मनोज कुमार सिँह 'मयंक'

राष्ट्र, धर्म, संस्कृति पर कोई समझौता स्वीकार नही है। भारत माँ के विद्रोही को जीने का अधिकार नही है॥

76 Posts

19068 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 1151 postid : 460

कविताओं से डर लगता है|

Posted On: 2 Oct, 2011 Others में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

गहन निशा है, बुझे दीप हैं,

विषधर पांवों में डंसता है|

और पास ही महफ़िल सजती,

कविताओं से डर लगता है|

भूख बिलखते बच्चे माँ की छाती से जब भी लगते हैं|

किसी हरामी की आँखों में यौवन के सपने पलते हैं|

महफ़िल में गजलों का गाना, कानों में बम सा फटता है|

और पास ही महफ़िल सजती,

कविताओं से डर लगता है|

लम्पट अधरों ने मांत्रिक के अस्फुट अधरों को कब जाना?

मेरा सारा रोना, गाना, भैंस के आगे बीन बजाना|

संस्कृति की मातमपुर्सी पर देखो शहनाई बजता है|

और पास ही महफ़िल सजती,

कविताओं से डर लगता है|



Tags:

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (6 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

1375 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadhana thakur के द्वारा
October 10, 2011

मनोज जी ,बहुत ही भावपूर्ण रचना …..अच्छी लगी …….

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 10, 2011

    आदरणीय साधना जी, सादर वन्देमातरम| आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया का कोटिशः आभार..ब्लॉग पर आपका स्वागत है|जय भारत, जय भारती|

    Lyndall के द्वारा
    July 12, 2016

    Nach Neuladen der Ausgabe vom Montag 15.10. ist die von heute (16.10.) verschwunden. Trotz ab- und anmelden sowie Neoalstanlitiun der App wird die heutige Ausgabe in der Bibliothek nicht mehr angezeigt. Was tun?

surendr shukl bhramar5 के द्वारा
October 4, 2011

मनोज जी …दिल को छू गयी ये सच को उकेरती रचना …बहुत सुन्दर ..व्यंग्य कटाक्ष आँखें खोल देने वाली … पर कविताओं से डरें नहीं नहीं तो हम कैसे मिलेंगे ??? भ्रमर ५ कविताओं से डर लगता है| भूख बिलखते बच्चे माँ की छाती से जब भी लगते हैं| किसी हरामी की आँखों में यौवन के सपने पलते हैं|

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 10, 2011

    प्रिय भ्रमर जी, सादर वन्देमातरम| कविताओं से डरने का कुछ विशेष प्रयोजन नहीं है..वास्तव में डर उन अभिव्यक्तियों से लगता है जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर उन्मुक्तता और राष्ट्रद्रोह को प्रोत्साहित करते हैं..हमारे पास ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है|प्रतिक्रिया का आभार|हम मिलेंगे भाई और कविताओं के माध्यम से ही मिलेंगे|जय भारत, जय भारती|

    Lois के द्वारा
    July 12, 2016

    At last, soeomne who knows where to find the beef

Dr.KAILASH DWIVEDI के द्वारा
October 3, 2011

आदरणीय मनोज जी , सादर नमस्कार ! सत्यता को दर्शाती बहुत सुन्दर भावाभ्यक्ति, बधाई …….| आपने मेरे ब्लॉग पर अपना बहुमूल्य समय दिया आपका धन्यवाद ! सर्वप्रथम आपका मेरे ब्लॉग पर स्वागत है, वैसे तो मैं प्राकृतिक चिकित्सक हूँ परन्तु लाफिंग थेरेपी भी ड्रगलेस थेरापी है इसलिए इसे भी प्राकृतिक चिकित्सा में शामिल कर लेते हैं | परन्तु इस रचना के विषय में एक राज की बात आपको बताऊँ — यह मेरी आपबीती घटना है, जो मेरे साथ लगभग १० वर्ष पहले घटित हुयी थी | आप शादीशुदा होने के बाबजूद खुलकर हंस लिए, मेरा परिश्रम सार्थक हो गया | प्राकृतिक चिकित्सा में यदि आपकी रूचि है तो मेरे दूसरे ब्लॉग – http://naturecure.jagranjunction.com विजिट कर सकते हैं | समय देने के लिए आपका पुनः बहुत-बहुत आभार !

