मनोज कुमार सिँह 'मयंक'

राष्ट्र, धर्म, संस्कृति पर कोई समझौता स्वीकार नही है। भारत माँ के विद्रोही को जीने का अधिकार नही है॥

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सारे मानदंड बदले हैं

Posted On: 4 Oct, 2011 में

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मैं अपने आपको हिंदी का खासा विद्वान समझता हूँ|मैंने अभी तक मुक्त लेखन ही किया है|जो समझ में आया लिख दिया लेकिन आज एक अजीब तरह के पशोपेश में पड गया हूँ|मुझे लिव इन रिलेशनशिप पर लिखना है और यदि मैं इसका हिंदी अनुवाद करता हूँ तो जहाँ तक मैं समझता हूँ इसका शाब्दिक अनुवाद संबंधो में रहने से है|दूसरी ओर यह शाब्दिक अनुवाद लिव इन रिलेशनशिप की अवधारणा से कहीं भी मेल नहीं खाता|अंतर्जाल के मुक्त ज्ञानकोष विकिपीडिया के अनुसार,”Cohabitation usually refers to an arrangement whereby two people decide to live together on a long-term or permanent basis in an emotionally and/or sexuallyintimate relationship. The term is most frequently applied to couples who are not married. More broadly, the term can also mean any number of people living together.

एक अन्य स्रोतhttp://legal-dictionary.thefreedictionary.comके अनुसार,”A living arrangement in which an unmarried couple lives together in a long-term relationship that resembles a marriage.

Couples cohabit, rather than marry, for a variety of reasons. They may want to test their compatibility before they commit to a legal union. They may want to maintain their single status for financial reasons. In some cases, such as those involving gay or lesbian couples, or individuals already married to another person, the law does not allow them to marry. In other cases, the partners may feel that marriage is unnecessary”.

इन दोनों ही परिभाषाओं से चौकाने वाले तथ्य सामने आते हैं -

१) लिव इन रिलेशनशिप के मूल में सम्भोग है|

२) लिव इन रिलेशनशिप के अनेक कारण हैं|

३) लिव इन रिलेशनशिप स्थायी रूप से एक साथ रहने की व्यवस्था है|

४) लिव इन रिलेशनशिप भावात्मक अथवा यौनिक अन्तरंग सम्बन्ध है|

५) लिव इन रिलेशनशिप प्रायः उन जोड़ों पर लागू होता है जो विवाह नामक संस्था के बाहर रहते हैं|

६) लिव इन रिलेशनशिप का अभिप्राय  एक ही साथ रहने वाले अनेक जोड़ों अथवा व्यक्तियों  से भी हो सकता है|

७) लिव इन रिलेशनशिप विवाह न होने के वावजूद विवाह जैसी एक व्यवस्था है|

८) लिव इन रिलेशनशिप में जोड़े विवाह पूर्व जैसी स्थिति (कुंवारापन/कौमार्य नहीं) आर्थिक कारणों से भी बनाये रखना चाहते हैं|

९) लिव इन रिलेशनशिप उन  समलैंगिक जोड़ों अथवा शादीशुदा व्यक्तियों में स्थापित हो सकता है, जिन्हें विधिक रूप से विवाह की अनुमति नहीं है|

१०) लिव इन रिलेशनशिप में रहने वाले लोग विवाह नामक संस्था की अनिवार्यता से असहमत हो सकते हैं|

कुल मिलाकर लिव इन रिलेशनशिप,” दो अथवा दो से अधिक समलैंगिक,विषमलैंगिक अथवा पहले से ही शादीशुदा  सहमत लोगों द्वारा स्थायी रूप से साथ साथ रहने की वह  स्थिति है जो विवाह नामक संस्था से बाहर विवाह जैसी एक व्यवस्था है, जिसके मूल में सम्भोग है और जिसका पालन करने वाले लोगों को या तो विधिक रूप से विवाह नामक संस्था में प्रवेश की अनुमति नहीं है अथवा वे आर्थिक कारणों से विवाह पूर्व की स्थिति बनाए रखना चाहते हैं अथवा उन्हें विवाह नामक संस्था में विश्वास नहीं है|”

