसामान्य को भ्रमित करने की चेष्टा की और शासन के नीतिगत फैसलों कों प्रभावित करने में कोई भी कोर कसर नहीं रख छोड़ा|लगता है इन छद्म पत्रकारों ने टीईटी के सन्दर्भ में लंबे लेख लिखने और झूठे खबर गढ़ने के चक्कर में ३१ मार्च २०१० को भारत सरकार द्वारा प्रकाशित भारत के राजपत्र को पढ़ने की जहमत भी नहीं उठाई जिसमे अन्धों को भी दिखाई देने वाले स्पष्ट शब्दों में लिखा गया है –

अर्थात-

स्पष्ट है कि भारत सरकार के राज पत्र में ही पात्रता और अर्हता में स्पष्ट अंतर करते हुए राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद को पात्र (Qualified) अध्यापक चयन के सन्दर्भ में अर्हताओं (Eligibility) का निर्धारण करने वाले शैक्षिक प्राधिकरण के रूप में प्राधिकृत किया गया है|यदि टीईटी अर्हताकारी न होती तो इसे teacher’s eligibility test के स्थान पर teacher’s qualifying test के नाम से संबोधित किया जाता|यह साक्ष्य तो उनके लिए है जो पुस्तक को मात्र उसके आवरण से समझते है और बिना माथापच्ची किये फौरी तौर पर कोई निर्णय ले लेते हैं|एन.सी.टी.ई. द्वारा टीईटी के सन्दर्भ में राज्यों को दिए गए दिशा निर्देश को ध्यानपूर्वक पढ़ने पर अनेक ऐसे तथ्य सामने आते हैं जो टीईटी प्राप्तांको को शिक्षक चयन का आधार बनाये जाने के पक्ष में हैं और इस सन्दर्भ में सम्बंधित राज्य सरकारों को स्पष्ट रूप से निर्देशित भी करते हैं, उदहारण के लिए –

3. The rationale for including the TET as a minimum qualification for a person to be eligible for appointment as a teacher is as under:

i. It would bring national standards and benchmark of teacher quality in the recruitment process;

ii. It would induce teacher education institutions and students from these institutions to further improve their performance standards;

iii. It would send a positive signal to all stakeholders that the Government lays special emphasis on teacher quality

टीईटी के सन्दर्भ में एन.सी.टी.ई. द्वारा जारी दिशानिर्देश का तीसरा पाराग्राफ कहता है की शिक्षक के रूप में नियुक्त होने के लिए एक व्यक्ति के लिए न्यूनतम योग्यता और चयन के लिए अर्हता बनाये जाने के पीछे निम्नलिखित तर्क हैं –

१)       यह चयन प्रक्रिया में शिक्षक गुणवत्ता के सन्दर्भ में राष्ट्रीय मानकों और मानदंडों को स्थापित करेगा|

२)       यह अध्यापक शिक्षण संस्थाओं और इन संस्थाओं के विद्यार्थियों को अपने निष्पादन स्तर को लगातार सुधारने हेतु प्रेरित करेगा|

३)       यह शिक्षा के समस्त हिस्सेदारों को एक सकारात्मक संकेत देगा की सरकार शिक्षक गुणवत्ता के सन्दर्भ में विशेष जोर दे|

क्या अब भी टेट अर्ह्ताकारी नहीं है?