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 8, 2011

    आदरणीय डॉक्टर साहब, आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया को सादर नमन|प्रकृति के तदात्म्यीकरण को समर्पित उस प्रत्येक कार्य में मेरी रूचि है जो विकृतियों का संहार करती हो|आधुनिक चिकत्सा पद्यति ने भले ही विकृतियों के diagnosis के क्षेत्र में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया हो किन्तु उनके निदान (treatment) की दिशा में वह आज भी पूरी तरह से असफल है कारण वर्तमान चिकित्सा पद्यति में शरीर के प्रत्येक अंगों को असम्बद्ध मानकर उसका पृथक पृथक उपचार करना ही सैद्धांतिक रूप से हास्यास्पद है|जब भी अवसर मिला मैं आपके द्वितीय संस्करण को अवश्य देखूंगा|जय भारत, जय भारती|

sumandubey के द्वारा
October 3, 2011

मनोज जी नमस्कार, समाजिक यर्थाथ को जिन भावो से आपने कहा है वह तारीफ योग्य है.

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 8, 2011

    आदरणीय सुमन जी, सादर वंदे मातरम| आपकी उत्साहवर्धक टिप्पडी का शुक्रिया| जय भारत, जय भारती|

roshni के द्वारा
October 3, 2011

मनोज जी नमस्कार आप की कविता एक अलग से रंग मे रंगी होती है सच का रंग मानव जीवन की कठिन धुप छाव का सच … बिना छत के बारिश का कहर बरदाश करते हुए लोगों का सच .. ज्यदा तो हम कुछ नहीं कह सकते क्यों की आपकी रचना खुद ही सब कहती है बहुत बढ़िया

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 8, 2011

    रोशनी बहन… सादर वन्देमातरम| आपकी उत्साहजनक टिप्पडी को अभिवादन…साभार जय भारत, जय भारती|

    Issy के द्वारा
    July 12, 2016

    That’s not even 10 mitenus well spent!

Alka Gupta के द्वारा
October 3, 2011

मनोज जी , सामाजिक सच्चाई का यथार्थ सजीव चित्रण किया है…..अंतर में व्याप्त वेदना की उत्कृष्ट काव्याभिव्यक्ति ! आपकी तो सभी रचना उच्च कोटि की होती हैं ! बधाई !

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 8, 2011

    आदरणीय अलका जी, सादर वन्देमातरम| कविता पर उत्साहजनक टिप्पडी के लिए साभार जय भारत, जय भारती|

chaatak के द्वारा
October 3, 2011

प्रिय मित्र सादर वन्देमातरम! अपने आपको सभ्य कहने वाले ये असभ्य जानवरों से भी गए गुजरे लोग है जिनके बीच रहने वाली मानवता के मांस को ये गिद्ध बहुत पहले खा चुके हैं अब तो ये उसकी अस्थियों को कुतरने और चटकाने में लगे हैं| आईना दिखने वाली एक और रचना पर हार्दिक बधाई!

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 8, 2011

    प्रिय मित्र चातक जी, सादर वंदे मातरम| अपने आपको सभ्य कहने वाले ये असभ्य जानवरों से भी गए गुजरे लोग है जिनके बीच रहने वाली मानवता के मांस को ये गिद्ध बहुत पहले खा चुके हैं अब तो ये उसकी अस्थियों को कुतरने और चटकाने में लगे हैं|……इसमें कोई दो राय बन ही नहीं सकता…भाई मांस को खाने के लिए मांस बचना भी तो चाहिए….सब कुछ तो नोंचा जा चूका है ..रही सही कसर ….कुछ बाहर वाले तो कुछ भीतर वाले मिल कर निकाल दे रहे हैं|साभार …जय भारत, जय भारती|

