मनोज कुमार सिँह 'मयंक'

राष्ट्र, धर्म, संस्कृति पर कोई समझौता स्वीकार नही है। भारत माँ के विद्रोही को जीने का अधिकार नही है॥

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धर्म क्या है

Posted On: 22 Oct, 2010 Others में

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अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देव्मृत्विज्म|

होतारं रत्नधातमम||

अर्थात- यज्ञ के जो हैं पुरोहित रित्विकों के देव हैं,

और होताओं को देते रत्न जो उनको नमन||

प्रथमतः मैंने यह विचार किया की कम से कम मैं तो धर्म की कोई चर्चा ही नहीं करूँगा,किन्तु सर्वोच्च सत्ता ने पुनः हस्तक्षेप किया,अन्तः से स्फुरणा हुई कि नहीं लिखना ही पड़ेगा|मरता क्या न करता? ‘’निमित्तमात्रं भाव सव्यसाचिन”|उसके आदेश कि अवहेलना करना किसके बस कि बात है?

सीधे विषय पर आते हैं – धर्म किसे कहते  हैं? यह ऋग्वेद के प्रथम मंडल के प्रथम सूक्त में ही स्पष्ट कर दिया गया है और इसके स्पष्टीकरण के लिए चरों वेद,अठारह पुराण,ब्राह्मण,उपनिषद,उपपुराण,रामायण,महाभारत इत्यादि ग्रंथों कि रचना कि गई,फिर भी या तो प्रश्न उलझता ही गया अथवा उसे जानबूझ कर राक्षसी उद्देश्यों कि प्राप्ति के लिए उलझा दिया गया|वैसे भी स्थूल बुद्धि,सूक्ष्म चीजों को कैसे ग्रहण कर सकती है? “द्वापर” में जब मैथिलि शरण गुप्त लिखते हैं –

धर्म एक बस अग्नि धर्म है-

जो आवे सो क्षार|

जल भी उड़े वाष्प बन करके,

मल भी हो अंगार||

तो वह कुछ और नहीं बस धर्म कि ही बात करते हैं| पता नहीं उन्होंने यह महानतम बात कंस जैसे दुरात्मा के मुख से क्यों कहलवा दी? इसके विपरीत इसी काव्य में कृष्ण का क्राइस्टीकरण करते हुए मात्र एक पद जोड़ा गया है, वह भी “सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणम व्रज” का पद्यानुवाद कर कवि के दाइत्व से मुक्ति के रूप में| शायद उस समय भी सत्य का पक्ष लेने वालों को कंस समझा जाता रहा हो?

जब ‘’देव्य्थर्वशीर्षोपनिषद’’ में ‘’तां दुर्गा दुर्ग्माम देवीं दुराचारवघातिनिम” अर्थात दुराचार का दमन करने वाली वह दुर्गा हैं कहा जाता है,तब धर्म कि चर्चा होती है|जब ऋग्वेद में ‘’अहं रुद्राय धनुरातनोमी ब्र्म्ह्द्वइषे शरवे हन्तवा उ” अर्थात मैं ही ब्र्म्ह्द्वेषियों का वध करने के लिए रूद्र का धनुष तानती हूँ कहा जाता है, तब धर्म कि चर्चा होती है| कृष्ण ने कभी नहीं कहा कि मैं धर्म हूँ, उन्होंने कहा ‘’धर्मसंस्थापनार्थाय” ‘To maintain the supreme order” धर्म कि संस्थापना के लिए|राम ने कभी नहीं कहा कि मैं धर्म हूँ, लेकिन जब उन्होंने कहा ‘’निशिचर हीन करहूँ माहि,भुज उठाय प्रण कीन्ह’’ तब वे धर्म कि बात करते हैं| सामान्यतया यहाँ भी और अन्यत्र भी धर्म के लक्षणों कि ही चर्चा कि जाती है धर्म कि नहीं| हमारे बहुत से धर्मगुरु भी पता नहीं किस भावना के चलते यह धर्म लोगों को नहीं बताते|

