मनोज कुमार सिँह 'मयंक'

राष्ट्र, धर्म, संस्कृति पर कोई समझौता स्वीकार नही है। भारत माँ के विद्रोही को जीने का अधिकार नही है॥

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क्षणिका

Posted On: 6 Oct, 2011 में

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संभल कर राह में चलना,
बहुत कांटे बिरादर हैं|
किसी बंजर जमीं के वास्ते,
पानी न खो देना|

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354 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

dineshaastik के द्वारा
December 25, 2011

अरे जो राह आसां हो, मुझे उसपर नहीं चलना। जमीं बंजर अगर है तो, उसे उपजाऊ है करना।। मैं कांटे मानता हूँ दोस्त, ये भ्रष्टाचारि जो नेता। चलो अब राह क्रांति की, अरे काँटों से क्या डरना।। किया गागर में सागर को. बहुत सुन्दर लगी क्षणिका। मुझे लगती न जो सुन्दर, न देता टिप्पणी वरना।।

    Matilda के द्वारा
    July 12, 2016

    It’s about time somoene wrote about this.

Mayur के द्वारा
October 21, 2011

यह है क्या….!!!! आश्चर्य है की लोग तारीफ़ भी कर रहे हैं… लगता है यहाँ सब एक दुसरे की ही पीठ थपथपाते रहते हैं, झूठी ही सही….

    Tailynn के द्वारा
    July 12, 2016

    I think this is an amazing thing you are putting together and I have recently thinking I want to surround myself with like minded individuals that are into healthy holistic lifestyles. I definitely could use a strong support system. My work schedule is late nights but I’m off every Tuesday and Sunday. every other day I work I don’t get off until 9. But Tuy2sae&#8d17;s are perfect for me!

Dr.KAILASH DWIVEDI के द्वारा
October 19, 2011

आदरणीय मनोज जी, सादर अभिवादन ! बहुत सुन्दर , आपने तो गागर में सागर भर दिया …….. बधाई !

Syeds के द्वारा
October 12, 2011

बहुत ही कम लफ़्ज़ों में बहुत खूबसूरत और गहरी बात… http:/syeds.jagranjunction.com

sumandubey के द्वारा
October 10, 2011

मनोज जी नमस्कार, गहरे अर्थों को खुद में समायी हुई क्षणिका।जयहिन्द्।

    Mira के द्वारा
    July 12, 2016

    БÂ´Ã‘€Ð°Ð²ÑÑ‚вÃ׃йÑ‚е,доктор у меня была операция 29.10.2008г. по удалению желчного пузыря, плюс ко всему у меня еще был панкриотит.Мне 30 лет. Диеты придерживаюсь строго!!! Но, приступы продолжаются.Что посоветуете делать?Заранее спссибо…

Santosh Kumar के द्वारा
October 8, 2011

प्रिय मनोज भाई ,..ये क्षणिका वाकई बहुत भारी है ,..सवा-ढाई -पांच पता नहीं ,..लेकिन बार बार पढ़ता हूँ ,.. जयभारत जयभारती

abodhbaalak के द्वारा
October 7, 2011

मनोज जी केवल चाँद शब्दों में बहुत गहरी बात कहना …………. वैसे इशारा किस और है, इस अबोध को भी ………….. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    Kaylyn के द्वारा
    July 12, 2016

    yo también he caído “de peus a la galleda” como decimos aqp…íuobre Aguirre( Javier), en las ruedas de prensa parecía un tipo majo, nada que ver con Chusteres, clementes y demás fauna. Le deseo lo mejor.un abrazo

chaatak के द्वारा
October 6, 2011

प्रिय बंधु मनोज जी, सादर अभिवादन, इसे शेर कहें या सवा सेर, कह तो इसे अढाई सेर भी सकते हैं! बहुत खूब! जय हो !

nishamittal के द्वारा
October 6, 2011

मनोज जी चोटी पंक्ति में छिपे भाव चेतावनी

    nishamittal के द्वारा
    October 6, 2011

    क्षमा चाहती हूँ छोटी पढ़ें.

वाहिद काशीवासी के द्वारा
October 6, 2011

वो कहते हैं वतन के वास्ते लुट जाओ, लूट लो, घिनौनी इस सियासत पर अपनी ये जवानी न खो देना; आप ही से इसकी प्रेरणा मिली है मनोज भाई।

Rajkamal Sharma के द्वारा
October 6, 2011

यह कैसी श्रणिका है जोकि श्रण से पहले ही खत्म हो गई :) :( ;) :o 8-) :|

    ashvinikumar के द्वारा
    October 6, 2011

    राजकमल भाई ,,यह क्षणिका है “”श्रणिका नही”" लेकिन आप की लीला आप ही जानो हो सकता है कल को “”कुनिका मोनिका या फलां फलां जो मर्जी हो कह लो ………….जय राम जी की :) जय भारत

    Rajkamal Sharma के द्वारा
    October 6, 2011

    प्रिय अश्वनी भाई ….. नमस्कार ! आज पता चला (वैसे पिछले ब्लॉग पर भी देखा है ) की आप रचना तो मनोज भाई के नाम से और उसके उत्तर अश्वनी भाई बन कर देते हो ….. लीला तो आपकी भी कुछ कम अपरम्पार नहीं है प्रभु ! जय श्री कृष्ण ! वैसे मैंने कापी करना चाहा था लेकिन नहीं हो सका और गूगल हिंदी इनपुट से यही निर्माण हो सका इसलिए भाव तो आपके वाले ही है शब्द चाहे मुझसे लिखने में कुछ और हो गए हो ….. जय भारत :) :( ;) :o 8-) :| :| 8-) :) ;) :( :o :) :( ;) :o 8-) :| :| 8-) :) ;) :( :o :) :( ;) :o 8-) :| :| 8-) :) ;) :( :o

    chaatak के द्वारा
    October 6, 2011

    प्रिय राजकमल भाई, इस बार आप धोखा खा गए | रचना मनोज भाई की है और जवाब अग्रज अश्विनी भाई का है न नाम एक है न व्यक्ति यहाँ बनने की कोई बात नहीं बंधु ये दोनों ही व्यक्ति एक दुसरे से १५० किलोमीटर दूर बैठे हैं बस सोच एक जैसी रखते हैं और दोनों ही आपसे एक जैसा स्नेह रखते हैं इसीलिए आपसे संवाद का मोह संवरण नहीं कर पाते|


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