मनोज कुमार सिँह 'मयंक'

राष्ट्र, धर्म, संस्कृति पर कोई समझौता स्वीकार नही है। भारत माँ के विद्रोही को जीने का अधिकार नही है॥

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लोकतंत्र की समाजवादी लाठी

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प्रदेश में समाजवादी सरकार का गठन होते ही गुंडागर्दी का बढ़ना तय था और अभी सरकार का गठन हुए महीने भर भी नहीं हुए है की वार्ड स्तर तक के गुंडे अपने अपने घरौंदों से बाहर निकल आये हैं|सूबे में पूर्व सरकार द्वारा विज्ञापित रिक्तियों पर संकट के बादल मडराने लगे हैं और बहुमत से चुनी गयी यह तानाशाह सरकार सत्ता सँभालते ही जिस तरीके से मायावती सरकार द्वारा किये गए सभी निर्णयों को पलटती जा रही है उससे समाजवादियों का बसपाइयों के प्रति विद्वेष साफ़ दृष्टिगोचर होने लगा है|यही नहीं,पूर्व निर्णयों को पलटने किस आपाधापी में उचित और अनुचित के समस्त सन्दर्भ बेमानी हो गए हैं|२० मार्च को लखनऊ में जो कुछ भी हुआ उसने समस्त मानवता को लज्जित कर दिया है|भट्टा परसौल मामले को लेकर आसमान सर पर उठा लेने वाले समाजवादियों ने २० मार्च को लखनऊ में दमन का नंगा नाच किया|अपनी चुनावी सभा में बिना किसी ठोस कारण के मात्र राजनैतिक विद्वेष की भावना से प्रेरित होकर टीइटी को निरस्त कर देने की धमकी देने वाले तथाकथित युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पुलिस ने सरेआम गुंडई का परिचय दिया|फेसबुक और अन्य सामाजिक नेटवर्क वाली साइटों से सन्देश प्राप्त कर सूबे के सभी ७५ जिलों के टीइटी उत्तीर्ण अभ्यर्थी १९ मार्च की रात से ही विभिन्न साधनों द्वारा लखनऊ पहुँचने लगे थे,१० बजे तक लगभग १५ हजार अभ्यर्थियों का अपार जनसमुद्र  चारबाग स्टेशन पर पहुँच चुका था|दिन के १० बजे तक इक्का दुक्का पुलिस वालों को छोड़कर पूरे स्टेशन पर कहीं कोई पुलिसकर्मी नहीं था|दिन के साढ़े दस बजे समस्त अभ्यर्थियों ने दो कतारों में प्रस्तावित सभास्थल झूलेलाल पार्क की ओर प्रस्थान किया|जुलूस के आगे २०-२२  की संख्या में महिलायें थी|जुलूस अभी चारबाग स्टेशन से कुछ ही आगे बढा था की लगभग ५० पुलिसकर्मियों ने जुलूस को आगे से घेरना प्रारम्भ कर दिया|महिलाओं के साथ कोई अभद्रता न हो पाए इसलिए जुलूस में पीछे चलने वाले कुछ अभ्यर्थी (जिनमे से एक मैं स्वयं था), आगे आ गए|प्रारम्भ में पुलिसकर्मियों का रवैया सहानुभूतिपूर्ण था और हमने जो समस्याएं उनके सामने रखी, उन्होंने उन सभी समस्याओं के निराकरण का हमें विश्वास दिलाया|हम शांतिपूर्ण तरीके से आगे बढ़ रहें थे और हमारा उद्देश्य भी किसी का अहित करना नहीं था |परिस्थितियों ने करवट लिया उन्होंने हमारी मांगे नकारनी शुरू कर दी और हम पर जबरदस्ती झूलेलाल पार्क (प्रस्तावित सभास्थल)  की ओर चले जाने का दवाब बनाने लगे|हमने भी उन्हें विश्वास दिलाया की आप हमें शांतिपूर्ण तरीके से विधान सभा भवन होते हुए झूलेलाल पार्क जाने की अनुमति प्रदान करें|इस पर अचानक एक पुलिसकर्मी तैस में आ गया और उसने विद्यासागर नामक बनारस के एक अभ्यर्थी के पैर पर डंडे से प्रहार किया|अभ्यर्थी संयत रहें और शांतिपूर्वक निर्धारित मार्ग पर चलते रहें|बीच बीच में पुलिसकर्मियों से संवाद भी होता रहा और हम उनसे अपनी समस्या प्रखर तरीके से व्यक्त करते रहें|इसी मध्य  ACM चतुर्थ का आगमन हुआ,अभ्यर्थियों ने इसे एक शुभ संकेत माना और विधान सभा भवन होते हुए झूलेलाल पार्क जाने की मांग करते रहें|ACM महोदय ने भी इस मांग को सिरे से खारिज कर दिया और अभ्यर्थियों पर वापस चले जाने का दवाब बनाने लगे|इतने में कुछ महिला पुलिसकर्मी