मनोज कुमार सिँह 'मयंक'

राष्ट्र, धर्म, संस्कृति पर कोई समझौता स्वीकार नही है। भारत माँ के विद्रोही को जीने का अधिकार नही है॥

76 Posts

19068 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 1151 postid : 346

नंगापन

Posted On: 17 Nov, 2010 Others में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

एक पुरानी कविता
झटका सा लगा मुझे-
जब सुना-
चवन्नियाँ बहिष्कृत हो गयी-
सिक्कों के समाज से|
जैसे-
चवन्नियों के साथ,
लुट सा गया -
मेरा वजूद |
करोड़पति बनने का स्वप्न -
चकनाचूर|
झडने लगा -
शीशे के मकान का पॉलिश,
जिसमे -
दशकों की चवन्नियां चिपका कर -
मैं -
अपने घर का -
नंगापन -
ढकने की -
कोशिश -
में लगा था |

| NEXT



Tags:           

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (4 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

25 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

NIKHIL PANDEY के द्वारा
November 27, 2010

बेहतरीन ……अभिव्यक्ति मनोज जी ….

bhaskar singh, azad bhawan, के द्वारा
November 20, 2010

आप की कवितावों का वाक्य रचना अति सुंदर है . आप की सोच समाज में फैले हुए गरीबी को दर्शाता है . हमारी शुभ कामनाये आप के साथ है ‘—–भास्कर सिंह मो, ९४१५९९१४०४..

priyasingh के द्वारा
November 18, 2010

चवन्नियो के साथ करोरपति बनने का ख्वाब कैसे देखा जा सकता है ……..प्रत्येक कवी के भावो को पकड़ पाना मुश्किल काम है जैसे आपकी इस कविता में आपके भावो को मेरा मन नही पकड़ पाया …………

    atharvavedamanoj के द्वारा
    November 20, 2010

    चवन्नियां (राष्ट्रिय अस्मिता) सिक्का (भारतीय राजनीती और समाज) मेरा वजूद (हमारी पहचान ) करोणपति बनने का स्वप्न (परम वैभावानेतु मेतत स्वराष्ट्रं) सीसे के मकान का पोलिश(हमारी पुरानि पहचान) दशकों (युगों) अपने घर (भारत) नंगापन (वैचारिक दिवालियापन)….इस तरह से पढ़े

div81 के द्वारा
November 18, 2010

मयंक जी, एक कविता लिखी थी उसकी कुछ लाइन कुछ यूँ है हमशे छूटे २५ पैसे अब नए ये दुनियादारी के दिन याद नहीं कब बाग़ गए थे अब तो बोझल – बोझल सारे ये दिन जल्द ही पूरी कविता पोस्ट करुँगी ……..अच्छी कविता के लिए हार्दिक बधाई………………

    Burchard के द्वारा
    July 12, 2016

    Hei Janne;)Du er en suveren shopper, det skal du ha hehe:)De har mye flott pÃ¥ denne barne klær butikken skjønner jeg…Mange butikker som selger klær har lagt seg pÃ¥ interiør ogsÃ¥, mulig det er "god bu&.tktquok;..iDen skittentøys korgen ble knallfin, kjempekult trekk:)))HÃ¥per du har hatt en fin helg og at du snart blir god i armen:))God Bedring Janne!Klemmer

kmmishra के द्वारा
November 18, 2010

प्रिय मनोज जी सादर वेदेमातरम ! आप चवन्नी की बात करते हैं अब तो अठन्नी भी गायब हो गयी है और भाईलोगों ने एक रूपये को सिक्के को गला कर चांदी बनाने का खेल सालों पहले से शुरू कर दिया था । कविता के बहाने सिक्कों की व्यथा सुनायी आपने । आभार ।

roshni के द्वारा
November 18, 2010

मनोज ji वैसे जब चवन्नियाँ  पर रोक लगी थी कितने ऐसे गरीब लोग होगे जिनके पास न जाने कितनी ऐसी चवन्नियाँ उनका खजाना रही होगी … और उनका दुःख तो वोह खुद बेहतर जान सकते है .. अमीर नहीं .. वास्तविकता दिखाती कविता.. मेरी पहली वाली टिप्पणी में कुछ शब्द लिख नहीं पाई, कुछ गलित हो गयी .. क्षमा चाहती हूँ .. रौशनी

