मनोज कुमार सिँह 'मयंक'

राष्ट्र, धर्म, संस्कृति पर कोई समझौता स्वीकार नही है। भारत माँ के विद्रोही को जीने का अधिकार नही है॥

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सावधान अब मृत्यु निकट है

Posted On: 8 Jan, 2011 Others में

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फिर संकट घनघोर विकट है, सावधान अब मृत्यु निकट है |

मंदिर जैसे श्राप हो गया,

ध्वज फहराना पाप हो गया |

” हर  एक हिंदू आतंकी है ”

यह  नारायण जाप  हो गया |
आरक्षण की लौह श्रृंखला में बंदी संगम का तट है |

फिर संकट घनघोर विकट है, सावधान अब मृत्यु निकट है |

जिसने रक्त पिलाकर पाला,

देह जलाकर किया उजाला |

इंद्रप्रस्थ के सिंहासन ने

उसपर आज हलाहल डाला |

सीमा के इस ओर प्रलय को आमंत्रण गुपचुप, खटपट है|

फिर संकट घनघोर विकट है, सावधान अब मृत्यु निकट है |

सूरज की किरणों को गाली,

ग्रसने को आतुर है लाली

राहू केतु ने मुंह फैलाया

संग शक्तियां काली काली|

रोज नया नाटक रचता है, यह कैसा मायावी नट है ?

फिर संकट घनघोर विकट है, सावधान अब मृत्यु निकट है |

जमी हुई है तट पर काई,

तलछट में फैली चिकनाई|

हुआ प्रदूषित पूर्ण सरोवर,

पुण्य माघ की बेला आई |
चाहे जितना गंदला हो जल, डुबकी को आतुर जमघट है |
फिर संकट घनघोर विकट है, सावधान अब मृत्यु निकट है |

जनहठ पर नृपहठ है भारी,

निर्वाचित होते व्यापारी |

हुई निरर्थक राष्ट्र चेतना,

भूखी, नंगी जनता सारी |
पापगान में गम कान्हा का सामगान और वंशीवट है |
फिर संकट घनघोर विकट है, सावधान अब मृत्यु निकट है |

जिसने कूल्हों को मटकाया |

कोटि कोटि पण उसने पाया |

वही राजनेता है भारी -

जिसने जनता को भटकाया |

इसे हिला भी नहीं सकेंगे, जमा हुआ अंगद का पग है |
फिर संकट घनघोर विकट है, सावधान अब मृत्यु निकट है |

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338 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

nishamittal के द्वारा
January 9, 2011

मनोज जी,झकझोरने वाली रचना आपकी काश!देश के इन कर्णधारों को भी झकझोर सके आपकी रचना.प्रयास निरंतर करना ही होगा.

    atharvavedamanoj के द्वारा
    January 11, 2011

    आदरणीय निशा जी…. इस तरह का निरतर प्रयास ही शायद इस देश की चेतना को जगा सके …..मजें तो भरसक प्रयत्न करता ही हूँ ….आपकी प्रतिक्रियाएं इसमें और भी मार्गदर्शन करती हैं ….आपका आभार …जय भारत , जय भारती

preetam thakur के द्वारा
January 8, 2011

आदरनीय वेड जी ! प्रणाम ! कमाल का तसवुर दिया है मालिक ने आपको | मुबारक | परन्तु मृत्यु??? कदापि नहीं | विचारधारा को कभी मृत्यु नहीं ले जाती !! देह तो नश्वर है ही फिर मृत्यु का ज़िक्र क्यों ???? सुन्दर विचार और भाव पूर्ण अभिव्यक्ति के लिए बधाई | प्रीतम |

    atharvavedamanoj के द्वारा
    January 9, 2011

    आदरणीय प्रीतम जी यह सत्य है की आत्मा अनश्वर है किन्तु केन्द्रित तो काया में ही है न…काया रखे धर्म है….जब विचारधारा को मानने वाले लोग ही नहीं रहेंगे तो विचारधारा कहाँ बचेगी….कम से कम इतिहास तो हमें यही सिखलाता है| जय भारत, जय भारती

preetam thakur के द्वारा
January 8, 2011

वेद जी ! प्रणाम ! कमाल का तस्सवुर दिया है मालिक ने आपको !!! मुबारक !! परन्तु…….मृत्यू? ….कभी नहीं | विचारों को कभी मौत नहीं आती | देह के लिए क्यों चिंता ??? धन्यवाद | प्रीतम |

    atharvavedamanoj के द्वारा
    January 9, 2011

    आदरणीय प्रीतम जी यह सत्य है की आत्मा अनश्वर है किन्तु केन्द्रित तो काया में ही है न…काया रखे धर्म है….जब विचारधारा को मानने वाले लोग ही नहीं रहेंगे तो विचारधारा कहाँ बचेगी….कम से कम इतिहास तो हमें यही सिखलाता है| जय भारत, जय भारती शरीरमाद्यम खलु धर्मसाधनं

