मनोज कुमार सिँह 'मयंक'

राष्ट्र, धर्म, संस्कृति पर कोई समझौता स्वीकार नही है। भारत माँ के विद्रोही को जीने का अधिकार नही है॥

76 Posts

19068 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 1151 postid : 385

श्रृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्राः

Posted On: 11 Jan, 2011 Others में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

राष्ट्रीय युवा दिवस पर विशेष

एक बहुत पुरानी कथा है | आपने भी सुनी होगी | मैं एक बार फिर से दुहराता हूँ | किसी नगर में एक लालाजी रहते थे | अपने बुद्धि और चातुर्य के बल पर उन्होंने अथाह धनराशी संकलित कर लिया था | उपभोक्ता अधिकारों का तो उन्हें इतना भान था , जितना आधुनिक काल में कन्जूमर फोरम के अधिकारियों को भी न होगा | लालाजी जिस वस्तु को एक बार भी देख लेते थे और उसका मूल्य निर्धारित कर देते थे , फिर उससे टस मस होना मुमकिन ही नहीं था | बार्गेनिंग करने में उनका कोई जवाब ही नहीं था | तात्पर्य यह की कोई भी उन्हें ठग नहीं सकता था | कहते हैं की गुण छुपाये नहीं छुपता , लिहाजा उनके इस व्यवहार कुशलता और व्यापारिक अंतर्दृष्टि की हनक पुरे देश में फ़ैल गई | इस बात को चार ठगों ने भी सुना | ठग भी बड़े धुरंधर | ऐसा कोई सयाना नहीं जिसको इन्होने ठगा न हो | ठगों ने लालाजी को ठगने का संकल्प लिया |” क्रतुमय पुरुषः” अर्थात मनुष्य संकल्पमय है | लिहाजा ऐसा कोई भी कार्य नहीं जो मनुष्य ठान ले और वह पूर्ण न हो सके | भाग्य ने ठगों को लालाजी को ठगने का अवसर भी प्रदान कर दिया |

लालाजी के मन में एक गाय खरीदने की इच्छा ने जन्म लिया | टेंगना गांव में एक पशु मेला आयोजित हुआ | लालाजी वहाँ गएँ और एक उत्तम नस्ल की गाय उन्होंने ५०० रूपये देकर खरीद लिया | गाय को लेकर वे अपने घर आने लगे | चरों ठगों ने अलग अलग लालाजी की गाय को बकरी कहना शुरू कर दिया | पहले तो लालाजी क्रोधित हुए और पहले ठग को डाट कर भगा भी दिया लेकिन फिर वाही बात दूसरे ठग ने भी कही | लालाजी को बहुत गुस्सा आया साथ ही सशंकित भी हुए और जब तीसरे ठग ने भी गाय को बकरी कहा तो लालाजी से नहीं रहा गया और उन्होंने पूछ ही लिया , ” भाई ! तुम्हे हुआ क्या है ? इतनी लंबी चौड़ी गाय को बकरी क्यों कह रहे हो ? ठग ने कहा , श्रीमान जी ! लगता है आपकी आँखों को  कुछ तकलीफ है | भला बकरी को बकरी नहीं कहेंगे तो और क्या कहेंगे ? अब लालाजी को काटो तो खून नहीं | ठग समझ गएँ की लाला जाल में फंस चूका है | चौथा ठग आया और उसने भी वही बात कही जो उससे पहले के ठगों ने कही थी , साथ ही लालाजी से पूछा की उन्होंने यह बकरी कहाँ से खरीदी है ? लालाजी ने बता दिया | अब वह ठग बोला , ” श्रीमान जी ! इसमे आपका कोई दोष नहीं | जिस गांव से आपने यह बकरी खरीदी है , उस गांव के लोग तंत्र मंत्र जानते है | उनके पास जादू की एक लकड़ी है जिसे वे लोग क्रेताओं के सिर पर फिरा देते हैं | क्रेताओं को इस बात का पता भी नहीं चलता और उन्हें बकरी , गाय और गाय ऊंट नजर आने लगती है | अच्छा आपने इस बकरी को कितने रुपये में ख़रीदा ? लालाजी ने बता दिया | ठग बड़े जोर से चिल्लाया , ” घोर कलियुग है भाइयों ! देखो किसी ने ५० रुपये की बकरी लालाजी को ५०० रुपये में बेच दी और लालाजी भी इसे गाय समझ कर बड़े शान के साथ लिए जा रहे हैं |” लालाजी अब सम्मोहित हो चुके थे | ठगों ने एक प्रस्ताव रखा , ” मान्यवर ! हम आपकी कोई मदद नहीं कर सकते , हाँ , इतना अवश्य है की जिस बकरी को आपने गाय समझ कर ५०० रुपये में क्रय किया है , उसे हम अधिक से अधिक १०० रूपये में खरीद सकते हैं ” मरता क्या न करता ? लालाजी ने हिसाब लगाया …..५० रुपये की बकरी का यह भला आदमी १०० रूपये दे रहा है , कुल मिलाकर ५० रूपये का मुनाफा होगा | जो गया सो गया ५० रुपये नफे में अब इस बकरी को बेच देने में ही भलाई है , और यह सोचकर लालाजी ने ५०० रुपये की गाय ठगों को मात्र १०० रूपये में बेच दी | मनोविज्ञान की भाषा में इसे  CONFORMITY EFFECT  कहते हैं | भारत के लगभग प्रत्येक मनोविज्ञानशाला में प्रतिवर्ष इससे सम्बंधित प्रयोग होते रहते हैं और सभी का परिणाम एक जैसा ही होता है | बड़े से बड़ा आत्मविश्वासी भी सामाजिक प्रभाव के समक्ष घुटने टेक देता है | प्रभाव सब पर पडता है , मात्रा अवश्य ही अलग अलग होती है |