भी आ गयी और वे महिलाओं पर वापस लौट जाने का दवाब बनाने लगी|मैंने और अन्य मित्रों ने इस मांग को मानने से इनकार कर दिया तथा मुख्यमंत्री को बुलाये जाने,अथवा विधान सभा भवन होते हुए झूलेलाल पार्क जाने अथवा मुख्यमंत्री द्वारा हमारी समस्त मांगे मान लिए जाने का लिखित आश्वासन दिए की मांग रखी (तीसरी मांग मैंने रखी थी)|हमने यह आश्वासन दिया की हमारी मांगों के पूरा होते ही हम वापस अपने घरों की ओर लौट जायेंगे|इस पर ACM महोदय का कहना था की आप शांतिपूर्वक झूलेलाल पार्क चलो हम आश्वासन देते हैं की हम आपकी मुख्यमंत्री जी से बात करवा देंगे|मैंने ACM महोदय से इस बात को लिखित रूप में माँगा तो उन्होंने मुझसे पेन और कागज़ माँगा|मैंने ACM महोदय को अपना पेन दिया और कोई सादा पन्ना तत्काल उपलब्ध न होने की दशा में एक अभ्यर्थी से तख्ती लेकर उन्हें लिखने को दिया|ACM महोदय ने लिखा, ‘आप लोगों के शांतिपूर्वक झूलेलाल पार्क चलने की दशा में सक्षम स्तर के अधिकारी से  आपकी वार्ता कराई जायेगी’ मैंने इस पर आपत्ति की और एक नया प्रस्ताव रखा जिसमें मैंने कहा की यदि आप बेसिक शिक्षा मंत्री से भी इस सन्दर्भ में हमारी बात करवा देंगे तो हम शांतिपूर्वक वापस लौट जायेंगे|मेरी इस मांग को वहाँ पर उपस्थित कुछ टीइटी अभ्यर्थियों ने खारिज कर दिया|जनदबाव में मुझे भी उनकी बात माननी पड़ी और उपस्थित जन समूह “we want CM,we want CM” के नारे लगाने लगा|नेपथ्य में कुछ लोग न्याय प्राप्ति की आशा में समाजवादी पार्टी जिंदाबाद के भी नारे लगाने लगे|अभ्यर्थियों को यह विश्वास था की अखिलेश युवा हैं इसलिए हमारी पीड़ा को समझेंगे|उन्हें यह भी लगता था की प्राथमिक शिक्षक के पुत्र होने के नाते शायद अखिलेश को प्रदेश में प्राथमिक शिक्षा की वर्तमान स्थिति का कुछ ज्ञान होगा और वे ऐसा कुछ नहीं करेंगे जो उनकी छवि को कहीं से भी विकृत करती हो|तमाम जद्दोजहद के बावजूद अभ्यर्थियों ने अपना धैर्य नहीं खोया और वे अंत तक “पुलिस हमारा भाई है,उससे नहीं लड़ाई है’ कहते रहें|वंदे मातरम,इन्कलाब जिंदाबाद,भारत माता की जय कुछ लोगों को रास नहीं आते और हमारी टोली शिक्षकों की टोली होने के नाते इन राष्ट्रवादी मन्त्रों का भी उच्चारण कर रही थी|शासन और प्रशासन से मानमनौव्वल का क्रम बदस्तूर जारी था|अचानक हजरतगंज चौराहा उस अमानवीय और नृशंस घटना का साक्षी बना जिसे देख कर इंसान तो इंसान शैतान की भी रूह काँप जाय|वहाँ उपस्थित पुलिस वालों ने बिना कोई पूर्व सूचना दिए पानी के फव्वारे छोड़े और तब तक लाठियां बरसाते रहें जब तक अभ्यर्थियों को घटना स्थल से डेढ़ किलोमीटर दूर तक खदेड़ नहीं दिया|पहली बार मुझे ज्ञात हुआ की पानी से भी घातक श्रेणी की चोट लगा करती है|अभ्यर्थियों को बर्बर तरीके से ढूढ़ ढूढ़ कर पीटा गया,यहाँ तक की जूलूस में आगे चल रही महिला अभ्यर्थियों को भी नहीं बख्शा गया और उन्हें महिला पुलिसकर्मियों के स्थान पर पुरुष पुलिसकर्मियों ने दौड़ा दौड़ा कर मारा|सभ्यता को लज्जित करते हुए महिलाओं के सामने ही महिला और पुरुष दोनों ही अभ्यर्थियों को महिलाओं को लजाने वाली गालियों से नवाजा गया|जिस देश में शिक्षकों को खुलेआम सड़क पर खदेड कर मारा जाता हो उस देश में आप कितने भी सर्व शिक्षा अभियान क्यों न चला लें,सम्पूर्ण साक्षरता के लक्ष्य को कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता|क्या यह उस देश की झांकी है जिसे कभी विश्वगुरु कहा जाता था और क्या यह उस सूबे की शासन व्यवस्था है जो भारत का सर्वाधिक जनसँख्या वाला राज्य होने के साथ ही सदा से ही भारतीय राजनीति के केन्द्र में रहा है?

