मनोज कुमार सिँह 'मयंक'

राष्ट्र, धर्म, संस्कृति पर कोई समझौता स्वीकार नही है। भारत माँ के विद्रोही को जीने का अधिकार नही है॥

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कविताएँ रह गईं अधूरी (गीत)

Posted On: 6 Jan, 2011 Others में

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कभी न पूरी हो पाती है, मन की मन में रह जाती है |

कैसा शैशव और तरुणाई?

केवल सिसकी और रुलाई|

नियति नटी का नृत्य अनोखा

जब देखो आखें भर आयीं|

मस्त कोकिला भी रोती है जब पंचम स्वर में गाती है |

कभी न पूरी हो पाती है, मन की मन में रह जाती है |

मिटी नहीं हृदयों से दूरी,

कवितायें रह गयी अधूरी|
जाने कितना और है जाना?

यात्रा कब यह होगी पूरी?
संशयग्रस्त बना कर जीवन मृगतृष्णा छलती जाती है |

कभी न पूरी हो पाती है, मन की मन में रह जाती है |

पूरा दीपक, पूरी बाती,

तेल नहीं लेकिन किंचित भी |
बेकारी मजबूर बनाती,

अन्धकार का शाश्वत साथी |
तोड़ रहा दम इक दाने को पौरुष की चौड़ी छाती है |
कभी न पूरी हो पाती है, मन की मन में रह जाती है |

तेरा तो प्रभु सोने का है,

मेरी तो माटी की मूरत|
वंदनीय है तेरा आनन,

मेरी बचकानी सी सूरत |
चिंदी में लिपटे लोगों की छाया भी मुंह बिचकाती है|
कभी न पूरी हो पाती है, मन की मन में रह जाती है |

कहते हैं संघर्ष हमेशा

सत्य सदा विजयी होता है |
जिसमे साहस है वह जीता |
केवल कायर ही रोता है |
यम नियमों के बंधन वाली यह छलना छलती जाती है |
कभी न पूरी हो पाती है, मन की मन में रह जाती है |

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31 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
January 14, 2011

मनोज जी सादर वन्देमातरम … बहुत सुन्दर रचना, आपकी इस रचना का हर पद अपे आप में विशिष्ट लगा … कहते हैं संघर्ष हमेशा सत्य सदा विजयी होता है | जिसमे साहस है वह जीता | केवल कायर ही रोता है | यम नियमों के बंधन वाली यह छलना छलती जाती है | कभी न पूरी हो पाती है, मन की मन में रह जाती है | मनोज जी आशा और निराश जी जीवन के आधार हैं…… जहाँ आशा ही निराशा का कारण है वहीँ, निराशा ही आशा की नयी ज्योति जलाने के आवशयक स्नेहक भी है …….. और इन दोनों के साथ जीवन का सामंजस्य स्थापित करना अपने आप में एक जातिक कार्य है ….. परन्तु यही कार्य तो सृजन की प्रेरणा है ……

kmmishra के द्वारा
January 8, 2011

मनोज जी सादर वंदेमातरम ! नये वर्ष और दशक मंे मुझे नहीं लगता कि मन की मन में रह जायेगी । सभी अभिलाषाएं पूरी होंगी, आपकी भी, हमारी भी और सभी राष्ट्रवादी ब्लागर्स मित्रों की भी । जय भारत, जय भारती ।

    atharvavedamanoj के द्वारा
    January 8, 2011

    आमीन मिश्रा जी…. भगवन करें की सभी की सब अभिलाषाएं पूरी हो…चलिए एक और साल प्रतीक्षा कर के देखते हैं …..आपका कोटिशः आभार …जय भारत, जय भारती

