मनोज कुमार सिँह 'मयंक'

राष्ट्र, धर्म, संस्कृति पर कोई समझौता स्वीकार नही है। भारत माँ के विद्रोही को जीने का अधिकार नही है॥

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प्रिय सू की बहन

Posted On: 16 Nov, 2010 Others में

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प्रिय सू की बहन,
सादर वंदेमातरम।
आखिरकार उद्दण्ड जुंटा सरकार ने आपके सत्याग्रह के समक्ष घुटने टेकते हुए आपको मुक्त कर ही दिया और आप एक लंबे अंतराल के बाद पुनः अपने समर्थकोँ के मध्य हैँ।अपने देश मेँ लोकतंत्र की प्रतिष्ठा के लिए आपका त्रासदीपूर्ण संघर्ष युगोँ-युगोँ तक याद रखा जायेगा।’अबला केनो माँ एतो बले’।एक स्त्री होने के बावजूद जिस अदम्य दृढ़ता और पौरुष का प्रदर्शन आपने किया है,वह अनुकरणीय है और वैसा करना तो पुरुष देहधारी बड़े-बड़े दुर्दान्त महानुभावोँ के लिये भी दुर्लभ है।हाँ, सत्याग्रह का नाम देकर उस नाम पर ठगने वाले तो बहुत है किन्तु वास्तविक सत्याग्रह तो केवल आपने ही किया है, ऐसी मेरी मान्यता है।
1937 मेँ अप्रिल फूल के दिन यदि हम भाई बहन को मूर्ख बनाकर अलग न किया गया होता तो शायद आज हम और आप एक ही देश होते, किन्तु प्रारब्ध को यह मंजूर नहीँ था और अंग्रेजो की कुटिल चालोँ ने हमे अलग कर दिया।मुझे आज भी ‘मेरे पिया गये रंगून, किया है वहाँ से टेलीफून, तुम्हारी याद सताती है, जिया मेँ आग लगाती है’ वाला गाना जब भी याद आता है, तो यही लगता है कि जैसे रंगून हमारे ही देश का कोई शहर हो।मुझे यह भी याद आता है कि

सहस्त्राब्दियोँ पहले जब हमारा देश ‘सोने (एक धातु) की चिड़ियाँ’ कहा जाता था तो आपका भूभाग भी हमारा ही अंग हुआ करता था और आपके देश से लगायत थाइलैँड, लाओस तक को सुवर्णभूमि के नाम से जाना जाता था।तब लुटेरे नहीँ आये थे।हम अपने घरोँ मेँ ताला भी तो नहीँ लगाते थे।वह भी एक समय हुआ करता था, जब थेरवाद का शंख यहाँ फूँका जाता था और बिना एक क्षण का विलम्ब किये गूँज वहाँ सुनाई पड़ने लगती थी।आज भी ‘यमा जातदा, के रुप मेँ आपके देश मेँ रामायण ही तो पढ़ा जाता है।आज तो हमारे ही देश मेँ वेद का लबेद हो गया है।क्या इस बात से कोई इंकार कर सकता है कि दक्षिण भारतीय लिपि और पाली के सम्मिश्रण ने आपकी बामर भाषा को आकार दिया है।घृणित कम्यूनिष्टोँ के लिये तो यह भी संभव है।एक छोटे से पत्र मेँ समूची बातोँ को नहीँ रखा जा सकता।हाँ, इतना अवश्य है की आपकी मुक्ति भी मुझे भारतीय सत्ता हस्तांतरण की तरह आधी अधूरी ही दिखाई पड़ती है।
भारत स्वतंत्र हुआ, विभाजन के साथ, बिना अल्पसंख्यक समस्या का निस्तारण किये और आप की मुक्ति हुई तो श्रीहीन, शक्तिहीन बनाकर।ने विन ने यू नू का तख्ता पलट दिया, 3000 से अधिक क्रान्तिकारियोँ को गोलियोँ से भून दिया गया।
आप जब प्रचण्ड बहुमत से आईँ तो आपको नजरबन्द कर दिया गया और जब आपकी पार्टी ने चुनावोँ का बहिष्कार कर दिया तब उसकी मान्यता निरस्त कर, आपको मुक्त कर दिया गया।आज विश्व का प्रत्येक धार्मिक व्यक्ति अधर्म के विरुद्ध युद्ध मेँ आपके साथ है किन्तु उनकी आवाज आप तक पहुँच ही नहीँ सकती।सैन्य तानाशाही लोकतंत्र का बाना ओढ़कर एक बार फिर से सत्तारुढ़ हो चुकी है और आपका पड़ोसी हमारा देश, विदेशनीति के मामले मेँ अपंग होकर गलत को सही और सही को गलत मानते हुए दिग्भ्रम का शिकार हो गया है।क्या करेँ?’महिमा घटी समुद्र की रावण बसा पड़ोस’ हम दोनो को एक ही पड़ोसी परेशान कर रहा है।आगे आप खुद ही समझदार हो।
ॐ मणिपद्मने हुं