मैंने भी खायी है पुलिस की लाठी

मैंने भी खायी है पुलिस की लाठी



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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jamuna के द्वारा
March 22, 2012

यह लाठी तो बरसने ही थे.  उत्तर प्रदेश की जनता को सभांलना आसमान से तारे तोडने के समान है. http://jamuna.jagranjunction.com/

chaatak के द्वारा
March 21, 2012

स्नेही मयंक जी, सर्वप्रथम तो राष्ट्रवाद की देह पर तथाकथित समाजवाद की लाठी खाने पर आपको मैं हार्दिक बधाई देता हूँ| शिक्षक सिर्फ जरियाने और लतियाने की चीज़ रह गए हैं इसे हर वह व्यक्ति जानता है जो गलती से शिक्षक बन गया है| महिलाओं को समाजवादी विचारधारा ने पहले ही रोजगार देने के लिए नायब तरीका बता रखा है (बलात्कार करवाओ नौकरी पाओ) नाहक वे धरना प्रदर्शन में चली गईं| वैसे गलती आप लोगों की भी कम नहीं है यदि आप लोग महिलाओं की सुरक्षा की चिंता में साथ न होते तो पुलिस वाले कुछ महिलाओं की नौकरी तो पक्की करवा ही देते (यू.पी. पुलिस को तो इसमें विशेष योग्यता हासिल है)| जिन लोगों को अभी भी दिवास्वप्नों ने घेर रखा हो वे कम से कम इतना तो समझदारी दिखाएँ ही की बांस की कोठी में आम की फसल नहीं लगती और सांप का बच्चा संपोला ही होता है जब बाप मुलायम है तो बेटा कठोर कैसे हो सकता है! आपके साहस के लिए एक बार फिर आपको हार्दिक बधाई! वन्देमातरम!

    atharvavedamanoj के द्वारा
    March 22, 2012

    प्रिय चातक भाई, सादर वन्देमातरम| पता नहीं क्यों इस मंच पर प्रतिक्रियाओं के सन्दर्भ में मुझे बड़ी परेशानी का सामना करना पड़ता है,अधिकांशतः प्रतिक्रियाएं खो जाया करती हैं|मित्र,लाठी,गोली और दमन से राष्ट्रवादियों का प्रारम्भ से ही साबका पड़ता रहा है और जितनी ही बार हमने लाठियाँ खायी हैं हम उतने ही मजबूत होकर उभरे हैं|अब तो इस तरह की लाठियां फूल से अधिक कुछ नहीं लगती|हमें गर्व है की लखनऊ की सड़कों पर अभिषेक ने हम बेरोजगारों का जलाभिषेक किया और लाठियों से स्वागत भी|हम प्रसन्न है और इस बार बीस हजार तो अगली बार ५० हजार की तर्ज पर बढते ही जायेंगे| जिन लोगों को अभी भी दिवास्वप्नों ने घेर रखा हो वे कम से कम इतना तो समझदारी दिखाएँ ही की बांस की कोठी में आम की फसल नहीं लगती और सांप का बच्चा संपोला ही होता है जब बाप मुलायम है तो बेटा कठोर कैसे हो सकता है!…इस बात से मैं पूरी तरह सहमत हूँ|जय भारत, जय भारती|


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