हम जानते हैं की शिक्षा का सार्वभौमीकरण सर्व शिक्षा अभियान का मूल लक्ष्य है और यह उत्तर प्रदेश में सत्र २००६-०७ से ही लागू है|एन. सी. टी. ई. द्वारा जारी दिशानिर्देश शिक्षक गुणवत्ता के सन्दर्भ में राष्ट्रीय मानकों और मानदंडों को स्थापित करना चाहता है और यह तभी सम्भव है जब टीईटी प्राप्तांको को चयन का आधार बनाया जाय।अगर एकाडेमिक प्राप्तांको को चयन का आधार बनाया जायेगा तो विभिन्न बोर्डों की व्यहारिक विसंगतियाँ राष्ट्रीय मानकों और मानदंडों को स्थापित होने ही नहीं देंगी।अध्यापक शिक्षण संस्थाएं अपनी और अपने विद्यार्थियों के निष्पादन स्तर को सुधारने के लिए तभी प्रेरित होंगी जब उन्हें इस बात का विश्वास हो जाएगा की उनके द्वारा दिए गए प्राप्तांक अंतिम नहीं हैं और चयन के स्तर पर हमारे विद्यार्थियों को टीईटी नाम की एक अन्य अग्निपरीक्षा से गुजरना होगा|एन. सी. टी. ई. द्वारा जारी दिशानिर्देश के तीसरे पैराग्राफ के तीसरे बिंदु में अध्यापक शिक्षा के सन्दर्भ में सरोकार रखने वाले समस्त बुद्धिजीवीयों से यह अपील की गयी है कि वे सरकार पर दबाव डाल कर शिक्षक गुणवत्ता के सन्दर्भ में जोरदार पैरवी करे|

एन. सी. टी. ई. द्वारा जारी दिशानिर्देश के पैरा ९ में वर्णित अनुच्छेद ९ ब स्पष्ट रूप से उद्घोषित करता है की -

9 A person who scores 60% or more in the TET exam will be considered as TET pass. School managements (Government, local bodies, government aided and unaided)

(a) may consider giving concessions to persons belonging to SC/ST, OBC, differently abled persons, etc., in accordance with their extant reservation policy;

(b) should give weightage to the TET scores in the recruitment process; however, qualifying the TET would not confer a right on any person for recruitment/employment as it is only one of the eligibility criteria for appointment.

सरकार, स्थानीय संस्थाएं, वित्तविहीन अथवा वित्तीय मान्यताप्राप्त सरकारी संस्थान –

ब) (अध्यापक) चयन प्रक्रिया में टेट प्राप्तांकों का अधिभार प्रदान करेंगे (यह अधिभार १ प्रतिशत से लेकर शत प्रतिशत तक हो सकता है किन्तु अधिभार देना ही होगा) हाँ, ९ अ के अनुसार राज्य सरकार आरक्षित वर्ग को नियमानुसार छूट अवश्य दे सकती है|

एन. सी. टी. ई. द्वारा जारी दिशानिर्देश के अनुच्छेद ११ के अनुसार –

11. A person who has qualified TET may also appear again for improving his/her

Score. अर्थात टेट उत्तीर्ण व्यक्ति श्रेणी सुधार के लिए टेट परीक्षा में पुनः सम्मिलित हो सकता है|

अब यदि इन परीक्षाओं का कोई महत्व न होता अथवा यदि इन परीक्षाओं की प्रकृति बीमा अभिकर्ताओं की तरह मात्र पात्रता के लिए होती तो श्रेणी सुधार के लिए इनमें सम्मिलित होने की कोई आवश्यकता ही न समझी जाती| क्या बीमा अभिकर्ताओं के संबंध में ट्राई के भी प्रावधान कुछ ऐसे ही हैं? माफ कीजियेगा ट्राई, वर्तमान सरकार की तरह पागल नहीं है|

एन. सी. टी. ई. द्वारा जारी दिशानिर्देश के अनुच्छेद १४ के अनुसार –

14 The appropriate Government conducting the Test shall award a TET Certificate to

all successful candidates. The certificate should contain the name and address of the

candidate, date of birth, Registration No. year/month of award of Certificate, marks

obtained in each Paper, class level of its validity (Class I to V, class VI to VIII or both),

and, in case of classes VI to VIII, the subject area (Science and Mathematics, Social

Studies, etc.).

अर्थात परीक्षा आयोजित करने वाली सक्षम सरकारें समस्त सफल अभ्यर्थियों कों टेट प्रमाणपत्र प्रदान करेंगी|दिए जाने वाले प्रमाणपत्रों में अभ्यर्थी का नाम, पता, जन्मतिथि, पंजीकरण संख्या, प्रमाण पत्र देने का वर्ष/मास, प्रत्येक प्रश्न पत्र में प्राप्त किये गए अंक, इसकी वर्ग वैधता स्तर (कक्षा १ से ५, कक्षा ६ से ८, अथवा दोनों) और कक्षा ६ से ८ की स्थिति में, विषय क्षेत्र (विज्ञान और गणित, सामाजिक अध्ययन इत्यादि) का उल्लेख होना चाहिए|