यह तो एक परिभाषा है, मेरे विचार से इस परिभाषा के आधार पर हिंदी में लिव इन रिलेशनशिप के लिए सबसे उपयुक्त शब्द ”सहवास” होना चाहिए जो वर्तमान में मात्र एक अन्तरंग स्थिति विशेष के लिए रूढ़ हो चला है|कभी कभी हमारे इतिहास और संस्कृति से अपरिचित लोगों द्वारा लिव इन रिलेशनशिप के आधार पर कुछ भ्रामक बातें प्रचारित की जाती हैं – जैसे कृष्ण और राधा का सम्बन्ध|मेरे यह समझ में नहीं आता की मात्र एक श्लोक को लेकर महारास को ही प्रचारित करने के पीछे क्या तुक है? अमीर खुसरों के प्रसिद्ध गजल  ’‘जे हाले मस्कीं मकुन तगाफुल दुराये नैना, बनाये बतियाँ…की ताबे हिज्रा, न दारम ये जाँ न लेहू काहे लगाय छतियाँ’‘ मेरे लिए किसी सामान्य भजन से भी अधिक महत्व रखता है और अपने व्यकिगत साधना की स्थिति में इन लाइनों को दुहराते, दुहराते कभी कभी मन की स्थिति ऐसी हो जाती है जैसे महुवर के नाद को सुनकर बड़े से बड़ा फणी भी बेबस हो जाता हो|अब यदि किसी स्वनामधन्य लिक्खाड़ ने इन पंक्तियों को लिव इन रिलेशनशिप से जोड़ कर देखा तो मेरे मन पर क्या बीतेगी, इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है|

सत्ता हस्तान्तरण के पश्चात (माफ कीजियेगा मैं अपने देश की स्वतंत्रता को इसी नाम से संबोधित करता हूँ और आगे से लिव इन रिलेशनशिप के स्थान पर सहवास शब्द का ही प्रयोग करूँगा) हमारे देश की मनःस्थिति (मनःस्थिति से मेरा आशय राष्ट्रीय चरित्र से है, बहुत कम लोगों को यह पता होगा की जिस तरह एक व्यक्ति विशेष की कुछ चारित्रिक विशेषताएं होती हैं ठीक उसी तरह समग्र राष्ट्र की भी एक राष्ट्रीय चेतना होती है, जो वहाँ के निवासियों के सामूहिक व्यक्तित्व को प्रदर्शित करता है, मनोविज्ञान और समाज शास्त्र की भाषा में इसे राष्ट्रीय चरित्र कहते हैं) तत्काल नहीं बदल गयी, इसे बदलने में समय लगा और यह आज भी सतत परिवर्तनशील है|मेरे एक ब्लॉगर साथी श्री राजकमल शर्मा ने मेरे ब्लॉग ”कविताओं से डर लगता है” में प्रतिक्रिया के माध्यम से यौन क्रान्ति की सामाजिक गतिशीलता के सन्दर्भ में राज कपूर के एक पोस्टर की ओर मेरा ध्यान आकर्षित किया था|वर्तमान सामाजिक मापकों के अनुसार उक्त पोस्टर में किंचित भी अश्लीलता नहीं दिखाई देगी किन्तु उस समय उक्त पोस्टर को लेकर मध्यवर्गीय समाज खासा उद्वेलित हो गया था|कहने का आशय यह है की चलचित्रों ने सामाजिक वर्जनाओं को तोडने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और सामाजिक अधिगम के प्रभाव से बेल बाटम वाला युवा वर्ग कसे हुए जींस से होते हुए सहवास जैसी स्थिति तक पहुँच गया है|

इतिहास के सन्दर्भ में अष्ट विवाह की अवधारणा पर भी उंगली उठाई जा रही है|प्राचीन भारत के सन्दर्भ में कुछ भी कहने से पहले यह बात स्पष्ट कर देना आवश्यक होगा की हमारी संस्कृति ने प्राचीन काल में जीवन साथी के चयन का अधिकार लगभग पूरी तरह स्त्रियों के हांथों में सौप रखा था|जहाँ वर को विवाह से पूर्व अपनी योग्यता सिद्ध करनी पड़ती थी|स्वयम्बर की परम्परा इसका जीता जागता उदहारण है……………क्रमशः|



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16 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