वाहिद काशीवासी के द्वारा
October 3, 2011

प्रिय मनोज भाई, अति उत्तम भावाभिव्यक्ति। जब बुझे हुए दीपों और गरल से भरे विषधरों का कटु यथार्थ सामने खड़ा हो तब कविता की कल्पना करना भी बेमानी सा लगता है। मगर हमने हमेशा ही अंतर्विरोधों के बीच से भी मार्ग निकाले हैं। आप निरंतर उन्नति के पथ पर अग्रसर रहें यही कामना है।

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 8, 2011

    प्रिय वाहिद भाई, सादर वंदे मातरम| प्रतिक्रिया को नमन|आप जानते हैं की मैं अतिवादी हूँ और मध्यम मार्ग का धुर विरोधी|मैं ऐसे यथार्थ की धरा पर कविता को फूंक देने में विश्वास रखता हूँ फिर भी अपनी विचारधारा में संशोधन का निरंतर प्रयास करूँगा|गति, प्रगति और दुर्गति सब के लिए एक उर्जा की आवश्यकता होती है और वह उर्जा परस्पर सहयोग से ही संभव है|आपका निरंतर सहयोग मिलता है|परमपिता परमेश्वर से यही कामना है की यह सहयोग निरंतर मिलता रहे|वास्तव में एक यायावर ही दूसरे यायावर को समझ सकता है|जय भारत, जय भारती|

    Janelle के द्वारा
    July 12, 2016

    Fear of Rejection: There probably is a cottage industry on this subject, but I haven’t found it. I write sci-fi and mystery novels (I’ve finished 6). I’m unpublished. I’ve had two agents and after the last one dropped me, I just didn’t write. The joy was gone. Now, I know I’m a good writer. But I haven’t written in 2 years. The thought of going through all that rejection again seems to be shutting me down. Now I’m wanting to tippy-toe over to the computer again. I have LOTS of time. I don’t react well to schedules or plthniog–wten I write, I just sit and do it. Advice?

akraktale के द्वारा
October 3, 2011

मनोज जी, एक कटु सच्चाई की सुन्दर प्रस्तुति पर बधाई.

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 8, 2011

    माननीय अशोक जी सादर वंदे मातरम| उत्साहवर्धन करती हुई आपकी सुन्दर प्रतिक्रिया का कोटिशः आभार….जय भारत, जय भारती

    Candid के द्वारा
    July 12, 2016

    Hi, I just ran across your web site via yahoo. Your article is truly aplcapible to my life currently, and I’m really happy I discovered your website.

Santosh Kumar के द्वारा
October 3, 2011

प्रिय मनोज भाई ,. सादर वन्देमातरम कवि मन की वेदना को बहुत ओजस्वी रचना से उकेरा है ,.ये आग फ़ैल ही रही है ,…कभी न कभी तो लम्पट ,हरामी इस ज्वाला में भस्म होंगे ,..तेजस्वी भावो से सजी उत्कृष्ट रचना के लिए हार्दिक साधुवाद

    Santosh Kumar के द्वारा
    October 6, 2011

    प्रिय मनोज जी ,.मैं लंका में नहीं रहता हूँ ,…पहले तो आप के प्रश्न से चौंक सा गया फिर यकायक याद आया ,…वाराणसी में लंका है .. जयभारत,जयभारती

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 6, 2011

    प्रिय संतोष भाई, सादर वंदे मातरम| ओह मुझे लगा की शायद मैं आपको पहचानता हूँ और आप वाराणसी के लंका परिक्षेत्र में रहते हैं किन्तु अब मैं खुद confuse हो गया हूँ, कोई बात नहीं मित्रवर|कभी न कभी आपसे अवश्य मुलाक़ात होगी|असुविधा के लिए खेद है|जय भारत, जय भारती|