kmmishra के द्वारा
January 8, 2011

मनोज जी सादर वंदेमातरम !मित्र शब्द नहीं है कुछ कहने के लिये । अगर कविता नाम की कोयी चीज होती है तो वह बस यही है यही है यही है । देश की वास्तविक स्थिति को आईने की तरह एक दम साफ साफ दिख दिया आपने कविता के माध्यम से । आभारी हूं ।

    atharvavedamanoj के द्वारा
    January 9, 2011

    प्रिय मित्र मिश्रा जी सादर वन्देमातरम…… प्रतिक्रिया का कोटिशः आभार वन्देमातरम.. हम धरा के दिव्यतम उपहार वन्देमातरम आपका आभार

rajkamal के द्वारा
January 8, 2011

पुण्य माघ की बेला आई | चाहे जितना गंदला हो जल, डुबकी को आतुर जमघट है | फिर संकट घनघोर विकट है, सावधान अब मृत्यु निकट है | प्रिय मनोज जी …वन्दे मातरम ! इस कविता की तारीफ में सुन्दरतम शब्द भी छोटा पड़ जायेगा …. बहुत -२ मुबारकबाद

    atharvavedamanoj के द्वारा
    January 8, 2011

    वन्देमातरम राजकमल भाई…. आपकी प्रतिक्रिया मुझे कुछ और सार्थक और अच्छा लिखने को प्रेरित करती हैं….मैं हरपल आपकी prtikriyaon का शुक्रगुजार हूँ …..आपका एक साथी ….जय भारत, जय भारती

वाहिद काशीवासी के द्वारा
January 8, 2011

आदरणीय मनोज जी! “संकट विकट सही, मृत्यु निकट सही, एक साथ एक बात, एक लक्ष्य को चलें, देशद्रोह के मंसूबों को मिलकर ध्वस्त करें.” राष्ट्र के समक्ष उपस्थित भितरघाती तत्वों के प्रति जागरूक करती इस ओजपूर्ण कविता के लिए शुक्रिया| मैं काशी में काशी हिंदू विश्वविद्यालय के निकट ही रहता हूँ| आपके मेल का जवाब मैंने भेजा था कृपया अपने मैल्बोक्स का जंक/स्पैम मेल फोल्डर चेक कर लें | मेरी दूरभाष संख्या है – साभार,

    atharvavedamanoj के द्वारा
    January 9, 2011

    अब तो आप ही साथ के हूँ बंधू …. कहा गया है न ” जेहि पर जाकर सत्य सनेहू , अवसि मिलै नही कोई संदेहू | देशद्रोह के मंसूबों को मिलकर ध्वस्त करेंगे..एक संग और एक साथ पग पथ पर सदा रखेंगे| वन्देमातरम

Rashid के द्वारा
January 8, 2011

मनोज जी ,, मेरा मन हमेशा आप की रचनाओं पर कमेन्ट करने को चाहता है लेकिन फिर हाथ रुक जाता है की मनोज भाई शायद हम लोगो के बारे में अच्छे ख्याल नहीं रखते है , लेकिन आप की इस सुन्दर प्रस्तुति ने मजबूर कर दिया ! मनोज भाई मुझे आप की कविताओ में सूफीवाद की झलक मिलती है जहाँ मनुष्य अपना सबकुछ भगवान को अर्पण कर देना चाहता और और स्वयं के अहम् को ख़तम कर देता है, जिसे हर ज़र्रे में , हर जीव में खुदा और भगवान् दिखाई देता है ! हो सकता है मेरा यह नजरिया गलत हो लेकिन आखिर हम है तो एक ही परमेश्वर की कृति, एक ही राह के साधक और राही !! अगर कुछ गलत लगे तो please नाराज़ मत हो राशिद http://rashid.jagranjunction.com