यह तब की बात है जब हमारा देश वैचारिक पक्षाघात का शिकार हो चूका था | आक्रांताओं ने इसे सम्मोहित कर रखा था | भारतीयों के मन में यह बात बैठा दी गई थी कि उनकी कोई जीवन पद्यति नहीं , उनका कोई व्यक्तित्व नहीं | वे काफिर हैं , वे मुशरिक हैं , वे हीदन हैं , वे पेगन हैं | भारत सपेरों का देश है | जादूगरों का देश है | असम में जावोगे तो  वहां कि औरते तुम्हें मक्खी बना लेगी | तिब्बत में जावोगे तो लामाओं का बोझा ढोना होगा | समुद्र  यात्रा  करना महापाप है | भारत का सम्पूर्ण ज्ञान ब्रिटिश पुस्तकालय में रखे एक अलमारी से अधिक कुछ नहीं | बनारस ठगों कि राजधानी है | हरिद्वार में व्यभिचारी संतों का चोगा ओढकर कानून को धोखा देते हैं | शिवाजी एक लुटेरे थे | भारत में औरतों को जबरदस्ती आदमियों के साथ फूंक दिया जाता है | भारतीय अशिक्षित हैं | हिंदू जैसा कोई शब्द नहीं | भारतीयों की कोई राजनैतिक चेतना नहीं , उनकी कोई सामाजिक , आर्थिक  और सांस्कृतिक पहचान नहीं | भारतीय न तो विचारक हो सकते हैं और न ही दार्शनिक | यहाँ आडम्बर और झूठ का बोलबाला है | भारतीय एक अच्छा वकील , एक अच्छा राजनेता , एक अच्छा  वैज्ञानिक , एक अच्छा खिलाडी और एक अच्छा सिपाही हो ही नहीं सकता | यह तो White Man’s Burden है | जो लोग बकरदाढ़ी रखते थे उनका सम्मान किया जाता था और शिखा धारण करने वालों का मखौल उडाया जाता था | लोग अपने आपको हिंदू कहने में शर्माने लगे | “” दासता में ही मुक्ति है और प्रभुता में दासत्व ” को अपना आदर्श मानने वाली हमारी सामाजिक व्यवस्था ने पहली बार राजनैतिक दासता का दंश झेला था | यह रामगुलाम वाली आध्यात्मिक दासता नहीं जिसमे एक ब्राम्हण तुलसीदास और एक शुद्र रैदास में राम का सबसे बड़ा गुलाम बनने की सात्विक स्पर्धा हो , यह तो आयातित निरंकुश राजसत्ता की मदांध पाशविक दासता थी एकदम से ”जाके मुख देखे दुःख उपजत , ताको करिबो पडो सलाम ” वाली दुर्दांत दासता |