    Santosh Kumar के द्वारा
    October 7, 2011

    प्रिय मनोज भाई ,..मैं लंका में नहीं रहता हूँ ,… मैं अभी तक दो बार ही काशी आने का सौभाग्य प्राप्त कर पाया हूँ वो भी शायद १९९५ में ,… मैं कहता रहता हूँ की बनारस जैसा जिंदादिल शहर दूसरा नहीं है ,..मेरी बहुत इच्छा है की कभी बनारस ठीक से घूमूं ,..लेकिन कमाने खाने के चक्कर में ,……..बनारस में मेरा एक दोस्त हनुमानघाट पर रहता था ,..उससे अब कोई संपर्क नहीं है ,.. जब कभी भोले बाबा की कृपा होगी ,.तो मेरी इच्छा पूरी हो ही जाएगी ,…वर्तमान में मैं पंजाब में रहता हूँ ,..साभार वन्देमातरम

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 8, 2011

    प्रिय संतोष भाई… पहले तो पंचनद की उस पवित्र भूमि को नमन जहाँ आप रहते हैं तत्पश्चात आपकी प्रतिक्रिया को मैं अभी तक संबोधित नहीं कर पाया..इसका मुझे खेद है|मैं यदि इस अग्नि को प्रसारित करने में थोडा भी योगदान दे पाया तो जीवन को धन्य समझूंगा…मुझे उस दिन की बड़ी तत्परता से प्रतीक्षा है जब पुरे भारतवर्ष में स्वार्थ नहीं परमार्थ की मखशाळा प्रदीप्त होगी|कोटि कोटि कंठों में “ओम् राष्ट्राय स्वाहा…इदं राष्ट्राय..इदं न मम” के मन्त्र एक स्वर में गूंजेगे और और प्रत्येक आहुतियाँ हुत होने के लिए व्यग्रतापूर्वक अपने अपने क्रम की प्रतीक्षा करेंगी|मुझे लगता है इस तरह के धुएं से हमारा देश एक बार फिर अनंतकाल के लिए पवित्र हो जाएगा|आपसे मेल के मार्फ़त शीघ्र ही संपर्क करूँगा….जय भारत, जय भारती|

    Santosh Kumar के द्वारा
    October 9, 2011

    प्रिय मनोज भाई ,..आप मेरी प्रतिक्रिया को संबोधित नहीं कर पाए तो खेद तो मुझे भी है ,…मैं आपकी मेल की प्रतीक्षा करूंगा ,..जयभारत, जयभारती

Ramesh Bajpai के द्वारा
October 3, 2011

गहन निशा है, बुझे दीप हैं, विषधर पांवों में डंसता है| और पास ही महफ़िल सजती, कविताओं से डर लगता है| प्रिय श्री मनोज जी अंतर्मन की वेदना ही यहाँ कविता के रूप में स्फुटित हुयी है | संवेदना के ये जुझारू तेवर और ये मोतियों से भी अनमोल गरिमामयी ये अतुल्य भाव , मात्र शक्ति के ममत्व को समर्पित यह अंदाज मन को कोमलता से सहला रहा है तो दूसरी ओर कुटिल नराधम पर तीर तानते प्रलयंकारी तेवर | बहुत बहुत बधाई | जय माँ भारती

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 8, 2011

    आदरणीय वाजपेयी जी| सादर प्रणाम| आपकी स्नेहमयी प्रतिक्रिया की सर्वदा प्रतीक्षा रहती है….आप हमारे मनोबल को दृढ करते हैं|साभार..जय भारत, जय भारती|

Vasudev Tripathi के द्वारा
October 3, 2011

आदरणीय मनोज जी, मानवता की वेदना जब क्रांति का रूप धारण करती है तो उसकी छवि कुछ आपकी कविता सी ही होती है। “कविताओं से डर लगता है” की ध्वनि निराशा नहीं परिवर्तन की बयार व आक्रोश की उर्मियों को परिलक्षित कर रही है। उत्कृष्ट रचना व आपकी रचनाधर्मिता के लिए आपको हार्दिक बधाई।

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 8, 2011

    प्रिय वासुदेव भाई… सादर वंदे मातरम| हिंदी भाषा पर आपकी गहन पकड़ और शास्त्रीय अभिव्यंजना से मैं बहुत ही अधिक प्रभावित हूँ, साथ ही राष्ट्रवाद के तीखे तेवर आपकी लेखनी को अतुलित सामर्थ्य प्रदान करते हैं|परमपिता परमेश्वर से कामना है की आपके अंदर का यह आक्रोश अन्याय के तिमिर को फूंक डालने की हद तक कायम रहे|आपकी रसमयी प्रतिक्रिया को सादर नमन|जय भारत, जय भारती|