आप कहीं भी देख लीजिए एक ही बात कही गई है,’’पाप को भी मारो और पापी को भी मारो” यहाँ तक कि ‘’पुर्जा पुर्जा कटी मरे,तबहु न छाँड़े खेत”कि भावना के साथ| जब नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने कहा कि ‘’जिन मनुष्यों का विचार क्षण प्रतिक्षण बदलता रहता है,वे दुर्बल हैं उनका कोई आत्मबल नहीं” तब वे धर्म कि ही चर्चा करते हैं|इसके विपरीत जब लोग कहते हैं कि विविध धर्मों के मध्य भावात्मक एकता के तत्व विद्यमान हैं तब वे सरासर झूठ बोलते हैं,एकदम गलत| अगर मुझे कहना हो तो मैं यह कहूँगा कि विविध मतों के मध्य भावात्मक एकता के तत्व विद्यमान हैं,आप धर्म को नहीं समझ सकते|

कुछ लोग ओं को धर्म मानते हैं| कौन सा ओं? ऋग्वेदियों का प्रणव,यजुर्वेदियों का ओंकार सामवेदियों का उद्गीथ बौद्ध,जैन,सिक्ख,इस्लाम,ईसाईयत सभी में तो ओं है|आप अ,उ,म को अलिफ़,लाम,मीम कर दे तो क्या भावना बदल जायेगी?नहीं| यह है भावात्मक एकता|तुम्हे नहीं पता तो लो मैं बताता हूँ| “क्षणे-क्षणे यन्नवतामुपैती तदैव रूपम रमणीयताया” जो प्रतिपल नवीन हो वह धर्म है|ऐसा नहीं कि हजरत ने जो कह दिया अब उसमे संशोधन कि कोई गुंजाइश नहीं और जो भी इसके विरुद्ध बोलेगा उसका सर कलम कर दिया जाएगा|यह तो सरासर अधर्म है,पाखंड है,रुढिवादिता है और ऐसी कुत्सित विचारधारा का विनाश होना ही चाहिए|

अगर कोई यह कहता है कि सम्पूर्ण विश्व में मात्र एक ही तरह कि विचारधारा होनी चाहिए तब यह अधर्म है और यदि कोई कहता है कि एक राज्य में एक ही तरह कि विचारधारा होनी चाहिए , तब यह धर्म है| क्योंकि विश्व में अलग अलग तरह कि विचारधाराओं के मंथन से सुविचार प्राप्त होंगे और एक ही राज्य में अनेक विचारधाराओं कि उपस्थिति से राज्य कि प्रभुसत्ता संकट में पड़ जायेगी| यह हुआ राजनैतिक धर्म और यदि इस लिहाज से देखा जाय तो आंबेडकर जी गाँधी से अधिक धार्मिक नजर आयेंगे क्योंकि वे गांधीवादी पाखंड के विरुद्ध शुद्ध  धार्मिक बात किया करते थे|

यह तो उल्टी बात हुई|व्यास जी कहते हैं “’परोपकाराय पुण्याय पापाय परपीडनम” और गोस्वामी जी कहते हैं ‘’परहित सरिस धर्म नहीं भाई” और आप लड़ने को धर्म मान रहे हैं| हाँ, बिलकुल  ऐसा ही है| देखो मैंने भी व्यास और तुलसीदास के विपरीत नहीं कहा| अब आप परोपकार मानते किसे हैं? सड़क पर हृदयाघात से पीड़ित व्यक्ति को कराहते छोड़ देना अधर्म है, लेकिन आप खुद ही तो बाईपास सर्जरी करने नहीं लगेंगे| फिर, रोगी को आस्पताल पहुंचा देना धर्म है और खुद ही डाक्टरी करने लगना अधर्म है| आपको लेटने और डार्लि को पढ़ना पड़ेगा| पुलिस, डाकू का परोपकार करने लगे|भिखारी,भिखारी का परोपकार करने लगे| रोगी, रोगी का परोपकार करने लगे तो क्या आप इसे धर्म कहेंगे? और क्या यह संभव है?

कुछ लोग भक्ति को ही धर्म मानने लगे है| रुद्राक्ष कि माला लेकर मैंने भी गायत्री का तांत्रिक जप किया है| यह तो धर्म पर चलना हुआ नहीं…हाँ …अब जो मैं कर रहा हूँ वह धर्म पर चलना है| स्पष्ट है ‘’श्रवणं,कीर्तनं विष्णो” धर्म नहीं है…मात्र धर्म का एक अंग है| जब शचीन्द्र नाथ सान्याल कहते हैं “लड़ीबो, मरिबो, मारीबो, मानिबो ना” तब वह धर्म होता है| “ Power flows from the barrel of the gun” अधर्म है किन्तु GUN धर्म है| फिर उल्टी बात, अरे भैया परशुराम ने कहा है फरसा ही धर्म है “अग्रश्चतुरोवेदा पृष्टतः सशरंधनु,उभयोरपि समर्थानाम शापादपि, शरादपि” अर्थात धनुष बाण और वेद दोनों धर्म है| अभी भी समझ में नहीं आया| अरे मुर्ख! अन्याय का मूलोच्छेदन ही धर्म है| धर्मः धारयते प्रजानाम  अर्थात धारण करने वाला धर्म तो फिर धर्मो रक्षति रक्षितः अर्थात इसकी रक्षा करो क्योंकि यह तुम्हारी रक्षा करेगा|