वाहिद काशीवासी के द्वारा
October 11, 2011

वाह मनोज भाई। ऐसे विषय की असलियत का पोस्टमॉर्टम तो आप ही के हाथों निश्चित था। विलम्ब के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ। आपके सटीक उद्धरणों ने ऐसे वाहियात विषय की निर्ममता से बखिया उधेड़ी है जिसका यह वास्तव में पात्र था। अभी तक मैं ऐसे विषयों पर आधारित लेखों पर प्रतिक्रिया देने से बचता रहा था मगर आपकी प्रखर लेखनी ने विवश कर दिया। साधुवाद,

vasudev tripathi के द्वारा
October 6, 2011

आदरणीय मनोज जी, नब्ज पकड़ता हुआ सटीक लेख। आज ऐसे विषयों को प्रचारित करने के प्रयास के चलते इन्हें बहस का मुद्दा बनाने का प्रयास चल रहा है, हम इसे रोक नहीं सकते अतः हमें सटीक प्रतियुत्तर देना होगा। वन्देमातरम।

sumandubey के द्वारा
October 6, 2011

मनोज जी नमस्कार, बहुत ही सार्थक आलेख है आपका और सत्य ही है जो कल तक मूल्य थे वो आज नही है, और ए बद्लाव जारी रहेगा और हम विकास के साथ- साथ अपने पहचान की पतन के ओर भी बढ रहे ।जयहिन्द्।

mukundchand के द्वारा
October 6, 2011

मनोज जी, वन्देमातरम. लिव इन रिलेशन शिप का एक फायदा और भी है. सुपर आधुनिक लड़कियां यूज़ एंड थ्रो वाली स्थिति में होती हैं, जो बाद में या तो  एफ आई आर करती फिरती हैं की शादी का वादा करके कई साल तक बलात्कार किया जबकि वे भी वही सुख ले रही होती है , दूसरा उन्हें इस सुख की आदत पड़ जाती है और वो कोई दूसरा ढूंढ लेती हैं. कुल मिला कर व्यभिचार को मान्यता देनी की नई प्रथा है. बिना रखैल शब्द का इस्तेमाल किये, यही कहा था सुप्रीम कोर्ट के माननीय जज मार्कंडेय काटजू जी ने. 

आर.एन. शाही के द्वारा
October 6, 2011

सराहनीय विश्लेषण मनोज जी … बधाई ! ‘लिव इन रिलेशनशिप’ शब्द से यह भी प्रतीत होता है कि ऐसा जीवन संकीर्ण रिश्ते के अन्दर घुस कर ही जिया जा सकता है, छाती ठोंककर समाज के अन्दर घुसकर नहीं । छाती ठोंकें भी तो कैसे, ऐसे रिश्ते सिर्फ़ कायर बनाया करते हैं, जो बाई नेचर पलायनवादी होते हैं, खाया-पिया, बारह आने का गिलास तोड़ा, और चल दिये । इसमें के दोनों लिंगी बेईमान तवीयत के होते हैं, क्षणिक काम-पिपासा के मारे । जहां सचमुच के भावनात्मक संबन्ध होते हैं, उन्होंने किसी की भी परवाह न करते हुए दूसरा विवाह तक छाती ठोंक कर कर डाला, और समाज को मान्यता भी देनी पड़ी । धर्मेंद्र-हेमा के विवाह जैसे हज़ारों उदाहरण पौराणिक काल से लेकर आज तलक चले आ रहे हैं । कानून ने मात्र मानवीय आधार पर इस रिश्ते को मान्यता दी है, अन्यथा ऐसी मान्यता कहीं से तर्क़संगत नहीं है ।

chaatak के द्वारा
October 5, 2011

प्रिय मनोज जी, सादर वन्देमातरम, लिव-इन-रिलेशन शब्द का जन्म उन कोठरियों में हुआ है जिसमे कुत्सित वासना को मिटाने के लिए न जाने कितने मासूम का बलात्कार हुआ और हर बार बलात्कारी जो कि नेहरू सा विद्वान् और जिन्ना सा सदाचारी था यही तिकड़म लड़ाता रहा कि कभी इन गुनाहों का अदालत में सामना करना ही पड़े तो दंड संहिता में वह कौन सा छेद कर दूं जिससे साफ़ निकल जाऊं और हमेशा के लिए कल्याणकारी भी बना रहूँ| इसी चिंतन का मूर्तमान रूप है| अभी तो इस क़ानून का पूरा इस्तेमाल भी लोग नहीं सीख पाए हैं और लिव-इन-रिलेशन के खरबूजे काटने शुरू हो गयें हैं अब चाहे जो चाहे जिस पर गिरे कोई चिता नहीं खरबूजे कटते रहेंगे और यदि छुरी के पास धन रुपी भारी मुठिया है (जो कि उपरोक्त विद्वान बलात्कारी के पास थी) तो काटने के बाद हर खरबूजा अदालत में चीख-चीख कर कहेगा, “न जी ये मुझपर न गिरा था (बलात्कार नहीं हुआ) मैं खुद इस पर गिरी थी (मैं सहमती से रिलेशन में थी)| अब छुरी भी जायज और खरबूजा भी| जय हो!