    Vina के द्वारा
    July 12, 2016

    You’ve really helped me unetsrdand the issues. Thanks.

ashvinikumar के द्वारा
October 2, 2011

प्रिय अनुज शुभरात्री ,,यार क्यों उकसा रहे हो ,किसी हरामी को क्यों मरवा रहे हो ,,ओह च च आज गांधी जयंती है भूल गया था पर मेरा धर्म तो सनातनपंथी है ,आना जाना तो लगा ही रहता है ,कब्र का पत्थर क्या हमेशा खड़ा रहता है,क्या किसी ने लाल बहादुर को याद किया ,जिसकी खुश्बू ने इस गुलशन को आबाद किया ,जिसने हाथ उठाते ही तमाचा जड़ दिया बदले में मोहतरमा ने देश को केक बनाकर दे किया ,भाई पाकिस्तान बड़े प्यार से खा रहा है ,और डाईबटीज इधर फैला रहा है ,भाई लोग मर रहे हैं फिर भी अफजल को भज रहे हैं भाई उसके तो बड़े ठाठ हैं और इधर बत्तीस में आबाद हैं देश में घमाशान है आदमी परेशान है लेकिन क्या गम है अम्मा जो आ गयी हैं बापू की समाधि पर फूल चढ़ा गयी हैं अरवी बोला अब सब ठीक हो जायेंगे दोनों बाबू मोशाय कॉर्निश बजा जायेंगे ……. भाई बाकी अगली रचना पर …..जय भारत

    Tamanna के द्वारा
    October 3, 2011

    अश्विनी जी, बहुत खूब कहा आपने….मनोज जी ने जो कसर छोड़ी थी वो आपने पूरी कर दी. ..आभार http://tamanna.jagranjunction.com/2011/09/28/live-in-relationships-in-indian-scenario/

    Santosh Kumar के द्वारा
    October 3, 2011

    आदरणीय अश्विनी जी ,..तमन्ना जी ने सही कहा ,..बहुत खूब कहा आपने ,.जय भारत

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 8, 2011

    आदरणीय बड़े भ्राता| सादर वंदे मातरम| आपने इतना कुछ कह दिया है की अब मैं क्या कहूँ?देश की तो छोडिये मुगलसराय, रामनगर और बनारस (जिसकी माटी की सोंधी सोंधी खुशबू में आज भी शास्त्री जी की स्मृतियाँ शेष है) भी शास्त्री जी को श्रद्धांजलि देने के मामले में दो कदम पीछे ही रहा…एक पुरुष के काल्पनिक आभामंडल से शेष सबही महापुरुषों को उदरस्थ कर लिया है भाई|भगत सिंह सरीखे तो आतंकवादी हो गए हैं न बड़े भाई|अब तो नरसी मेहता को भी कोई नहीं पूछता जिनके ”वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीर पराई जाणे रे” नामक भजन ने आतंकवादियों को भी उसी तरह की प्रेरणा दी थी जैसी की धीवादियों को|अब यह तो movie on demand है|पैसा pay कीजिये और तमाशा देखिये|पाकिस्तान ही क्या भाई जिस चीनी को हिन्दुस्तानी बड़े चाव से खा जाते थे..शर्बत बना कर पी जाते थे, वह चीनी भी पंचशील के मानवीकरण अलंकार से अलंकृत होकर बड़े मजे से हिंदुस्तानियों को चूस रहा है|शेष का इन्तजार रहेगा|आप गूगल टॉक पर क्यों नहीं आ रहे हैं बड़े भैया?आप से बात किये बिना कुछ अच्छा ही नहीं लगता|जय भारत, जय भारती|