ऐसे समय में १२ जनवरी सन १८६३  को बंगाल प्रान्त के कलकत्ता में एक संभ्रांत कायस्थ परिवार में बालक नरेन्द्रनाथ का जन्म होता है | सूर्य मकर राशि का संक्रमण कर रहे थे | एक नए युग का प्रादुर्भाव होना था | होनहार बिरवान के होत चीकने पात | यही बालक आगे चलकर भारतीय पुनर्जागरण का सबसे बड़ा उत्प्रेरक स्वामी विवेकानंद बनता है | जब हिंदू  सिर झुकाकर इस तरह से अपना परिचय देते थे मानों कोई बहुत बड़ा अपराध हो गया हो तब वैज्ञानिक समृद्धि के शिखर पर विराजमान  अमेरिका में स्वामी विवेकानंद की सिंह गर्जना सुनाई पड़ती है गर्व से कहो की हम हिंदू है और सारा संसार मत्रमुग्ध सा स्वामीजी के इस कथन का अनुसमर्थन करता है | यह कथन किसी ऐरे गैरे नत्थुखैरे का नहीं डेविड ह्यूम , इम्मान्युअल कांट , फित्से , स्पिनोजा , हीगल , स्कोपेन्हावर , आगस्ट काम्टे , हरबर्ट स्पेंसर , जान स्टुअर्ट मिल  और चार्ल्स डार्विन जैसे उद्भट पाश्चात्य विद्वानों और उनकी सम्पूर्ण कृतिओं को कंठस्थ कर लेने वाले अप्रतिम अध्येता स्वामी विवेकानंद का था |

उत्थान पतन सृष्टि का अपरिवर्तनीय नियम है | जो जन्म लेता है उसे मरना ही पड़ता है | संसार के सभी व्यक्तियों को सांसारिक कष्ट भोगने पड़ते हैं | स्वामी विवेकानंद को भी इन परिस्थितियों से दो चार होना पड़ा | समय ने उन्हें दाने दाने का मुहताज बना दिया | घर के बर्तन भांड सब कर्ज चुकाने में चले गए | आध्यात्मिक चेतना , भौतिक क्षुधा के सामने नतमस्तक होने ही वाली थी | विवेकानंद ने अपना संकट अपने गुरु के सामने रखा | रामकृष्ण परमहंस ने कहा जाओ माँ से अपनी व्यथा व्यक्त करो , मैं नहीं जाता | विवेकानंद  तीन बार गए | तीनों बार उन्होंने ज्ञान , विवेक , प्रज्ञा , धृति ही माँगा | सूरदास कहू कामधेनु तजि छेरी कौन दुहावै | धन की याचना उनके कंठ से नहीं निकली | गुरु को अपनी ओर से कहना पड़ा …..जाओ , तुम्हे खाने और पहनने की कोई कमी नहीं होगी | किशोरावस्था में जिस ईश्वर के अस्तित्व को उन्होंने ख़ारिज कर दिया था , वही ईश्वर अब प्रतिपल छाये की भांति उनके साथ था | मनुष्यों को जिस प्रकार मनुष्य दिखाई पड़ते हैं , उनको आत्म्ब्र्म्ह दिखाई पडता था | मात्र उदर का ही पोषण उनके लिए महत्वपूर्ण नहीं था , उन्हें तो भारतीयों की खोई अस्मिता उन्हें लौटानी थी |

डॉ विलियम हस्ती ने लिखा ,” नरेंद्र वास्तव में एक प्रतिभाशाली बालक है | मैंने दूर दूर तक यात्रा की किन्तु उसके जैसी संभावनाओं और क्षमताओं वाला कोई लड़का जर्मन विश्वविद्यालयों के दर्शन विभागों में भी नहीं मिला ”