danishmasood के द्वारा
January 7, 2011

मनोज जी ………………. आपका गीत लायबद्ध, एंव रस से परिपूर्ण है | अति सुन्दर रचना…………… कहते हैं संघर्ष हमेशा सत्य सदा विजयी होता है | जिसमे साहस है वह जीता | केवल कायर ही रोता है | यम नियमों के बंधन वाली यह छलना छलती जाती है | भले यह एक भ्रम ही हो किन्तु इस भ्रम के सहारे कई करोड़ लोग जीवन यापन कर रहे हैं ……… डूबते को तिनके का सहारा……………

    atharvavedamanoj के द्वारा
    January 8, 2011

    प्रिय दानिश भाई … इसी बात का तो दुःख है …किसी के स्विस खातों में करोणों की धन राशी धुल फांक रही हो और किसी को यम नियमों का पाठ पढाया जाय…भले ही करोनो लोग इसी भ्रम के सहारे जी रहें हों लेकिन वे वास्तव में सांस ही ले रहें हैं जीवन हेतु जो स्पंदन उनकी काया में होना चाहिए क्षमा कीजियेगा, वह मुझे कहीं भी नजर नहीं आता ….रोटी के लिए चोरी करना महापाप हैं और किसी भूख से बिलखते देखना उससे भी बढ़कर…लेकिन आज हमारा नेतृत्व यही कर रहा है ……आपका आभार …जय भारत, जय भारती

allrounder के द्वारा
January 7, 2011

वन्देमातरम मनोज भाई, बेहतरीन कविता के लिए बधाई !

    atharvavedamanoj के द्वारा
    January 8, 2011

    भाई सचिन जी… आपकी बैटिंग तो छक्के छुड़ा देती है ….अभी आप पर भी प्रतिक्रिया करने आ रहा हूँ ….आपका आभार …जय भारत..जय भारती

rkpandey के द्वारा
January 7, 2011

राष्ट्रवादी व्यक्तित्व को सलाम. आपकी भाषा में बहुतों को कट्टरता दिखती है किंतु आज जिस ओज की जरूरत है देश को वह आपमें दिखाई देती है. बहुतों को उत्प्रेरित करती आपकी रचनाएं मातृभूमि के प्रति वंदनीय उपहार हैं. अपनी लेखनी की इस ताकत को ऐसे ही बनाए रखें. हॉ, एक बात जरूर पूछना चाहुंगा कि आजकल चातक जी कहॉ हैं? काफी दिन से उनका कोई पता नहीं चल रहा है. अगर उनसे संपर्क हो तो जरूर मेरा पैगाम पहुंचाइएगा.

    atharvavedamanoj के द्वारा
    January 8, 2011

    पाण्डेय जी … आपका मार्गदर्शन पाकर बहुत अच्छा लगा| देश को मुझमे क्या दीखता है और क्या नहीं यह मैं नहीं जानता…मैं तो बस इतना जानता हूँ की मुझे लिखना है और मैं लिखता हूँ …आपके लेखन के सामने मैं कहीं भी नहीं हूँ …चातक जी से प्रायः बातें होती रहती हैं …आजकल उनका अंतर्जाल समुचित ढंग से कार्य नहीं कर पा रहा हैं ….और फिर बिच के घटनाक्रम ने हम सभी मित्रों को निराशाजनक ढंग से उद्वेलित कर रखा था…आप विश्वास करियें ज्यों ही चातक जी का अंतर्जाल दुरुस्त होगा वे पुनः जोशोखरोस के साथ हमारे समक्ष होंगे….मुझे आपका निरंतर स्नेह मिलता रहे इस हेतु मुझे आपके दूरभाष नंबर की कामना है…

div81 के द्वारा
January 7, 2011

मनोज जी, सदा की तरह बहुत ही सुंदर कविता! बधाई !!!

    atharvavedamanoj के द्वारा
    January 8, 2011

    प्रिय दिव्या बहन… आपका कोटिशः आभार …जय भारत, जय भारती

nishamittal के द्वारा
January 7, 2011

मनोज जी,आपको बहुविध प्रतिभा के लिए बधाई.बहुत अच्छी भावप्रवण कविता.