शेष फिर कभी

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391 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

सुनील दत्त के द्वारा
October 27, 2010

अन्याय का मूलोच्छेदन ही धर्म है। आओ धर्म के पालन की दिशा में आगे बढ़ें।

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 27, 2010

    आदरणीय सुनील जी मैं तो कब से तैयार बैठा हूँ ….जय भारत,जय भारती

October 25, 2010

मनोज भाई…….धर्म से जुड़े अपने ज्ञान को हमारे साथ बाटने के लिए आपका हार्दिक शुक्रिया……….

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 27, 2010

    प्रिय बंधू पियूष जी, सादर वन्देमातरम कुछ भी लिखने की सार्थकता तभी है…जब वह व्यवहारिकता में भी आभासित होने लगे….आपकी प्रतिक्रिया का कोटि कोटि अभिनन्दन

ashvinikumar के द्वारा
October 24, 2010

प्रिय अनुज (न जाने क्यों प्रतिक्रिया तुमरे पोस्ट पर लोड नही हो पा रही है) अतः अधिक कुछ नही कह पा रहा हूँ ,,********तुम्हे प्यार भी आभार भी

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 27, 2010

    आदरणीय अग्रज moderation का विकल्प लगा होने के कारन संभवतया आपकी प्रतिक्रियाएं डिस्प्ले नहीं हो रही थी| अब होगी आपका स्नेह मुझे बल प्रदान करता है

ashvinikumar के द्वारा
October 24, 2010

प्रिय अनुज (अन्याय का प्रतिकार करना हमारा परम धर्म है अन्यथा प्रतिकार न करके हम स्वयम अन्यायी कहलायेंगे,,पापी को प्रश्रय देना स्वयम उसके पाप में भागी होने के सदृश्य है ‘’तां दुर्गा दुर्ग्माम देवीं दुराचारवघातिनिम”-‘’अहं रुद्राय धनुरातनोमी ब्र्म्ह्द्वइषे शरवे हन्तवा उ ) धर्म का यही भाव हमे सर्वोपरि एवं सबसे अलग :- (“क्षणे-क्षणे यन्नवतामुपैती तदैव रूपम रमणीयताया”) हम बलात किसी मनुष्य को अपना धर्म मानने को विवश नही करते , और जो आना चाहे उसका सहर्ष स्वागत भी करते हैं ,हम पहले शस्त्र नही उठाते परन्तु हिंसा का प्रतिकार अवश्य करते हैं ,,फिर वह चाहे गाँधीवादी तरीके से हो,,या वीर भगत सिंह ,चन्द्रशेखर की तरह ,गुरु नानक ,गुरु तेग बहादुर,महाराणा, वीर शिवाजी या अनगिनत स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की तरह,,हम कभी आक्रान्ता नही रहे न ही कभी होना चाहते हैं ,, तुम्हे प्यार भी आभार भी

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 27, 2010

    आदरणीय अग्रज…. आपकी स्नेह सिक्त प्रतिक्रिया का कोटिश आभार ….सत्य है…हमने दुराग्रह कभी नहीं किया बस एक सात्विक हठ है …’त्यजेदेकम कुलस्यार्थे,ग्राम्स्यार्थे कुलं त्य्जेद, ग्रामं जनपदस्यार्थे…आत्मार्थे पृथ्वीम त्यजेत” की| और इस तरह का हठ हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है…जय भारत,जय भारती

abodhbaalak के द्वारा
October 24, 2010

मनोज जी बहुत ही कठिन विषय को, जो की बहुत ही सरल भी है, आपने इस इस लेख का विषय बनाया है, सराहना करनी पड़ेगी, और आपने इसे बहुत सलीके से लिखा भी है, काफी ज्ञानवर्धक लेख है. बधाई हो http://abodhbaalak.jagranjunction.com