माध्यमिक शिक्षा परिषद द्वारा हमें दिए गए युपीटीईटी प्रमाणपत्रों में एन.सी.टी.ई. द्वारा जारी दिशानिर्देशों का सम्यक अनुपालन हुआ है|प्रश्न यह उठता है की यदि तत्कालीन राज्य सरकार द्वारा आयोजित टीईटी परीक्षा अर्ह्ताकारी नहीं थी तो हमारे प्रमाण पत्रों में इन मूलभूत जानकारियों की क्या उपयोगिता है? प्रत्येक प्रश्न पत्र में अभ्यर्थी द्वारा प्राप्त अंकों को प्रमाण पत्र में दर्शाने के पीछे कुछ तो तर्क होना ही चाहिए? प्रमाण पत्रों में वर्ग वैधता स्तर का क्या प्रयोजन है? (हमारे मामले में कक्षा ६ से ८ के लिए माध्यमिक शिक्षा परिषद द्वारा अलग से प्रमाण पत्र निर्गत किया गया था)

जिस प्रकार उन्नीकृष्णन बनाम आंध्रप्रदेश और अन्य के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के विद्वान न्यायाधीश ने सन १९९३ में संविधान के राज्य के नीति निर्देशक तत्व के अंतर्गत आने वाले अनुच्छेद ४१ और ४५ को मिलाकर यह कहा था कि –

“The citizens of this country have a fundamental right to education. The said right flows from Article 21. This right is, however, not an absolute right. Its content and parameters have to be determined in the light of Articles 45 and 41. In other words, every child/citizen of this country has a right to free education until he completes the age of fourteen years. Thereafter his right to education is subject to the limits of economic capacity and development of the State.”

अर्थात ‘’ इस देश के नागरिकों के पास शिक्षा का मौलिक अधिकार है| वर्णित अधिकार अनुच्छेद २१ से निसृत होता है| हालांकि, यह अधिकार, पूर्ण अधिकार नहीं है| इसके मापदंड और निहितार्थ अनुच्छेद ४१ और ४५ के प्रकाश में निश्चित किये जाने चाहिए| दूसरे शब्दों में, इस देश के प्रत्येक बालक/नागरिक के पास शिक्षा का मौलिक अधिकार है, जब तक कि वह १४ वर्ष की आयु पूर्ण नहीं कर लेता| उसके बाद उसके शिक्षा का अधिकार राज्य के विकास और उसकी आर्थिक क्षमता की सीमाओं पर निर्भर है|

ठीक उसी प्रकार एन.सी.टी.ई. द्वारा जारी दिशानिर्देशों के अनुच्छेद ३(१),(२),(३), अनुच्छेद ९ ब, अनुच्छेद ११, अनुच्छेद १४ और इस सन्दर्भ में भारत सरकार द्वारा ३१ मार्च २०१० के राजपत्र  द्वारा यह स्पष्ट है की टीईटी प्राप्तांकों के आधार पर चयन विधि सम्मत है और इस आधार को बदलने का सीधा सादा अर्थ है की हमारी देश के संविधान और अन्य विधिक संस्थाओं के प्रति तनिक भी श्रद्धा नहीं है और यदि यह कार्य बहुमत की किसी सरकार द्वारा किया जाता है तो विधिक और बुद्धिजीवी खेमे में इसकी तीव्र भर्त्सना होनी चाहिए और न केवल विपक्षी दल बल्कि शिक्षा के सरोकार से जुड़े समस्त संस्थाओं द्वारा सरकार के विरुद्ध निंदा प्रस्ताव पारित किया जाना चाहिए|साथ ही प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया को इस मामले कों गंभीरता पूर्वक लेते हुए जनहित में दोषी पत्रकारों के विरुद्ध कठोर दंडात्मक कार्यवाही करना चाहिए ताकि कोई भी नवप्रवेशी पत्रकार पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रवेश करने से पूर्व सौ बार सोचे और लोकतंत्र के इस चौथे स्तम्भ की मर्यादा अक्षुण्ण बनी रहे|



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