सन १८८८ में स्वामी रामकृष्ण परमहंस के स्वर्गवास के उपरांत स्वामी विवेकानंद युवा सन्यासी के वेश में भारत भ्रमण को निकल पड़े | करतल भिक्षा , तरुतल वासः का उद्देश्य लेकर पैदल ही उन्होंने सम्पूर्ण भारत का भ्रमण किया | बार बार उनके मन में एक ही विचार आता ….मुझे गुरुदेव ने निर्विकल्प समाधी के सुख से वंचित क्यों किया ? वह कौन सा कार्य है जो वह अज्ञात सत्ता मुझसे करवाना चाहती है ?

भारत भ्रमण के दौरान उन्हें विभिन्न प्रकार के अनुभव हुए | वाराणसी के दुर्गाकुंड नामक स्थान पर उन्हें बंदरों ने दौड़ा लिया | स्वामीजी सरपट भागे | पास ही एक अन्य तरुण सन्यासी साधनारत था | उसने चिल्ला कर कहा ….भागो मत , रुको और मुकाबला करो |नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः यह आत्मा बलहीनों के लिए नहीं है | उपनिषदों का यह घोष वाक्य मानों सजीव हो उठा | काशी से प्राप्त यह शिक्षा आजीवन उनके साथ रही |

फिर वह दिन भी आया जब पूरा विश्व वेदों , उपनिषदों , पुराणों , स्मृतियों और महाकाव्यों में वर्णित महान सत्य का साक्षात्कार करने को व्यग्र हो उठा ११ सितम्बर १८९३ शिकागो ( जहाँ पहले केवल एक जंगली प्याज शिकागो उगा करती थी ) के आर्ट इन्स्टिच्युट में भारत की सनातन मेधा स्वामी विवेकानन्द का आश्रय पाकर फूट पड़ी | श्रृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्राः ……हे विश्व के अमृत पुत्रों सुनों …या दूसरे शब्दों में मेरे अमेरिका निवासी भगिनी और भात्रिगन | इससे पहले के सारे वक्ता मलिन हो गए | स्वामीजी ने एक संक्षिप्त सा उद्बोधन दिया और सात हजार श्रोता मत्रमुग्ध होकर लगातार दो मिनट तक ताली ही बजाते रहें | मानों सरस्वती स्वयं पुरुष वेश धारण कर अपने दिव्य वीणा का वादन कर रही हों | आधुनिकता अकुर पाशविक स्पर्धा की चक्की में पिसते पश्चिमी जगत में सबको अपना मानने वाली दिव्यसत्ता  का आध्यात्मिक महाविस्फोट हुआ था | ऐसा महान सन्देश अमेरिकियों ने पहले कभी नहीं सुना था | दूसरे दिन अमेरिका के समस्त समाचार पत्र  स्वामी जी के भाषण से पटे पड़े थे |

New York Herald ने लिखा ,” Vivekanand is undoubtedly the greatest figure  in the parliament of religions , After hearing him , we feel how foolish it is to send missionaries to this learned nation “

स्वामी विवेकानंद ने सम्पूर्ण अमेरिका और यूरोप का भ्रमण किया और | स्थान स्थान पर उनके प्रवचन आयोजित किये गए | पाश्चात्य जगत द्वारा भारत पर लगाया गया कलंक एक झटके में नेस्तनाबूद हो गया | हमारी सभ्यता रोम और यूनान की सभ्यता से भी अधिक प्राचीन है  और अक्षुण्ण है ….इस तरह का भाव एक बार फिर से भारत भुवन में प्रसारित होने लगी |

यह बात कतिपय लोगों को अच्छी नहीं लगी है | भारत की कोई मूल सभ्यता नहीं , आर्य भी अन्यों की भांति एक आक्रांता थे | इस तरह का मिथ्या प्रचार अब भी बदस्तूर जारी है | हे विवेकानंद ! तुम कब आओगे ?

| NEXT



Tags:               

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (3 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

20 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Amit Dehati के द्वारा
January 13, 2011