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 27, 2010

    जी हाँ अबोधबालक जी…. धर्म बहुत ही सहज और सरल है किन्तु पता नहीं क्यों इसे कठिन बना दिया गया है…शायद किसी के स्वर्थ की सिद्धि हो रही हो…..मैंने उसे सहज और सरल रूप में प्रस्तुत करने की चेष्टा की है….पता नहीं कहाँ तक सफल हो पाया हूँ …..आपका आभार,जय भारत जय भारती

Alka Gupta के द्वारा
October 24, 2010

मनोज जी, बहुत गूढ़ विषय है आपका।धर्म संबंधी ज्ञानवर्धक भी।केवल ॐ  अक्षर के स्मरण करने में ही सर्वोच्च शक्ति विद्यमान है ऐसा मैं मानती हूँ। अंतिम दो पंक्तियों में ही धर्म को पूर्णरूपेण परिभाषित कर दिया गया है।  इस लेख की कुछ महत्त्वपूर्ण पंक्तियाँ मैं अपनी डायरी में नोट करूँगी लेकिन पहले आपकी इज़ाज़त चाहूँगी।   

    Alka Gupta के द्वारा
    October 24, 2010

    मनोज जी, आपकी इज़ाज़त की प्रतीक्षा है। कृपया उत्तर दें धन्यवाद।

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 24, 2010

    आदरणीय अलका जी.. आप चाहें तो पूरा लेख ही कॉपी कर सकती हैं| कृपया अनुमति मांग कर लज्जित न करें|मैं धर्म का तो एक निमित्त ही हूँ , यदि इस दिशा में कुछ योगदान कर सका तो कृतार्थ होऊंगा….जय भारत, जय भारती

Munish के द्वारा
October 23, 2010

भाई मनोज जी, आपके लेख के लिए बस इतना ही कह सकता हूँ ” भई वाह! ” इतने दिनों से जो पड़ना चाह रहा था वो आज मिला सभी छदम सेकुलरों के तोते उड़े हुए हैं.

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 24, 2010

    वन्देमातरम मुनीश जी, मैंने आपको एक मेल किया था…id हैक हो गयी हैं….प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद…जल्दी में हूँ …शेष फिर कभी….जय भारत

K M MIshra के द्वारा
October 23, 2010

अन्याय का मूलोच्छेदन ही धर्म है| धर्मः धारयते प्रजानाम अर्थात धारण करने वाला धर्म तो फिर धर्मो रक्षति रक्षितः अर्थात इसकी रक्षा करो क्योंकि यह तुम्हारी रक्षा करेगा| प्रिय मनोज जी सादर वंदेमातरम ! इस एक लेख में कितने ग्रंथ, कितने लेख, कितने विचार, कितने सिद्धांत, कितने चिंतक समाहित हैं पढ़ कर पता चलता है । मैं इस लेख को कापी करने की अनुमति चाहता हूं । आपका कोटि कोटि धन्यवाद, इस घुप्प अंधेरे में आपने रोशनी की एक किरण भेजी है । उम्मीद करता हूं कि आप पर तमाम आरोप लगाने वालों कों के भी ज्ञानाचक्षु इस लेख से खुले होंगे । बहुत बहुत आभार ।

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 23, 2010

    आदरणीय मिश्रा जी सादर वन्देमातरम… आपकी प्रतिक्रिया का आभार किन्तु कुछ लोगों के नेत्र कभी नहीं खुलते… उपदेशो ही मुर्खान्नाम प्रकोपाय न शान्तये,पयः पानम भुजन्गानाम केवलं विश्वर्धनम| और मजे की बात यह है की सभी विचार,लेखक,चिन्तक एक ही तरह का मत व्यक्त करते हैं फिर भी पता नहीं क्यों लोगों को साधारण सी बात नहीं समझ में आती….आप इस लेख को कापी करे …कापी करने की अनुमति न मांगे| आपका बहुत बहुत आभार जय भारत,जय भारती

    Judith के द्वारा
    July 12, 2016

    hmp.. how hard is it to love a person who doesnt love you back? ha.ts.i. the best nga ang mga videos ng you tube eh,,, when i feel sad i just watch videos from it and i feel better

Coolbaby के द्वारा
October 23, 2010

Baby zara aasan bhasha me likhna hum yahan tumhari uljhan sunne nhi aaye

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 23, 2010

    पढो लड़ाई करने को,लड़ो समाज बदलने को….यही एक धर्म है..इससे आसान नहीं लिख सकता| thanks for your nice comment.