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 8, 2011

    निःसंदेह तमन्ना जी…आखिर बड़े भैया है न् तो जाहिर है कविता में भी बड़े ही होंगे|जिस पीड़ा को मैंने पर्दे में रखा अश्विनी भाई की कविता में फूट कर आ गया|

jlsingh के द्वारा
October 2, 2011

मनोज जी, नमस्कार! इतने निराश न हो! कभी न कभी भैंस अवश्य जागेगी और नाचेगी भी! लम्पट अधरों ने मांत्रिक के अस्फुट अधरों को कब जाना? मेरा सारा रोना, गाना, भैंस के आगे बीन बजाना| संस्कृति की मातमपुर्सी पर देखो शहनाई बजता है| और पास ही महफ़िल सजती, कविताओं से डर लगता है|

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 8, 2011

    आदरणीय जवाहर जी| सादर वंदे मातरम| आज के समाज में जिन कविताओं में उद्दीप्त प्रलयाग्नि सी दाहकता होनी चाहिए….वे उन्मुक्तता की बलिवेदी पर अपना प्राण त्याग कर चुकी हैं|ऐसे में निराशा का संचार होना स्वाभाविक हैं|अब तो बस यही एक कामना है की भैंस जागे भी और नाचे भी फिर भी इस बात का डर तो है ही की अगर वह भैंस लालू की हुई तो इस देश का क्या होगा?स्नेहमयी प्रतिक्रिया का आभार …जय भारत, जय भारती|

    Lore के द्वारा
    July 12, 2016

    Ces commentaires sont d’une c…ie sans nom. Un seul est valable. C’est effectivement un suiveur qui devait régler la note. Un (petit) ratage… mais quand on sait les innombrables problèmes d&aaiuo;orgrnisstqon de ces déplacements… Je pense que tout sera réglé facilement.

Lahar के द्वारा
October 2, 2011

महफ़िल में गजलों का गाना, कानों में बम सा फटता है| और पास ही महफ़िल सजती, कविताओं से डर लगता है समाज में व्याप्त सच को अपने कविता का रूप दे दिया है बहुत अच्छे तरीके से अपने विषमताओ को वयक्त किया है |

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 8, 2011

    प्रिय भाई लहर जी… आपकी स्नेहमयी प्रतिक्रिया का आभार|जय भारत, जय भारती|

vinitashukla के द्वारा
October 2, 2011

सामाजिक विरूपताओं को उजागर करती सुन्दर रचना. बधाई.

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 7, 2011

    आदरणीय विनीता जी| सादर वन्देमातरम| आपकी उत्साहवर्धन करती हुई प्रतिक्रिया का कोटिशः आभार|जय भारत, जय भारती|

Rajkamal Sharma के द्वारा
October 2, 2011

प्यारे मनोज भाई …..वंदे मातरम ! आपकी कविता से राजकपूर की मैली गंगा (मंदाकिनी ) याद आ गई …. उस एक फिल्म ने खासकर उसके पोस्टरों ने भूख बिलखते बच्चे माँ की छाती से जब भी लगते हैं| किसी हरामी की आँखों में यौवन के सपने पलते हैं| सरे भारत के फिल्म्प्रेमियो की सोच को इसी धरातल पर लाकर खड़ा कर दिया था -लेकिन कुछ अलग रूप में ….. वहां से शुरू हो कर बात न जाने कहाँ तक पहुँच चुकी है -अब आगे क्या होगा राम जाने …. :) :( ;) :o 8-) :| :| 8-) :) ;) :( :o

    jlsingh के द्वारा
    October 2, 2011

    गुरुदेव, चरण वंदन! आप बहुत रसिक हैं! रस ढूंढ़ ही लेते है! हंसने पर मजबूर कर देते है!