मनोज जी ! प्रणाम ! अति सुंदर ! बहुत मेहनत से आपने महान युगपुरुष को याद किया | आपको बधाई और युग पुरुष को कोटिश: नमन ! http://amitdehati.jagranjunction.com

ashvinikumar के द्वारा
January 13, 2011

प्रिय अनुज,, विवेकानन्द जी का आवाहन अत्याधिक मनभावन लगा , भारत में चंगेजी मानसिकता का वास हो रहा है वही मानसिकता जो कालान्तर में कभी सुप्त हुई तो कभी अत्याधिक बलवती,,आज तो अर्जुन के आवाहन की आवश्यकता है (या फिर) जब जब होही धर्म की हानि ,बाढ़े असुर महा अभिमानी ,, को पुनः या उनके वीरोचित विचारों की आवश्यकता है ,क्योंकि हर क्रान्ति आहुतियाँ मांगती है वीरों की …..जय भारत

preetam thakur के द्वारा
January 13, 2011

मनोज जी ! प्रणाम ! अति सुंदर ! बहुत मेहनत से आपने महान युगपुरुष को याद किया | आपको बधाई और युग पुरुष को कोटिश: नमन ! एक मोड़ पर कोई न कोई महापुरुष हम को जीने की राह दिखा जाता है | ये हमारा दुर्भाग्य है की हम उनके उपदेशों यानि बताये रास्ते को भूल जाते हैं और वापिस फिर उसी मोड़ पर आ खड़े होते हैं | उसकी पूजा भी करते हैं उसकी मूर्ति बनाकर उसके सोलह सिंगार, आरती जाने क्या क्या करते हैं और पुकारते हैं ,”कब आओगे भगवन?? “अगर भारत के पुत्तर गीता के ७०० श्लोकों का अनुसरण करना सीख सकते तो श्री कृष्ण जी को बार बार उसी मोड़ पर किसी न किसी रूप में आकर उनको रास्ता (Art of living) न दिखाना पड़ता | धन्यवाद |

rajeev dubey के द्वारा
January 12, 2011

विवेकानंद ने सोये हुए भारत को जगाया…आपका लेख अच्छा लगा, उनका स्वप्न अभी इंतज़ार कर रहा है कि भारत के कर्मयोद्धा उठ खड़े हों

    Emmy के द्वारा
    July 12, 2016

    Rusty,I think he’s saying welcome to the world the rest of us have been living in for years.That’s a comment about DKL’s neighborhood, as well as a way of saying “get over it”, which is on top of the inconsiderate pyramid. Unless you have an equally compelling story to tell about how all this discouragement over declining safety in one’s neighborhood is off base, I wouldn’t suggest jumping on the P LLC boat.Peter LLC,Not only do I think you wear baggy pants, I found a funny joke in your comment:You might be a s**tbag if2&;#308You’re fascinated with others’ colons.

allrounder के द्वारा
January 12, 2011

बन्दे मातरम मनोज भाई, एक और बेहतरीन प्रस्तुति के लिए आपको बधाई !

Alka Gupta के द्वारा
January 12, 2011

मनोज जी , अनेक उद्धरणों के साथ स्वामी विवेकानंद जी के प्रेरणाप्रद विचारों व कथ्यों को बहुत ही सुन्दर शैली में प्रस्तुत किया गया है ! ऐसी महान पुण्यात्माओं को मेरा शत शत नमन !

    Alka Gupta के द्वारा
    January 12, 2011

    मनोज जी, आपकी पोस्ट पर कमेंट नहीं पहुँच रहे थे इसलिए मैंने दो-तीन बार प्रयत्न किया था फिर हार कर छोड़ दिया अभी जब फिर बैठी तो अपना नाम ३ बार एक साथ देख कर आश्चर्य हुआ लगता है सभी एक साथ किसी अन्य द्वार से धीरे धीरे चल कर आपके पास पहुँच गए…………. आपकी पिछली पोस्ट पर भी यही हुआ…… !

    rajkamal के द्वारा
    January 14, 2011

    आदरणीय अलका जी ..सादर अभिवादन ! कमेण्ट तो पहुँच गए है … अब तो उन सभी के जवाब पहुँचने बाकी है …

Alka Gupta के द्वारा
January 12, 2011

मनोज जी , अनेक उद्धरणों के साथ स्वामी विवेकानंद जी के प्रेरणाप्रद विचारों व कथ्यों को बहुत ही सुन्दर शैली में प्रस्तुत किया है ! ऐसी महान पुण्यात्माओं को मेरा शत शत नमन ! धन्यवाद !