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347 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rajeev dubey के द्वारा
November 27, 2010

क्या काल चक्र है … बर्मा (म्यांमार) में एक बर्बर शासन है और चीन का हस्तक्षेप है, और हिन्दुस्तान बस टुकुर टुकुर देखता है । नेपाल में भी यही होता लग रहा है । कश्मीर उड़ा ले जाने की धमकियों पर सरकार अलगाववादियों से बातें करती है – मीठी मीठी । और एक समय था जब अकेला सुभाष इस ओर से उस ओर पहुँच जाता था …सेनाएँ खड़ी कर लेता था … जन चेतना जगाते रहिए, हमें अपनी लड़ाई फिर से लड़नी होगी ।

rajan,, के द्वारा
November 18, 2010

सत्य के साथ !!!!!!!! धर्मं के साथ होने पर साधुवाद …

    Chiana के द्वारा
    July 12, 2016

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rajkamal के द्वारा
November 16, 2010

प्रिय मनोज भाई ..वन्देमातरम ! मेरी खुद की ऐसी औकात नहीं है …इसलिए अपने एक दोस्त को सारे तथ्य जुटा कर सू बहन पर लिखने के लिए प्रार्थना की थी …उसने तो नहीं लिखा …लेकिन मेरी वोह अभिलाषा पहले आदरणीय श्री शाही जी ने और अब आप ने यह नायाब खत लिख के पूरी कर दी है… कोटिश धन्यवाद

    atharvavedamanoj के द्वारा
    November 17, 2010

    प्रिय राजकमल भाई ..वन्देमातरम. मैंने इस आशय की एक टिपण्णी शाही जी के पोस्ट पर पढ़ी है..और मैंने यह जो पोस्ट लिखा है उन्ही की रचना से प्रेरित होकर लिखा है..मैं क्या आपका दोस्त नहीं हूँ ?…मैंने लिख दिया तो समझ लीजिए आपके ही दोस्त ने लिख दिया..इतने जल्दी दोस्तों का बुरा नहीं मानते…जय भारत,जय भारती

    Lena के द्वारा
    July 12, 2016

    I really want to apply with the Police Force, but I have smoked marijuana recently, but I am going to give it up to join the force. I know that drug screen you and I am going to wait till I am clean to apply, but they also polygraph test you and ask about drug use. I am afraid the won128#&7;t take me. Does anyone know what they will say about hiring if I used to smoke?

alkargupta1 के द्वारा
November 16, 2010

श्री मनोज जी , आपकी पहले वाली पोस्ट पर प्रतिक्रिया देने का कई बार प्रयत्न किया लेकिन सफल नहीं हुई पता नहीं ऐसा क्यों हआ शायद कुछ तकनीकी गड़बड़ी हो आज भी  सोचा था यही लेकिन य़हाँ टिप्पणी पहुँच गई ….होली जला दें ….नारी अस्मिता….पर ओजस्वीपूर्ण शैली ….बहुत सुंदर प्रस्तुति है।

    atharvavedamanoj के द्वारा
    November 17, 2010

    आदरणीय अलका जी… मैं इस मंच पर कुछ ज्यादा ही बदनाम हूँ..और बदनामी न हो जाय..इससे बचने के लिए मोडरेशन का विकल्प लगा रखा है ..आपकी सारी प्रतिक्रियाएं मुझे प्राप्त हुई …सभी का आभार ….जय भारत,जय भारती

ashvinikumar के द्वारा
November 16, 2010

प्रिय अनुज आप वर्मा की बात करते हो वहां के दर्द को मह्शूश करते हो ,लेकिन हमारी सरकार (मुझे लगता है हम अभी भी परतंत्र ही हैं पहले गैरों के द्वारा थे अब अपनों के द्वारा हैं ) क्या मह्शूश करती है? (इस मायने में मुझे इजरायल बहुत ही अच्छा लगता है आप उसकी तरफ आँख उठा कर देख लो आंखे निकाल लेगा इसी तरह देश की अस्मिता से खेलने वालों के साथ व्यवहार होना चाहिए ) सरकार की आप बात ही छोडो आम लोग भी देश की इज्जत को सरे बाजार नीलाम करने पर अमादा हैं और उनके समर्थन में भीड़ भी जुटी रहती है,,,,,,,तुम्हे प्यार भी आभार भी जय भारत

alkargupta1 के द्वारा
November 16, 2010

श्री मनोज जी, राष्ट्रीय भावनाओं का प्रदर्शन करता हुआ ऐतिहासिक जानकारियों से युक्त बहुत सुंदर शैली में सू ची को लिखा गया यह पत्र आपकी बड़ी ही विद्वता का परिचायक है। 

