मनोज कुमार सिँह 'मयंक'

राष्ट्र, धर्म, संस्कृति पर कोई समझौता स्वीकार नही है। भारत माँ के विद्रोही को जीने का अधिकार नही है॥

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कौन कापालिक बनेगा?

Posted On: 27 Oct, 2010 Others में

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सिँहनी जब फाड़ मस्तक-
हस्ति शोणित पान करती-
गरजती शार्दूल जननी,
विजय का हुंकार भरती।
सिँह- शावक आ लिपट तब

मातृ थन से-
दुग्ध का क्या पान करते?
या विजय की व्यंजना मेँ-
अनुसरण कर वीर माँ का-
छीन कर निज तीक्ष्ण नख से-
उदर का करके विदारण -
माँस खाते सीखते हैँ-
अभय हो वन मेँ विचरना।
और तुम तो मृत्यु देवी-
जगज्जननी कालिका के-
वीर्य रज से युक्त होकर-
भीत कापुरुषोँ की भाँति,
भूलकर गीता कथन को,
दीर्घ जीवन कामना ले,
शिश्न के आनंद मेँ-
नवगीत का निर्माण करते।
चरम है अश्लीलता का-
कवि तुम्हारे भाव मेँ अन्तर ही क्या

सामान्य जन से?
जो तुम्हे आदर्श के ऊँचे गगन मेँ -
भेदकर यह सौरमण्डल -
स्वर्ग का साम्राज्य देँवे।
शुभ घड़ी है।
यह निराशा की निशा है।
चरम पर बेरोजगारी।
समय है निर्माण का,
शव साधना करना पड़ेगा।
कौन कापालिक बनेगा?
इस पुराने राष्ट्र के मरघट मेँ बैठा -
जो उठा मृत रुढ़ियोँ का देह कर मेँ -
भावना चंदन सुवासित काष्ठ पर रख,
त्याग रुपी वेदिका की अग्नि लेकर,
विश्व मंगल कामना रुपी प्रदक्षिण
कर
जला देगा युगोँ से सड़ रही काया यहाँ पर।
विश्व सत्ता योनि से सम्बद्ध होकर,
अहं का नर माँस खाकर,
साधना की सुरा पीकर,
संकल्प से वश मीन करके,
खड्ग मुद्रा से अभय,
वैराग्य भैरवी चक्र ऊपर,
धर्म की बिखरी हुई सी-
अस्थियाँ एकत्र करके,
चेतना संजीवनी का -
मंत्र जापे-
लेखनी से।
<जय महाकाल, मनोज कुमार सिँह ‘मयंक’

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362 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

आर.एन. शाही के द्वारा
October 28, 2010

स्वाभाविक रूप से आपकी हुंकार और ललकार भरी रचना मनोज जी । बधाई ।

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 30, 2010

    आदरणीय शाही जी.. आपका प्रोत्साहन इस अकिंचन को आत्मविश्वास और संबल प्रदान करता है| वन्दे मातरम

    Kaycee के द्वारा
    July 12, 2016

    Sería coeitnvnnee que alguien canalizara a este loco con un psiquiatra, pues es evidente que padece de transtornos mentales graves. Pobres de quienes lo tienen de vecino.

abodhbaalak के द्वारा
October 28, 2010

मनोज जी, वीर रस से ओत प्रोत रचना, आपको ऐसे तो सभी सभी रसों का उपयोग भली भाँती आता है पर इस रस में आपको निपुड़ता हासिल है. बधाई हो http://abodhbaalak.jagranjunction.com

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 30, 2010

    प्रतिक्रिया के लिए कोटिशः आभार…जय भारत,जय भारती

    Tessica के द्वारा
    July 12, 2016

    Så heldig du er! Mtp. hvor utrolig dårlig været har vær her, er det vejroftlent. :) God tur! :D Gleder meg veldig til å gå i postkassen i dagene fremover! :D Forresten; den parkasen med sort pelskrage fra H&M kommer ut på H&M Trend i neste uke. ;) Jeg prøver desperat å finne noen som kan kjøpe den for meg og sende meg den. Kryss fingrene for meg! :p

kmmishra के द्वारा
October 28, 2010

जो उठा मृत रुढ़ियोँ का देह कर मेँ – भावना चंदन सुवासित काष्ठ पर रख, त्याग रुपी वेदिका की अग्नि लेकर, विश्व मंगल कामना रुपी प्रदक्षिण कर जला देगा युगोँ से सड़ रही काया यहाँ पर। मनोज जी सादर वंदेमातरम ! आपकी ओज भरी यह कविता न सिर्फ राष्ट्र का दर्द समेटे है बल्कि देशवासियों को राष्ट्रधर्म पर न्यौछावर होने के लिये भी प्रेरित करती है । बहुत बहुत आभार ।