    atharvavedamanoj के द्वारा
    January 8, 2011

    आदरणीय निशा जी आपने फेसबुक पर एक सवाल पूछा था मैं यहाँ पर भी दोहराता हूँ …ब्लॉग्गिंग करना मेरे लिए एक खर्चीली लत बन गयी है जिसको मैं बहुत देर तक जारी नहीं रख सकता …आपकी प्रतिक्रियाओं से मेरा आत्मविश्वास बढ़ता हैं….आपका कोतिसः आभार …जय भारत, जय भारती

वाहिद के द्वारा
January 7, 2011

कहते हैं संघर्ष हमेशा सत्य सदा विजयी होता है | संशय से ग्रसित होने के बावजूद अंत में एक सकारात्मक अभिव्यक्ति हृदय को छू गयी| बस यही भावनाएँ जीवित रखें| जय हिंद

    atharvavedamanoj के द्वारा
    January 8, 2011

    प्रिय मित्र … अंत में कोई भी सकारात्मक अभिव्यक्ति नहीं है….गीत का अंत सत्ता के दरवाजे पर दम तोड़ती मर्यादा को लक्ष्य कर किया गया है…मैंने लिखा भी है की समस्त वर्जनाएं मात्र हमारे लिए ही क्यों? यही वह बिंदु हैं जहां राष्ट्रवाद कम्युनिस्म के सामने घुटने टेक देता हैं ….आपका आभार जय भारत, जय भारती

abodhbaalak के द्वारा
January 7, 2011

कहते हैं संघर्ष हमेशा सत्य सदा विजयी होता है | जिसमे साहस है वह जीता | केवल कायर ही रोता है | Manoj ji satya to yahi hai ki aisa sabhi ki sath hi hota hai ki hamari abhilaashayen adhoori rah jati hain, par aapne uska hal bhi dia hai ki jisme saahas hai wahi jeeta hai bahut hi sundar rachna ke liye hriday se badhaai http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    atharvavedamanoj के द्वारा
    January 8, 2011

    भाई अबोध बालक जी… यह सत्य है की मैंने जिन प्रतिबंधात्मक छलनाओं का जिक्र किया है उसका अनुपालन कर साँसे ली जा सकती हैं किन्तु क्या करें जब पौरुष पर ही प्रतिबंध हो और उसे प्रतिबंधित करने के लिए बार बार मर्यादाओं और वर्जनाओं का उदाहरण देकर सीमाओं में रहने को विवश कर दिया जाये…यम और नियमों की सारी वर्जनाएं हम ही क्यों पालन करें ? जय भारत जय भारती

alkargupta1 के द्वारा
January 7, 2011

मनोज जी , वंदेमातरम मिटी नहीं हृदयों से दूरी , कविताएं रह गईं अधूरी। जाने कितना और है  जाना? यात्रा  कब होगी यह पूरी? संशयग्रस्त बनाकर जीवन मृगतृष्णा छलती जाती है………. बहुत ही संवेदनीय अनुत्तरित प्रश्न हैं…… बहुत सुंदर भाव प्रधान  कविता !  

    atharvavedamanoj के द्वारा
    January 8, 2011

    आदरणीय अलका जी इसमें कोई शक नहीं की यह प्रश्न सनातन काल से अनुत्तरित है और बहुतों ने अपनी अपनी मति के अनुरूप इसका हल ढूंढने की चेष्टा भी की है किन्तु सबसे बड़ी बात तो यह है की इस प्रश्न का हल भी एक प्रश्न बन कर हमारे सामने खड़ा है ….स्वासों के इस अवलंबन में जाने क्या क्या अभी शेष है ?….आपका आभार जय भारत

    Alka Gupta के द्वारा
    January 12, 2011

    मनोज जी , आपकी दोनों ताजा पोस्ट पर मेरे कोइ भी कमेंट नहीं पहुँच रहे हैं जबकि और सभी के हैं कई बार पोस्ट भी कर चुकी हूँ ……… स्वामी विवेकानंद जी के लेख में लिखी हुई कहानी की तरह कोई मन्त्र बगैरह तो नहीं पढ़ दिया……. कृपया इसे अन्यथा न लें हास्य ही समझें……… देख रहीं हूँ की इस पोस्ट से कमेंट पहुंचता है या नहीं या फिर कोशिशें व्यर्थ हैं……!