Rajkamal Sharma के द्वारा
October 5, 2011

आदरणीय भाई साहिब …..वंदे मातरम ! आपकी पिछली पोस्ट पार मेरी प्रतिकिर्या का उत्तर अभी तक नहीं आया है ….. मैं हिसाब किताब का बिलकुल पक्का हूँ इसलिए पहले पिछला हिसाब क्लीयर हो जाना चाहिए उसके बाद ही आगे का …… हा हा हा हा हा जय भारत :) :( ;) :o 8-) :| :| 8-) :) ;) :( :o http://rajkamal.jagranjunction.com/2011/09/30/“आदरणीय-निशा-मित्तल-–-दा-ल/

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 6, 2011

    प्रिय राजकमल भाई, सादर वंदे मातरम| मैं प्रतिक्रिया देने में बड़ा कच्चा हूँ, थोडा सा ही समय मिलता है इस नाचीज को…उतने में ही बहुत से काम निपटाने रहते हैं|इसके बावजूद बहुत से ऐसे ब्लॉग छूट जाते हैं….जो निहायत ही खूबसूरती के साथ लिखे गए होते हैं और जिन पर ब्लॉग लेखक को वास्तव में पुरस्कृत किया जाना चाहिए|आप हिसाब किताब के पक्के है और मैं पुनर्जन्म में विश्वास करने वाला….कोई बात नहीं भाई आज का कल चुकता नहीं हुआ तो अगले जन्म में हो जाएगा……हा हा हा हा|वैसे मैं इसी जन्म में आपका सारा हिसाब चुकता करने का प्रयास करूँगा….जय भारत, जय भारती|

nikhil pandey के द्वारा
October 5, 2011

प्रिय मनोज जी ,नमस्कार…..बहुत अर्थपूर्ण लेख लिखा है आपने इन विषयो पर चर्चा करने में ही उबकाई आने लगती है .. लगता है इंसान समाज से उबकर अब फिर जंगल में जाने को उद्यत है ….मानसिक रूप से दिवालिया होती आज की पीढ़ी .. “”सब चलता है “” और प्रयोग करो और फेको वाली संस्कृति में जी रही है तो उसके परिणाम इस तरह के ही आएंगे .. उसपर सरकार भी लोकतंत्र के नाम पर हर तरह की स्वतंत्रता देने को तैयार है … फिर क्या किया जाये ये ही यक्ष प्रश्न है . मेरी समझ में नहीं आता इसे स्वीकार करने वाले स्वतंत्रता प्रेमी अपनी बहु बेटियों को किसी के भी साथ जाने देने की स्वतंत्रता देंगे ?शायद देंगे ……

Santosh Kumar के द्वारा
October 5, 2011

प्रिय मनोज जी ,.सादर नमस्कार बहुत ही अच्छा ज्ञानवर्धक आलेख ,..मुझे इसका कोई ख़ास ज्ञान तो नहीं है ,.लेकिन जितना समझता हूँ ,….उससे यही लगता है कि बगैर किसी सामजिक बंधन और जिम्मेदारी के उन्मुक्त भोग लिप्सा कि चाहत ही इस “सहवास ” का कारण लगता है ,… यह धर्म विरुद्ध तो है ही ,…सामाजिकता के लिए भी चुनौती बन रहा है ,….शायद हमारे कुछ अत्याधुनिक युवा अब .”पहले इस्तेमाल करो फिर विश्वास करो ” के चक्कर में इस्तेमाल होते /करते रहते हैं ,..विश्वास तो कभी होगा ही नहीं ,.ना खुद पर और ना ही औरों पर .. भैया आमिर खुसरो साहब कि जो लाइन लिखी है ,..यदि उसका मतलब समझा देते तो बड़ी कृपा होगी ,…सादर आभार