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 30, 2010

    मिश्र जी मृत रूढ़ियाँ तो नहीं टूटी एक और नयी रूढी आ खड़ी हुई…अब तो नहीं रुका जाता क्षमा करें| वन्देमातरम

Ramesh bajpai के द्वारा
October 28, 2010

वैराग्य भैरवी चक्र ऊपर, धर्म की बिखरी हुई सी- अस्थियाँ एकत्र करके, चेतना संजीवनी का – मंत्र जापे- प्रिय श्री मनोज जी यथार्थ को परिलक्षित करती बीर रस से सराबोर इस अभियक्ति का शब्दों से मूल्याङ्कन क्या करू बधाई

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 30, 2010

    आदरणीय वाजपेयी जी… सादर प्रणाम…. क्षमा कीजियेगा…मैंने अपनी पहली पोस्ट फिर से डाल दी है…क्या करूं घालमेल इस सीधे सच्चे इन्सान को पसंद नहीं…यूँ ही स्नेह बनाये रखियेगा| जय भारत जय भारती

    Nelia के द्वारा
    July 12, 2016

    Man, I purposely stayed away from Atom because of the retards who support it. It’s pointless geekery and bickering over shit that will never make a difference to anyone of coS;2quence&#8e30sRnS is fine, why bother?

roshni के द्वारा
October 27, 2010

मनोज जी धर्म की बिखरी हुई सी- अस्थियाँ एकत्र करके, चेतना संजीवनी का – मंत्र जापे- लेखनी से। ये पंक्तियाँ खुद ही सब बयाँ करती है …..हमारे शब्द तो बहुत कम पड़ेगे ….. बस एक शब्द कहना चाहतीi हूँ वन्देमातरम

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 30, 2010

    प्रतिक्रिया का कोटिशः आभार … धर्म की बिखरी हुई अस्थियाँ जोड़ने का ही काम कर रहा हूँ…पर पता नहीं क्यों लोग उसे तोड़ने में लगे हुए हैं….ठीक है मेघाच्छन्न आकाश का कलेजा फाड़ कर सूर्य निकलने को उद्द्यत हैं…देखता हूँ तम किरणों पर कितना भरी पड़ता है….वन्देमातरम

div81 के द्वारा
October 27, 2010

वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो ! हाथ में ध्वजा रहे बाल दल सजा रहे ध्वज कभी झुके नहीं दल कभी रुके नहीं वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो ! सामने पहाड़ हो सिंह की दहाड़ हो तुम निडर डरो नहीं तुम निडर डटो वहीं वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो ! प्रात हो कि रात हो संग हो न साथ हो सूर्य से बढ़े चलो चन्द्र से बढ़े चलो वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो ! एक ध्वज लिये हुए एक प्रण किये हुए मातृ भूमि के लिये पितृ भूमि के लिये वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो ! अन्न भूमि में भरा वारि भूमि में भरा यत्न कर निकाल लो रत्न भर निकाल लो वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो ! वीर रस में डूबा गयी आप की ये रचना वन्देमातरम ……………

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 27, 2010

    प्रिय बहन दिव्या जी… सादर वन्देमातरम… आपकी प्रतिक्रिया का कोतिसः आभार ….मेरा यह सन्देश है की रचनाओं में भी युगानुरूप परिवर्तन होना चाहिए….आपने इस सन्देश को पकड़ा इसके लिए आपका अभिवादन….जय भारत,जय भारती

October 27, 2010

मनोज जी………. आंदोलित करने वाले शब्दों से सजी और वीर रस से भरी इस एक और कविता के लिए आप बधाई के पात्र हैं………..