Alka Gupta के द्वारा
January 12, 2011

मनोज जी , विभिन्न उद्धरणों के साथ सभी के प्रेरणा स्रोत महान आत्मा स्वामी विवेकानंद जी के विचारों को बहुत ही सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया है ! राष्ट्र के प्रति पूर्ण रूपेण समर्पित ऐसी पुण्यात्माओं को मेरा शत शत नमन !

HIMANSHU BHATT के द्वारा
January 12, 2011

मनोज जी, आपका लेख बेहतरीन है…… इससे कोई फर्क नहीं पड़ता की हम कौन थे…. कहाँ से आये…. फर्क तो तब पड़ता है जब हम स्वयं को पहचान पायें….. गर्व से कहो हम हिन्दू हैं….. शायद विवेकानंद का पूर्ण चित्रण नहीं है….. क्यूंकि हिन्दू या कोई और …. कोई फर्क नहीं डालता है….. ये सब सम्प्रदाय तो हमारे अहम् के द्योतक हैं….. हर धर्म या जाती स्वयं को श्रेष्ठ कह कर अपने अहम् को पूरित करती है….. सभी श्रेष्ठ हैं क्यूंकि सभी उस इश्वर की रचना हैं….. ‘इस्लामिक शरीर और वेदांती मानसिकता’ जैसा की रशीद भाई कह रहे हैं….. शब्दों का जाल है….. स्वयं का तुस्टीकरण हैं….. जानिए उस विवेकानंद को जिसने खोजा था स्वयं को…… शब्दों को मत पकडिये ये तो कालानुसार, विवेकानुसार अपना अर्थ बदल लेते हें ……. यदि मेरी बातों से किसी को ठेस लगती हो तो क्षमा चाहूँगा….. लेकिन अपनी राय प्रस्तुत करना मै अपना अधिकार समझता हूँ…… धन्यवाद.

Rashid के द्वारा
January 12, 2011

मनोज भाई,,, विवेकानंद जी के बारे में दो पंक्तिया लिखना चाहूँगा !! – जब लगा देखने मानचित्र भारत न मिला तुझको पाया जब देखा तेरी आँखों में भारत का चित्र उभर आया – मनोज भाई ,, मैंने सुना है की विवेकानंद जी ने ‘इस्लामिक शरीर और वेदांती मानसिकता’ को आदर्श बताया था, अगर आप इसपर थोड़ी रोशनी डाल दे तो मेरी जानकारी मे इजाफा होगा ! raashid

abodhbaalak के द्वारा
January 12, 2011

मनोज जी, स्वामी जी, के जो वचन थे वही कर्म थे, और वही उन्हें इतनी उंचाई तक ले कर जाते हैं, को वो करोडो लोगों के प्रेरणा स्रोत्र है, काश आजके युवक और विशेषकर राजनेता …… तो हमारा देश आज कहाँ होता! बहुत सुन्दर पोस्ट, बंधाई स्वीकार करें http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

nishamittal के द्वारा
January 12, 2011

बधाई मनोज जी,स्वामी विवेकानंद जी पर सुन्दर लेख की.इसी लिए मैंने अपने लेख में लिखा है कि इतनी छोटी सी अवधि में इतनी विघ्न-बाधाओं को पार कर विदेशियों के मध्य हमारी बुलंद पताका लहराने वाले स्वामी जी को कोटिश प्रणाम.