roshni के द्वारा
November 18, 2010

मनोज जी वैसे जब क पर रोक लगी थी कितने ऐसे गरीब लोग होगे जिनके पास न जाने कितनी ऐसी उनका खजाना रही होगी … और उनका दुःख तो वोह खुद बेहतर जान सकते है .. अमीर नहीं .. वास्तविकता दिखाती कविता

rajan,, के द्वारा
November 18, 2010

एक गंभीर सोच ! सार्थक !! सही कह रहे है आप,आज मुद्रा तो बहुत है पर उसकी कीमत घटती ही जा रही है . पुरानी चवन्नियाँ विलुप्त सी हो गयी है . और सारी मार जनता को ही सहना है. महगाई की मार !!!!! धन्यवाद ..

    atharvavedamanoj के द्वारा
    January 9, 2011

    धन्यवाद राजन जी

nishamittal के द्वारा
November 18, 2010

मनोज जी,न जाने क्यों इस आपकी इस रचना के पीछे आपकी गहन सोच नहीं पकड़ पा रही हूँ रचना तो सदा ही राष्ट्रवादी तथा प्रेरणास्पद होती है आपकी.

    atharvavedamanoj के द्वारा
    November 20, 2010

    aadarniy nisha ji yah रचना भी अन्य रचनाओं की तरह राष्ट्रवाद से ही अनुप्राणित है कृपया चवन्नियां (राष्ट्रिय अस्मिता) सिक्का (भारतीय राजनीती और समाज) मेरा वजूद (हमारी पहचान ) करोणपति बनने का स्वप्न (परम वैभावानेतु मेतत स्वराष्ट्रं) सीसे के मकान का पोलिश(हमारी पुरानि पहचान) दशकों (युगों) अपने घर (भारत) नंगापन (वैचारिक दिवालियापन)….इस तरह से पढ़े

ashvinikumar के द्वारा
November 17, 2010

प्रिय अनुज सही कहा तुमने बूंद बूंद से ही घट भरता है एक एक राष्ट्रवादी से सम्पूर्ण राष्ट्र राष्ट्रवाद की भावना से ओत प्रोत हो जाता है और यह राष्ट्रवाद रूपी चवन्नियाँ अभी पूरी तरह बहिष्कृत नही हुई हैं अन्यथा आज देश जो एक बार INDIA बन चुका है फिर से कुछ और बन गया होता,,हम करोड़पति अवश्य होंगे देश प्रेम अभी भी हमारे भाईयों के अन्दर बाकी है………..जय भारत

    atharvavedamanoj के द्वारा
    November 20, 2010

    आपने कविता को समग्र रूप में पढ़ा आदरणीय अग्रज कोतिसः धन्यवाद

आर.एन. शाही के द्वारा
November 17, 2010

मनोज जी, आपकी ये छायावादी कविता बहुत गूढ़ अर्थ वाली है, इसलिये चाह कर भी पता नहीं क्यों मैं इसे हल्के-फ़ुल्के में लेकर व्यंग्य नहीं समझ पा रहा । सही अर्थ भी नहीं तलाश पाया, माथापच्ची के बावज़ूद । क्षमा करेंगे । साधुवाद ।

    atharvavedamanoj के द्वारा
    November 17, 2010

    आदरणीय शाही जी, सादर वन्देमातरम… यह कविता गूढ़ अर्थों वाली है ही नहीं..एक अबोधबालक के नजरिये से देखेंगे तो सब कुछ समझ में आ जायेगा…प्रतिक्रिया का कोटिशः आभार..जय भारत,जय भारती.

    Retta के द्वारा
    July 12, 2016

    Hey Turdboy, can you run us through your theory, complete with eveidnce, about how Obama was born in Kenya and is a gay Muslim? What drugs are you on BTW?