    atharvavedamanoj के द्वारा
    January 8, 2011

    राशिद भाई कमाल है…आपने भी मुझे गलत समझ लिया….मैं इस बात को अच्छी तरह से समझता हूँ की मेरी रचनाओं को सबसे अधिक हिट आप लोगों की तरफ से मिलती है….यदि मेरी रचना से आपकी भावनाओं को ठेस पहुंची है तो मैं हाँथ जोड़कर आपसे माफ़ी मांगता हूँ….प्रिय मित्र ….आप ही देखो न jahan देखो wahin..जिसे देखों वही बिना कुछ जाने समझे…बिना मतलब के हमारी जीवन प्द्ध्यती को गरियाते मिल जाता है….नेतृत्व तो पूरी तरह अंधा हो चूका है….उसे सही और गलत की कुछ पहचान ही नहीं है….कश्मीर को जान बुझ कर विवादित बनाया जा रहा है…हमारे तर्कसंगत मांग को भी अनसुना करके हमें अपने ही देश में हासिये पर धकेल दिया जा रहा है…ऐसे परिप्रेक्ष्य में मैंने एक कल्पित कट्टरता और कठोरता ओढ़ रखी है तो केवल इसलिए की हमारी बची खुची प्रतिष्ठा धुल धूसरित होने से बच जाए…मैं यह मानता हूँ की भावनाओं के अतिरेक में मैंने कुछ असंगत कहा है लेकिन उसमे कहीं भी निशाना आप लोग नहीं थे…हाँ आपलोगों के कंधे पर बन्दुक रख कर मैंने छद्म धर्मनिरपेक्ष शक्तियों पर अवश्य निशाना लगाया है….मैंने अपने घर में आर्ष ग्रंथों के ही साथ कुरान और गीता भी एक साथ ही रखा हुआ है और तिलावत भी पूरी आचार पद्यति के साथ ही करता हूँ किन्तु हिंदुत्व की कीमत पर मुझे कुछ भी स्वीकार नहीं हैं…..आप अपना धर्म निभाएं और मैं अपना धर्म निभाऊंगा….आप खुदा कहें और मैं राम कहता हूँ लेकिन अगर कोई हमारी आचार पद्यति को मुखौटा कहेगा तो उसके लिए मैं साक्षात् महाकाल ही हूँ …..आपका नजरिया कहीं भी गलत नहीं है रशीद भाई……कट्टरता जहाँ कहीं भी हो उसका कट्टरता के साथ विनाश होना चाहिए….जय भारत, जय भारती

    kmmishra के द्वारा
    January 8, 2011

    दो भाईयों का मिलन हुआ है । अब एक और एक ग्यारह हैं । राष्ट्रधर्म सर्वोच्च धर्म है । न उससे पहले कुछ, न उसके बाद कुछ । जय भारत, जय भारती ।

Deepak Sahu के द्वारा
January 8, 2011

मनोज जी ! सच्चाई को बतलाती एक बहुत ही सुन्दर रचना! बधाई! दीपक http://deepakkumarsahu.jagranjunction.com/

    atharvavedamanoj के द्वारा
    January 8, 2011

    प्रिय मित्र दीपक जी…. आपकी प्रतिक्रिया का कोटिशः आभार…..वन्देमातरम

roshni के द्वारा
January 8, 2011

मनोज जी अपने देश में अपना तिरंगा फेहराना भी पाप हो गया, शायद इतिहास एक बार फिर अपने आप को दोहराना चाहता है हमे हमारे देश में ही गुलाम बना कर दूसरों के इशारो पे चलाना चाहता है… मगर इस बार हमे पहले से ही जागना होगा …… बहुत सुंदर रचना

    atharvavedamanoj के द्वारा
    January 8, 2011

    वन्देमातरम रोशनी जी…. आज हमें अपनों के ही द्वारा मानसिक रूप से गुलाम बनाया जा रहा है….और इसीलिए तिरंगा फहराना अपने देश में पाप हो गया है…हमने भगवा फहराने की तो कामना नहीं की…लेकिन जो भी हमें तिरंगा फहराने से रोकेगा वह राष्ट्रघाती है…और उसको सजायेमौत से कम हमें स्वीकार नहीं है| आपकी प्रतिक्रिया का कोटिशःआभार

    Betsy के द्वारा
    July 12, 2016

    WHat a elegant and stylish card you have made! Love the clean touch, and the gorgeous image.Thank you so much for sharing at the Midnight Madness Sketch Chlleenga.Hugs Guro

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
January 8, 2011

वन्देमातरम मनोज जी…………. फिर संकट घनघोर विकट है, सावधान अब मृत्यु निकट है | मंदिर जैसे श्राप हो गया, ध्वज फहराना पाप हो गया | ” हर एक हिंदू आतंकी है ” यह नारायण जाप हो गया | बहुत ही खूबसूरत रचना……….. वर्तमान हालातों पर सटीक काव्यात्मक चोट………..

    atharvavedamanoj के द्वारा
    January 8, 2011

    प्रिय मित्र पियूष जी वन्देमातरम…आपकी तुरत प्रतिक्रिया से यह ज्ञात होता है की आप ऑनलाइन हैं…..चलिए आपको तुरंत फोलो अप भी मिल जाएगा…आपके प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहती है….आपका आभार…जय भारत…जय भारती

abodhbaalak के द्वारा
January 8, 2011

समय बड़ा बलवान है मनोज जी, जो आज है वो कल नहीं होगा और जो कल ….. कुछ पर स्थाई नहीं है. बस तेल देखिये और तेल की धर सुन्दर रचना …. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    atharvavedamanoj के द्वारा
    January 8, 2011

    प्रिय अबोध बालक जी …. ”प्रत्यायन्ति गतः पुनर्न दिवसः कालो जगतभक्षकः” सत्य है का मांगूं कुछ थिर न रहाई, देखत नैन चला जग जाई….लेकिन प्रयास तो करना ही पड़ेगा न| अगर मृत्यु है तो मृत्यु से निवारण का उपाय भी हैं| आपका कोटिशः आभार …जय भारत, जय भारती


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