मनोज कुमार सिँह 'मयंक'

राष्ट्र, धर्म, संस्कृति पर कोई समझौता स्वीकार नही है। भारत माँ के विद्रोही को जीने का अधिकार नही है॥

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निरर्थक प्रलाप

Posted On: 4 Aug, 2011 Others में

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’मेरा सब कुछ खो गया है|मेरा शैशव,मेरा बाल्य,मेरी तरुणाई और अब मेरी वृद्धावस्था भी मेरा साथ छोडना चाहती है|मैं मुर्दा नहीं हूँ क्योंकि मेरी साँसे चल रही है|थोडा देखना, नसें चल रहीं हैं की नहीं|अबे, देख मेरी धमनी रुक तो नहीं रही|तू हंस रहा है? लेकिन आज तेरी हसीं मुझे आनंदित नहीं कर रही|तू मेरी बेबसी का मजाक उड़ा रहा है|हे मेरे भगवान! मेरे मांसपेशियों में विद्युत सा बल क्यों भरता जा रहा है?मेरे अंग प्रत्यंग तड़फडाने लगे हैं|यह ठंडी हवा कैसी है?एकदम सर्द, और मेरे माथे पर पसीने की बूंदे?क्या मैं मर रहा हूँ?’’ उसका जिस्म एकाएक पत्थर हो गया|

उसके पास से एक साया रेंगता हुआ नजर आया|अखबार में एक बड़ी सी खबर निकली, “प्रधानमंत्री ने द्विपक्षीय संबंधों के एक नए युग का सूत्रपात किया|”एक लघु खबर निकली,” हिंदू आतंकवाद का सफाया करने को केन्द्र सरकार कटिबद्ध है|” बीच वाले पन्ने पर एक छोटी सी मगर  महत्वहीन खबर छपी, “हनुमान मंदिर का पुजारी सरकारी अस्पताल में रहस्यमय परिस्थितियों में मृत पाया गया|’’

यह खबर आग की तरह फ़ैल गयी|शहर के सभी श्रीमंतों में अपने आपको उस उपेक्षित हनुमान मंदिर का सबसे बड़ा रहनुमा घोषित करने की होड लग गयी|पुजारी ने अपने जीते जी, अपने जिस नालायक बेटे को मंदिर से बाहर कर दिया था|आज वही मदिर का प्रधान पूजारी बन गया और अब उस मंदिर का वह गुप्त द्वार भी सबके लिए खोल दिया गया है जहां श्रद्धालुओं ने चन्दा एकत्रित कर  श्री राम,लक्ष्मण,जानकी की स्वर्ण मूर्तियां स्थापित की थी|आजकल लोग वहाँ चप्पल पहन कर जाने लगे हैं|

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5 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

पीयूष पंत के द्वारा
August 10, 2011

वन्देमातरम मनोज भाई………. कुछ भी कहना अपनी दीनता को स्वीकार करना है……

munish के द्वारा
August 4, 2011

भारत के सन्दर्भ में ये कहना शायद गलत होगा की इतिहास स्वयं को दोहराता है….. क्योंकि यहाँ पर जयचंद टाइप के लोग कभी इतिहास बने ही नहीं…… वो तो लगातार भारत में बने हुए हैं ……..इसीलिए तो ये हश्र हुआ है…… http://munish.jagranjunction.com/2011/08/01/%e0%a4%b8%e0%a4%a8-2050-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%94%e0%a4%b0-2050-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%81-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a7%e0%a4%be%e0%a4%a8/

chaatak के द्वारा
August 4, 2011

इसे भविष्य कहूं या वर्तमान? आँखे खोलता हूँ तो ये वर्तमान दीखता है और बंद करता हूँ तो भविष्य ! क्या हिन्दुस्तान अपने ही खून की होली खेलने को अभिशप्त है? समझ में नहीं आया कि हर कोशिश के बाद ये जयचंद के वंशज इतनी तेज़ी से कैसे फैलते चले जाते हैं! कहीं ऐसा तो नहीं कि हमें शहीदों की कुर्बानी की तिजारत करने में ही मजा आने लगा है| अन्ना भी नाम तो लेते हैं क्रांतिकारियों का लेकिन काम करते हैं गांधी जी वाला| आखिर ये कब तक होगा? क्या इतिहास स्वयं को दोहरा रहा है? विचारो को प्रवाह प्रदान करने के लिए एक बार फिर हार्दिक धन्यवाद!

alkargupta1 के द्वारा
August 4, 2011

मनोज जी ,अपने अपने स्वार्थ वश दूसरों के लिए आज जगह जगह लोग अपने अपने ईमान को बेचते नज़र आ रहे हैं उनका स्वयं का अस्तित्त्व ही नष्ट हो गया है आज की सच्चाई को बयां करने वाली विचारणीय पोस्ट !

Nikhil के द्वारा
August 4, 2011

यही सत्य है मनोज भाई.


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