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 6, 2011

    प्रिय संतोष भाई, सादर वंदे मातरम| अमीर खुसरो साहब की यह गजल बड़ी ही अर्थपूर्ण है…इसमें अपने महबूब से फरियाद की गयी है की ये मेरे महबूब (ईश्वर) मुझ गरीब मिसकीन की हालत से यूँ बेखबर न रहो|हे महबूब! कभी आँखे मिलाते हो, कभी आँखे चुराते हो और बाते बनाते हो|जुदाई की रातें तुम्हारी काली जुल्फों की तरह लंबी और घनी हैं और मिलने के दिन उम्र की तरह छोटे|ये मेरे रब!तू मुझे छाती से क्यों नहीं लगा लेता| इसमें उलाहना भी है मित्र…ठीक उसी तरह की उलाहना जिस तरह की उलाहना महामाया भैरवी से की गयी है…इन शब्दों में….बैल बुढ़ान की सिंह हेरान की गोद लिए हर को फिरती हो? मोहिं पुकारत देर भई..जगदम्ब बिलम्ब कहाँ करती हो? खेद का विषय है की कुछ अनर्गल लोगों ने उच्चस्तरीय साहित्य का सस्ता अर्थ प्रस्तुत कर लोगों को भ्रमित कर रखा है|आपकी प्रतिक्रिया का आभार…जय भारत, जय भारती|

    Santosh Kumar के द्वारा
    October 8, 2011

    प्रिय मनोज भाई ,. सादर वन्देमातरम “.बैल बुढ़ान की सिंह हेरान की गोद लिए हर को फिरती हो? मोहिं पुकारत देर भई..जगदम्ब बिलम्ब कहाँ करती हो?”…. पुराना भजन याद करा दिया आपने ,…. इबादत से इश्क और इश्क में इबादत ,..दोनों का हमेशा ही गलत मतलब निकाला गया है ,..लेकिन सच तो सोना होता है ,…निखरता जरूर है ,…तपने के बाद…अर्थपूर्ण गजल को समझाने के लिए कोटिशः आभार जयभारत जयभारती

abodhbaalak के द्वारा
October 5, 2011

श्रीमान मनोज जी लिव इन रिलेशन को लेकर आपने जो लिखा है वो बड़ा ही प्रशंसनीय और ज्ञानवर्धक है, भय्या हम तो ठहरे पुराने विचार के मानने वाले, हमारे लिए तो ये केवल बेशर्मी, और बे हयाई और ………, अब हम कुछ कहेंगे तो विकास शील लोग कहेंगे की …….. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

ashvinikumar के द्वारा
October 5, 2011

प्रिय अनुज सुप्रभात ,,लिव इन रिलेशनशिप=के शाब्दिक अर्थ पर में न जाकर एक उद्धरण दे रहा हूँ ,,कुत्तों को देखा है न ,लेकिन यार आजकल कुत्तों को वैश्विक मानव या आधुनिक मानव का (भारतीय तो कदापि नही ) मानवीय संक्रमण लग गया है ,,पहले उनका भी मैथुन काल निर्धारित था लेकिन अब तो वह पूरे साल बच्चे जनने लगे हैं यह लिव इन रिलेशनशिप का जीवंत उद्धरण है ,,,………..जय भारत

jlsingh के द्वारा
October 5, 2011

मनोज जी, नमस्कार! आपके द्वारा वर्णित अवांछनीय सम्बन्ध की पराकाष्ठा पर विश्लेषित है, जिसका भयंकर परिणाम दिखने लगा है. इसका अंत आत्महत्या का रूप लेने के बाद और कहाँ जायेगा अनुमान लगाना कठिन न होगा. पर पानी की धार जैसी नवयुवकों की परमाण्विक सोंच को हम और आप चाहकर भी रोक पाएंगे क्या? समय परिवर्तनशील है और डार्विन के सिद्धांत के अनुसार कुछ चीजें अपने आप बदलती हैं या जन्म लेती है. आप तो पुरानों और भारतीय संस्कृति में आस्था रखने वाले, प्रलय के बारे में भली भांति जानते हैं, तो हम क्यों न उस दिन का इन्तजार करें, क्योंकि ‘ जब जब होंही धरम की हानी ———’ मेरे ख्याल से — काफी लम्बा हो गया! एकबार पुन: आभार क्रांतिकारी लेखन के लिए.- जवाहर.

Dr.KAILASH DWIVEDI के द्वारा
October 4, 2011

आदरणीय मनोज जी, सादर अभिवादन ! लिव इन रिलेशनशिप पर आपका अनुसन्धान प्रसंसनीय है | अगले अंक की प्रतीक्षा रहेगी |


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