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
November 17, 2010

वास्तव में मनोज जी…………. आपकी इस कविता ने उन दिनों की याद ताज़ा कर दी जब हम किसी काम को अच्छे काम को करने के बदले चवन्नियां ईनाम के तौर पर घर वालों से कभी पा जाते थे……. वो सुख जो उस चवन्नी में था वो आज 500 के नोट में नहीं है………….. और जहाँ तक आपके करोर्पति बन्ने का ख्वाब था……… वो तो अब भी पूरा हो सकता हैं………… लोगों ने सारी पुरानी चवन्नियां उसी तरह गंगा और अन्य मोक्षदयानी नदियों में प्रवाहित कर दी हैं………….. जैसे उन्होंने अपने पुराने संस्कार व संस्कृति कहीं बहा दिए…………. अब आगरा आप इन चवन्नियों को किसी पुरातत्व संग्रहालय में ले जाएँ तो आप फिर करोडपति बन सकते हैं……… सुन्दर कविता के लिए हार्दिक बधाई………………

    atharvavedamanoj के द्वारा
    November 20, 2010

    प्रिय मित्र पियूष जी चवन्नियां (राष्ट्रिय अस्मिता) सिक्का (भारतीय राजनीती और समाज) मेरा वजूद (हमारी पहचान ) करोणपति बनने का स्वप्न (परम वैभावानेतु मेतत स्वराष्ट्रं) सीसे के मकान का पोलिश(हमारी पुरानि पहचान) दशकों (युगों) अपने घर (भारत) नंगापन (वैचारिक दिवालियापन)….इस तरह से पढ़े

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    November 20, 2010

    मनोज भाई………इस व्याख्या ने आपकी इस कविता को नै ऊँचाइयों तक पहुँचाया है……… राष्ट्रभक्ति की भवनa से ओत प्रोत इस कविता को यूँ ही पढ़ लेजाने के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ……….. इस बार भावपूर्ण कविता के लिए हार्दिक बधाई…………

chaatak के द्वारा
November 17, 2010

प्रिय मनोज जी, चवन्नियों का ये दर्द मुद्रा के साथ साथ अस्मिता के मूल्यों में आई गिरावट के साथ जोड़ कर नव-भारत की एक सार्थक तस्वीर प्रस्तुत कर रही है | पोस्ट पर बधाई ! वन्देमातरम!

    atharvavedamanoj के द्वारा
    November 17, 2010

    प्रिय मित्र चातक जी, आज पता नहीं क्यों..अंतर्जाल ठीक ढंग से काम ही नहीं कर रहा है…अस्मिता भी तो चवन्नियां ही हो गयी हैं ..पता नहीं क्यों दिखाई ही नहीं पड़ती और जहाँ दिखाई पड़ती है..कोई न कोई राखी सावंत या शोभराज आकर तार तार कर देता है..यही हमारा नया भारत है जहाँ सब कुछ छोटा होता जा रहा है सिवाय एक चीज के जब से कांग्रेस आई है..कमरतोड महगाई है…जय भारत.जय भारती

rajkamal के द्वारा
November 17, 2010

प्रिय मनोज जी …वन्देमातरम ! आप चवन्नियों का उपयोग करके घाटे में रहेंगे ….उसकी बजाय पांच पैसे के सिक्के इस्तेमाल करे … क्योंकि पहली बात तो यह की चवन्निया तो आप भगवान को शगुन डालने वाले रुपयों के साथ लगाने के लिए ही रह दे …. दूसरी बात यह की चवन्निया गोल होने कारण परदे का काम सही तरह से नहीं कर पाती … फिर भी निराली कविता … बधाईयाँ

    atharvavedamanoj के द्वारा
    November 17, 2010

    प्रिय राजकमल जी.. सुझावों पर अमल करूँगा..लेकिन एक परेशानी है..पांच पैसे दिखाई ही नहीं पड़ते..जो बचा रखा था..पंडित जी को बेवकूफ बनाते बनाते खर्च हो गए..मैं तो भूल गया था की चवन्नियां ढकने का काम ठीक ढंग से नहीं कर पटी हैं चलिए नेक्स्ट ट्राई रुपयों से करता हूँ …ये जो थोड़े से हैं पैसे खर्च ढकने पर करूँ कैसे..अगली बार खाता संख्या भी दूंगा..शायद कुछ मिल जाये …प्रोत्साहन के लिए शुक्रिया ..जय भारत,जय भारती


topic of the week



latest from jagran