Deepak Sahu के द्वारा
January 7, 2011

मयंक जी! बहुत ही सुंदर कविता! बधाई !!! दीपक

    atharvavedamanoj के द्वारा
    January 8, 2011

    धन्यवाद दीपक जी आपकी प्रतिक्रिया को कोतिसः नमन…आपका आभार

Ramesh bajpai के द्वारा
January 7, 2011

कैसा शैशव और तरुणाई? केवल सिसकी और रुलाई| नियति नटी का नृत्य अनोखा जब देखो आखें भर आयीं| क्या बात कही है मनोज जी बहुत सुन्दर यही नियति है काश मन की अनंत अभिलाषाओ को पंख मिल पाते……………. सुन्दर रचना बधाई

    atharvavedamanoj के द्वारा
    January 8, 2011

    आदरणीय वाजपेयी जी चाह तो यही है की मन की अनगिनत अभिलाषाओं को पंख मिल जाता किन्तु क्या करें मन की मन में रह जाती है ….फिर भी दिल है छोटा सा छोटी सी आशा …..आपका कोटि कोटि अभिवादन

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
January 6, 2011

भाई मनोज जी……….. वंदेमातरम हर बार की तरह भावप्रधान कविता……… अक्सर वीर रस से ओतप्रोत कविता ही पढ़ने को मिली ……………. किन्तु इस बार इस मर्मस्पर्शी रचना ने कहीं भीतर तक असर किया…………….. कभी न पूरी हो पाती है, मन की मन में रह जाती है | सुंदर रचना के लिए बधाई……….

    atharvavedamanoj के द्वारा
    January 8, 2011

    वन्देमातरम पियूष भाई, मैं मूलतः वीररस में ही लिखने का आदी रहा हूँ…कभी कभी अन्य रसों पर भी हाँथ साफ़ कर लिया करता हूँ …अब यह तो राम ही जाने की मैं कैसा लिखता हूँ …हाँ आपका प्रोत्साहन पाकर अच्छा लगता है…आभार

Amit Dehati के द्वारा
January 6, 2011

संशयग्रस्त बना कर जीवन मृगतृष्णा छलती जाती है | कभी न पूरी हो पाती है, मन की मन में रह जाती है | बहुत ही सुन्दर लेख ………………………. आपको मेरे तरफ से नववर्ष की ढेर सारी शुभकामनायें नववर्ष मंगलमय हो ! http://amitdehati.jagranjunction.com

    Amit Dehati के द्वारा
    January 6, 2011

    कृपया लेख को रचना पढ़े ….. शुक्रिया !

    atharvavedamanoj के द्वारा
    January 8, 2011

    वन्देमातरम अमित जी… वास्तव में यह मृगतृष्णा अंतहीन है…मधु की एक बूँद के पीछे मैंने अब तक कष्ट सहे शत, मधु की एक बूँद मिथ्या हैं कोई ऐसी बात कहे मत …आपको और आपके सम्पूर्ण परिवार को मेरी और से नव वर्ष की हार्दिक बधाइयाँ

rajkamal के द्वारा
January 6, 2011

priy मनोज भाई …वन्दे मातरम ! सदा की तरह ही भूत ही बेहतरीन लेकिन मर्मस्पर्शी कविता ऐसा लगता है की इसको आपने अभी -२ लिखा है ….. सुन्दर कविता पर बधाई

    atharvavedamanoj के द्वारा
    January 8, 2011

    वन्देमातरम राजकमल भाई … कविता पर प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए आपका कोटिशः आभार …..कविता इसी महीने लिखी गयी है


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