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 27, 2010

    आदरणीय पियूष जी सादर वन्देमातरम| जागरण मंच पर आपका पुनरागमन ह्रदय को आह्लादित करने वाला है…आपकी प्रतिक्रिया का कोटिशः आभार….जय भारत जय भारती

Alka r Gupta के द्वारा
October 27, 2010

मनोज जी ,जनता के मन का मंथन करने वाली ओजस्वी और क्रांतिकारी   रचना के लिए बधाई।

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 27, 2010

    आदरणीय अलका जी, प्रतिक्रिया के लिए आभार…यह जानकार प्रसन्नता हुई की धर्म विषयक मामलों में आपकी गहन रूचि है….आज विभ्रम के शिकार हमारे जन जीवन को धर्म ही संवार सकता है| जय भारत,जय भारती

chaatak के द्वारा
October 27, 2010

जरा काया क्षार कर दूं दे अभय मिस्सार कर दूं अग्निरथ आरूढ़ होकर चेतना विस्तार कर दूं नाद मेधा को प्रबल कर ॐ का हुंकार कर दूं| प्रिय मनोज जी, आपकी अभियक्ति निश्चय ही एक राष्ट्रवादी के दिल से निकली बात है| तारीफ़ को शब्द नहीं बस भावनाएं हैं| एक अप्रतिम पोस्ट पर बधाई!

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 27, 2010

    रूद्र का हुंकार सुनकर, नंदी नाचे,नंदी नाचे| रव भयानक सुन दिशाओं के सभी दिक्पाल कापें माँ यहाँ प्रस्तुत हूँ मैं, बलि के लिए है शीश मेरा| फिर प्रफुल्लित हो धरा यह, गगन पा आशीष तेरा| प्रिय मित्र चातक जी… सादर वन्देमातरम….आपकी कव्यात्मक प्रतिक्रिया ने मेरी कविता का समग्र सार ही निचोड़ कर रख दिया..;.आभार सादर वन्देमातरम

सुनील दत्त के द्वारा
October 27, 2010

आपकी जबरदस्त कबिता पढकर लगता है कि गद्दारों का अंत नजदीक आ रहा है। वन्देमातरम्

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 27, 2010

    आदरणीय सुनील जी, कहाँ हैं आजकल ? बहुत कोशिश करने के बावजूद आपसे संपर्क नहीं हो पा रहा है…खैर आपका स्नेह पाकर प्रफुल्लित हुआ| मेरे मेल पर आपके ब्लोग्स भी नहीं आ रहे हैं ? वन्देमातरम

rajkamal के द्वारा
October 27, 2010

इस समाज को झिंझोड़ने वाली क्रांतिकारी कविता ….

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 27, 2010

    प्रिय राजकमल जी सादर वन्देमातरम, आपकी प्रतिक्रिया का आभार….जय भारत,जय भारती

ashvinikumar के द्वारा
October 27, 2010

हे महा घोर हे त्रिपुरारी , पावन कर दो धरा हमारी,, जो दुष्टों से है क्लांत हुई, मर्माहत और अशांत हुई,, हे पार्थ तुम्हारा आवाहन , माँ बसुन्धरा हो फिर पावन,, प्रत्यंचा खींचो हे अर्जुन , फिर दुशाशन का उदय हुआ , तब लक्षित वधू तुम्हारी थी , अब माता का ही लक्ष्य किया , फिर इनका संहार करो , माँ भारत का उद्धार करो ,, फिर तांडव कर दो हे शंकर , कंपित हो जाएँ शत्रु भयंकर , हे महाकाल हे कालेश्वर , हे नीलकंठ हे विश्वेश्वर , त्रिनेत्र पुनः तुम खोलो फिर , फिर से जन्मा है घोर असुर,, *******तुम्हे प्यार भी आभार भी

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 27, 2010

    अब नहीं चुप रह सकूँगा, माँ मुझे तलवार दे दे | और कुंठित हो गयी है, तीक्ष्ण इसकी धर कर दे| आदरणीय अग्रज स्नेह सिक्त काव्यात्मक प्रतिक्रिया के लिए…अभिनन्दन…जय भारत,जय भारती


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