kmmishra के द्वारा
January 12, 2011

प्रिय मित्र मनोज सादर वंदेमातरम ! हम सभी भारतीयों को विवेकानंद से प्रेरणा लेनी चाहिये । आधुनिक युग में जब भारत की पहचान सपेरों हाथियों के देश की थी तब उन्होंने भारत की पहचान एक विश्वगुरू के रूप में शिकागों सम्मेलन में दुनिया को करायी । वह दृष्टि, ऊर्जा रखने वाला अब कोयी युवा नहीं दिखता है । उन्होंने कहा था कि पहले देश है ईश्वर उसके बाद आता है । विवेकानंद जी से प्रेरणा लेकर ही सुभाष बाबू, गांधी-नेहरू से भी अधिक महान हुये । युवा का मतलब है ऊर्जा । दुनिया को बदलने की शक्ति । आज भारत में सबसे अधिक युवा हैं । आज के दिन सभी युवा संकल्प लें कि हम भारत को विश्वशक्ति बनाकर ही दम लेंगे । जय हिंद ।

वाहिद काशीवासी के द्वारा
January 12, 2011

प्रिय मनोज जी| यूँ तो स्वामी जी भारत वर्ष के जन-जन के हृदय में आरूढ़ हैं… फिर भी एक बार उनका पुण्य स्मरण कराने के लिए आपको सहस्त्र साधुवाद| निशाजी ने भी अपने नवीन लेख में उनका उल्लेख किया है साथ ही शास्त्री जी की पुण्यतिथि पर उन्हें याद करके भावभीनी श्रद्धांजलि देना भी हमारे आपके जैसे काशीवासियों का परम कर्त्तव्य है..| अंततः.. स्वामी जी अभी भी हमारे और आपके जैसे लोगों के बीच जीवित हैं उन्हें पुनः बुलाने या पुकारने की आवश्यकता नहीं| यदि हम आप जैसे लोग एक बार दृढ़ता से ठान लें कि इस का निष्पादन किसी भी मूल्य पर करना है तो वह होकर रहेगा.. बस सहयोग और संयम बनाये रखने की आवश्यकता है हमें… वंदे मातरम!!

rajkamal के द्वारा
January 11, 2011

प्रिय मनोज जी … वन्दे मातरम ! आप का लेख हिटलर के समय के गोयबल्स के सिद्धांत की पुष्टि करता है …जिसने कहा था की अगर किसी झूठी बात कों भी तुम बार -२ सच कहने लगोगे तो लोगों के लिए वोह सच ही हो जाएगा … स्वामी विवेकानन्द जी का प्रभाव इतना था की उनकी यात्रा के दौरान एक रेलवेस्टेशन का स्टेशन मास्टर उनको देखते ही अपनी सरकारी नोकरी छोड़ कर उनके साथ ही उनकी यात्रा में शामिल हो गया था …. ऐसे महान संत कों शत शत नमन

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
January 11, 2011

आदरणीय भ्राता मनोज जी…….. बहुत सुंदर रचना……. विवेकानंद ने जिस तरह हिन्दू धर्म की पताका को पूरे विश्व मे फहराया वो अदभूद है…. स्वामी विवेकानंद जी के भाषण को सुनने के लिए वो वैज्ञानिक भी आते थे जो भोजन के लिये तक अपने काम से उठना पसंद नहीं करते थे………. …. ऐसी कुछ विलक्षण प्रतिभा कभी कभी ही इस धारा पर अवतरित होती है…… ऐसा फिर हो इसी कामना के साथ………………… …. वंदेमातरम……….

    atharvavedamanoj के द्वारा
    January 11, 2011

    आमीन भाई पियूष जी …. इतना ही नहीं…योरप की विलासिनी सुंदरियाँ और भौतिकता में आकंठ डूबे हुए भद्र मानुष भी न सिर्फ स्वामीजी का प्रवचन सुनने आते थे वरन दिन रात कुर्सियों से चिपके हुए ब्यूरोक्रेट्स भी स्वामीजी के समक्ष दरी पर बैठने में भी अपनी शान समझते थे ….सक्रमण की इस बेला में काश ऐसा दिव्य व्यक्तित्व पुनः अवतरित हो….इन्ही कामनाओं के साथ आपका आभार


topic of the week



latest from jagran