K M Mishra के द्वारा
November 16, 2010

“सहस्त्राब्दियोँ पहले जब हमारा देश ‘सोने (एक धातु) की चिड़ियाँ’ कहा जाता था तो आपका भूभाग भी हमारा ही अंग हुआ करता था और आपके देश से लगायत थाइलैँड, लाओस तक को सुवर्णभूमि के नाम से जाना जाता था।तब लुटेरे नहीँ आये थे।हम अपने घरोँ मेँ ताला भी तो नहीँ लगाते थे।वह भी एक समय हुआ करता था, जब थेरवाद का शंख यहाँ फूँका जाता था और बिना एक क्षण का विलम्ब किये गूँज वहाँ सुनाई पड़ने लगती थी।आज भी ‘यमा जातदा, के रुप मेँ आपके देश मेँ रामायण ही तो पढ़ा जाता है।आज तो हमारे ही देश मेँ वेद का लबेद हो गया है।क्या इस बात से कोई इंकार कर सकता है कि दक्षिण भारतीय लिपि और पाली के सम्मिश्रण ने आपकी बामर भाषा को आकार दिया है।” प्रिय मनोज जी सदर वन्देमातरम, यह जानकारी तो बहुतों को नहीं होगी. मेरी तरफ से भी सू की को हार्दिक शुभकामनायें और अभिनन्दन.

chaatak के द्वारा
November 16, 2010

प्रिय मनोज जी, सुश्री सू की को लिखे गए आपके पत्र को पढ़कर कोई भी अंदाजा लगा सकता है कि आज के समय में राष्ट्रवादी व् मानवतावादी होने का क्या खामियाजा भुगतना पड़ता है लेकिन कुछ लोग होते ही हैं जटिल (?) इन्हें राष्ट्रवाद के पिस्सू काटे रहते हैं और ये बड़े क्रियाशील होकर लगातार छटपटाते रहते हैं| बेहतरीन ख़त के लिए आपको कोटिशः धन्यवाद!

nishamittal के द्वारा
November 16, 2010

बहुत सुन्दर ! मनोज जी ,पत्र के रूप में आपने जो विचार व्यक्त किये हैं ,बारम्बार पढ़े सच राजनीति का दुश्चक्र क्या-क्या दिन दिखाता है.चलिए जब जागे तभी सबेरा ईश्वर करे सब के अच्छे दिन लौटें और सबको अपने राष्ट्र की सेवा का अवसर मिले तथा भाव जागें.

Dharmesh Tiwari के द्वारा
November 16, 2010

आदरणीय मनोज जी सादर प्रणाम,गहराई से भरे इस पत्र में आपने बखूबी तरीके से हकीकत को प्रस्तुत किया,धन्यवाद!

    atharvavedamanoj के द्वारा
    November 17, 2010

    श्री धर्मेश जी, सादर वन्देमातरम… प्रतिक्रिया का आभारी हूँ …आपका भी ब्लॉग हकीकत को बेहतर ढंग से प्रस्तुत करता है….और मैं आपकी लेखनी का सदा से एक प्रशंसक रहा हूँ..जय भारत..जय भारती

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
November 16, 2010

प्रिय बंधू मनोज जी……….. एक राष्ट्रवादी का एक दुसरे राष्ट्रवादी को प्रभावशाली भावनात्मक पत्र………… ऐतिहासिक तथ्यों का समावेश इस पत्र को और भी महत्वपूर्ण और प्रभावशाली बनाता है……….. आपकी इस खूबसूरत भावनात्मक प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई…………….

    atharvavedamanoj के द्वारा
    November 17, 2010

    प्रिय मित्र पियूष जी, सादर वन्देमातरम.. प्रतिक्रिया का आभार…ऐतिहासिकता स्वतः आ जाती है…सू की का राष्ट्रवादी आंदोलन बहुतों का मार्ग प्रशस्त करेगा और म्यांमार में आज नहीं तो कल लोकतंत्र अवश्य बहाल होगा..लेकिन खेद का विषय यह है की भारतीय विदेश निति इस सन्दर्भ में प्रभावी नहीं रही..जय भारत,जय भारती

आर.एन. शाही के द्वारा
November 16, 2010

वाह मनोज जी … बधाई । सू ची के नाम आपके इस पत्र ने गदगद कर दिया । बहुत ही विद्वतापूर्ण ढंग से अपने इतिहास ज्ञान का मिश्रण कर आपने आलेख को अत्यंत आकर्षक बना दिया है । साधुवाद ।

    atharvavedamanoj के द्वारा
    November 17, 2010

    आदरणीय शाही जी आपकी प्रेरणा और पूर्व में इसी विषय पर लिखे गए आपके पोस्ट ने कुछ नया लिखने को प्रेरित किया…साभार मनोज कुमार सिंह मयंक ….जय भारत,जय भारती


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