    K M MIshra के द्वारा
    October 23, 2010

    प्रिय कूल बेबी जी (उर्फ ठंडे बच्चे जी) सादर वंदेमातरम ! शायद आप वंदेमातरम का अर्थ समझते होंगे । अगर इतना समझ जायेंगे तो सब समझ जायेंगे ।

    Independence के द्वारा
    July 12, 2016

    Heya i am for the first time here. I found this board and I find It truly useful & it helped me out a lot. I hope to give sonmthieg back and aid others like you aided me.

Ramesh bajpai के द्वारा
October 23, 2010

प्रिय श्री मनोज जी अद्रोह: सर्व भूतेषु.कर्मणा मनसा गिरा | अनुग्र्श्च दानम च , सता धर्म सनातन | मन, बचन , और कर्म से सभी प्राणियों के प्रति अद्रोह, दया , और दान यही सनातन धर्म है

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 23, 2010

    आदरणीय वाजपेयी जी| सादर वन्देमातरम आप सत्य कहते हैं …यही सनातन धर्म है….जब भगवन मनु ने मानव धर्म शास्त्र का प्रणयन किया तो उन्होंने उपदेश दिया ”मनुर्भव” मनुष्य बनो…देवता नहीं,दानव नहीं मात्र मनुष्य किन्तु जब मानवता पर संकट आये तो रूद्र बन जावो| मनुस्मृति में कहा गया है,”बालोपी नावमन्तव्यो मनुष्य इति भूमिपः,महती देवताम एषाम नर रूपेण तिष्ठति” कुछ लोग इसे राजा की उत्पत्ति के दैवी सिधांत से जोड़कर देखते हैं मैं इसे हर उस व्यक्ति से जोड़ कर देखता हूँ जो राजदंड धारण करता है और अन्याय का प्रतिरोध करता है| मनुष्य में देवत्व मानवता के शत्रुओं का संहार कर ही अर्जित किया जा सकता है…और यदि साधना के सम्बन्ध में विचार करें तो भी पुरुषार्थ की आवश्यकता होती है स्पष्ट है अपबल, तपबल, बाहुबल चौथो हे बलदाम, सुर किशोर कृपा ते सब बल हारे को हरिनाम” जय भारत, जय भारती

nishamittal के द्वारा
October 23, 2010

आपका विषय तो इतना गहन है कि जितनी चर्चा करें कम है मेरे अपने विचार से जो कार्य अपनी अंतरात्मा की आवाज पर हम करते हैं वही धर्म है.अंतरात्मा सदा वही बताती है जो हमें करना चाहिए परन्तु हम अपनी सुविधा के अनुसार उसको तोड़ मरोड़ लेते हैं.मेरे द्वारा एक सामान्यजन का विचार रखा गया है. हाँ आपने मेरे एक प्रश्न का उत्तर नहीं दिया “हंस चुगेगा दाना तुनका “परसों की पोस्ट थी .

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 23, 2010

    आदरणीय निशा जी मैंने आपके ब्लॉग पर अपना मंतव्य स्पष्ट कर दिया है…यदि मैं साधन सम्पन्न होता तो संवाद से कभी भी पीछे नहीं हटता…जितना समय और साधन उपलब्ध होता है…उसका भरपूर संदोहन करने का प्रयास करता हूँ|आपने सत्य कहा है..अंतरात्मा में ही तो इश्वर का वास है और इश्वर न्यायकारी है यही धर्म है ”ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशे अर्जुन तिष्ठति” तोड़ने मडोरने का काम अधर्मियों द्वारा किया जाता है और किया जाता रहेगा| जय भारत,जय भारती