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 7, 2011

    प्रिय राजकमल भाई, सादर वंदे मातरम| आपकी उक्त प्रतिक्रिया ने एक प्रेरक का काम किया है|सहवास नामक व्याधि पर लिखे जा रहे मेरे लेख में आपकी इस चिंता का समाधान करने का प्रयास करूँगा|परिवर्तन प्रकृति का नियम है और यह इतनी तीव्र गति से परिवर्तित होती है की बड़े बड़े विद्वानों की बुद्धि चकरा जाती|भला यह कोई कल्पना कर सकता है की भोग की पीठिका पर स्वामी विवेकानंद का अद्वैत वेदांत भी कभी गूँज सकेगा|इसमें कोई भी आश्चर्य नहीं की जब पश्चिमी संस्कृति द्रुत गति से हमारा अनुगमन करना चाह रही है…हम उससे भी तीव्र गति से पश्चिम की ओर भाग रहे हैं|मुझे आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास है की चक्र फिर घूमेगा लेकिन शायद तब हमारे पास हाँथ मलने के सिवा कुछ न् रह जाए|प्रतिक्रिया का आभार…जय भारत, जय भारती|

pramod chaubey के द्वारा
October 2, 2011

श्री मनोज भाई,  नमन कविता में समाज में व्याप्त विसंगतियों को  बखूबी उकेरा है। इसके लिए धन्यवाद। 

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 7, 2011

    प्रिय प्रमोद भाई… सादर वंदे मातरम| आपकी स्नेहमयी प्रतिक्रिया का आभार|जय भारत, जय भारती|

abodhbaalak के द्वारा
October 2, 2011

मनोज भाई कविता के माध्यम से ही आपने अपनी बात राखी हालांकि कविता को ही आपने ….. :) देखते वाले की नीयत उसकी जात का पता देती है, किसी के लिए मान का अपने बच्चे को … एक जीवन का नैसर्गिक सत्य है तो कोई ……………, जैसा आपने ने कहा की ह….. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 4, 2011

    भाई अबोध बालक जी, सादर वंदे मातरम| आपकी स्नेहसिक्त प्रतिक्रिया को नमन|भाई कविता की बात कविता से बताई जा सकती है न…मुझे जिन कविताओं से डर लगता है हो सकता है वही कविता किसी को आह्लाद से परिपूर्ण करती हो|आपने सही कहा देखने वाले की नीयत उसकी जात का पता देती है…आगे राम जाने|कृतज्ञतापूर्ण अभिवादन…जय भारत, जय भारती|

vikasmehta के द्वारा
October 2, 2011

मनोज जी मुझे आपकी कविता अच्छी लगी पर यह लाइन आपने बहुत ही कड़े शब्दों में लिखी है और लिखना भी चाहिए ………..भूख बिलखते बच्चे माँ की छाती से जब भी लगते हैं| किसी हरामी की आँखों में यौवन के सपने पलते हैं|

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 4, 2011

    प्रिय विकाश भाई, सादर वंदे मातरम| क्या करें कभी कभी कड़े शब्दों का प्रयोग करना मजबूरी बन जाता है, खासकर ऐसे समय जब लोग सुनकर भी बहरे बनने का नाटक कर रहे हों|प्रतिक्रिया का आभार…जय भारत, जय भारती|

nikhil pandey के द्वारा
October 2, 2011

मनोज जी कविताओं से डरने की जरुरत नहीं .. कविताये रौशनी भी दिखाती है इसका प्रमाण तो स्वयं आपकी ही कई ओजपूर्ण कविताये है .. वैसे अच्छी रचना है . नवरात्री की शुभकामनाये

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 4, 2011

    प्रिय भाई निखिल जी, सादर वन्देमातरम| अगर कविता वास्तव में कविता है तो उससे चराचर भयभीत रहता है मित्र, मेरी क्या बिसात है|उदहारण के लिए श्रृंगार की कविता कामदेव के क्षेत्र का अतिक्रमण करने के कारण श्रृंगार की कविता से कामदेव को भय लगता है|वीर रस की कविता से शत्रुओं को भय लगता है, करुण की कविता से कारुण्य को भय लगता है इत्यादि|खैर यहाँ पर मुझे सामाजिक नपुंसकता के दौर में श्रृंगार की कविताओं से भय लगा और मैंने उसे कह भी दिया|आपकी स्नेहमयी प्रतिक्रिया का कोटिशः आभार…जय भारत, जय भारती|


topic of the week



latest from jagran