div81 के द्वारा
October 23, 2010

मयंक जी, धर्म को धर्मगुरुओं ने अपने हिसाब से उलझा दिया है | यहाँ धर्म नहीं अन्धविश्वास को पूजा जाता है आप के लेख से मुझे गुरु नानक जी के विषय में पढ़ी एक बात याद आ गयी | उस समय अंधविश्वास जन-जन में व्याप्त था । आडंबरों का बोलबाला था और धार्मिक कट्टरता तेजी से बढ़ रही थी। नानकदेव इन सबके विरोधी थे। जब नानक का जनेऊ संस्कार होने वाला था तो उन्होंने इसका विरोध किया। उन्होंने कहा कि अगर सूत के डालने से मेरा दूसरा जन्म हो जाएगा, मैं नया हो जाऊँगा, तो ठीक है। लेकिन अगर जनेऊ टूट गया तो? पंडित ने कहा कि बाजार से दूसरा खरीद लेना। इस पर नानक बोल उठे- ‘तो फिर इसे रहने दीजिए। जो खुद टूट जाता है, जो बाजार में बिकता है, जो दो पैसे में मिल जाता है, उससे उस परमात्मा की खोज क्या होगी। मुझे जिस जनेऊ की आवश्यकता है उसके लिए दया की कपास हो, संतोष का सूत हो, संयम की गाँठ हो और उस जनेऊ सत्य की पूरन हो। यही जीव के लिए आध्यात्मिक जनेऊ है। यह न टूटता है, न इसमें मैल लगता है, न ही जलता है और न ही खोता है।’ कहा जाता है कि सोये को जगाया जा सकता है मगर जो जागे है उनको नहीं | सच्चे लेख पर बधाई

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 23, 2010

    प्रिय दिव्या जी वन्देमातरम नानक एक देवोत्तर महापुरुष थे….सन्यासी कभी भी जनेऊ धारण करता..वह तो गृहस्थों के लिए होता है..पंडितों को भी यज्ञोपवीत का अध्यात्मिक महत्व नहीं पता…किसी से कुछ पूछा जाय तो कुछ और ही बताने लगते हैं…देव ऋण,ऋषि ऋण और पितृ ऋण से उऋण के लिए यज्ञोपवित की क्या आवश्यकता? नानक दुखिया सब संसार, सो सुखिया जो नाम अधार…और नाम क्या है एक ओमकार सतनाम…फिर इस नाम के लिए पुर्जा पुर्जा कटी मरें ….ओमकार केवल जीभ पर ही न हो जब चलूँ तो रोम रोम ॐ बोले..जब शयन करूँ तो रोम रोम ॐ बोले…मैं स्वयं ॐकारमय हो जाऊ नानक यही कहना चाहते थे…और यही उन्होंने कहा भी….प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद आज नहीं तो कल जागना ही पड़ेगा

chaatak के द्वारा
October 22, 2010

प्रिय मनोज जी, मिथ्या-प्रेरित उपमाओं और झूठ के पुलिंदों से बोझल धर्म की व्याख्या कई बार पढ़ी कभी-कभी तो मन किया कि कुछ प्रतिक्रिया व्यक्त करूँ फिर स्वयं ही अँगुलियों पर प्रतिबन्ध आरोपित कर दिया| आज आपकी पोस्ट को देखकर अत्यंत प्रसन्नता हुई, झूठी उपमाओं और निरीह रूपकों ने धर्म और निष्ठा का गला घोंटना शुरू कर दिया है लेकिन धवल धर्म की एक किरण उन सभी अंधेरों का जवाब सी प्रतीत हुई जो सत्य के प्रकाश को लील लेने को सुरसा सम मुख फैलाए बैठे हैं| आपका ये लेख बहुतों को सत्य का प्रकाश दिखाएगा (अंधों के लिए तो स्वयं सूर्य देव भी कुछ नहीं कर सकते)| तथ्यपरक लेख पर हार्दिक बधाई!

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 23, 2010

    प्रिय मित्र चातक जी वन्देमातरम उपमा अलंकार के अतिश्योक्ति पूर्ण वर्णन ने मुझे भी उद्वेलित कर दिया था…मात्र एक ही ऊँगली का अभ्यास होने के कारन कभी कभी प्रतिकिया भी विलंबित राग जैसी ही धीरे धीरे निकलती हैं…और उस पर से कीपैड पर मात्र अग्नि ऊँगली का प्रयोग करने के कारन सब कुछ झुलस जाता है…वसुंधरा…आकाश…वायु और जल की प्रतीक अंगूठे,मध्यमा,अनामिका और कनिष्ठिका का भी प्रयोग करना चाहता हूँ ….लेकिन जब धारा ही एक बह रही हो और वह भी विखंडन की धरा तो शांत कैसे रहें? जहाँ तक संभव हो सका सुरसा के मुंह से बाहर निकलने और निकालने का प्रयास करता रहूँगा….जय भारत,जय भारती


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