मनोज कुमार सिँह 'मयंक'

राष्ट्र, धर्म, संस्कृति पर कोई समझौता स्वीकार नही है। भारत माँ के विद्रोही को जीने का अधिकार नही है॥

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आओ बच्चों तुम्हें दिखाएँ (भाग १)

Posted On: 18 Oct, 2010 Others में

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आओ बच्चों तुम्हें दिखाएँ, झांकी हिंदुस्तान की |
इस मिटटी का क्या करना है,तुम्ही बताओ लाल जी||
वन्देमातरम,वन्देमातरम ||
जयचंदों की टोली अंग्रेजो ने पहले जान लिया|
बेईमानों का देश कार्नवालिस ने था पहचान लिया|
मैकाले ने वेदों की वाणी को कैसा मान दिया|
यह गड़ेरियों का गाना है सचमुच सुंदर नाम दिया|
और आज इनके चमचे पूजा करते शैतान की||
इस मिटटी का क्या करना है,तुम्ही बताओ लाल जी||
वन्देमातरम,वन्देमातरम ||
कैसा सुन्दर देश हमारे पुरखे गाली पाते हैं |
जो मिटटी पर मरते हैं सारे गरियाये जाते हैं |
भाषण देने वाले सब भंडुये नेता बन जाते हैं |
संसद में जाकर सियार सा हुआ-हुआ चिल्लाते हैं|
रहते हैं हिन्दोस्तान में बातें पाकिस्तान की ||
इस मिटटी का क्या करना है,तुम्ही बताओ लाल जी||
वन्देमातरम,वन्देमातरम ||
यहाँ लुटेरा है राणा , अकबर हरि का अवतार है|
शिवा पहाड़ी चूहा, जिन्दा पीर से सबको प्यार है |
सिमी सारथि राजनीती का, सीमा का व्यापार है |
उधर तेज है धार , इधर जिह्वा बैठी लाचार है |
कातिल ही करते हैं बातें दया, धर्म और प्यार की |
इस मिटटी का क्या करना है,तुम्ही बताओ लाल जी||
वन्देमातरम,वन्देमातरम ||
सूप सूप चुप ही रहती है,चलनी छन छन बोल रही |
देखो तो कैसी कैसी बातें यह सम्मुख खोल रही |
चिकनी चुपड़ी बातें कह कर धर्म-इमां को तोल रही|
गंगाजल में शीशा, पारा, कूड़ा, कचरा घोल रही |
हम यदि गेंहूँ की कहते हैं तो वे कहते धान की|
इस मिटटी का क्या करना है,तुम्ही बताओ लाल जी||
वन्देमातरम,वन्देमातरम ||
अन्न नहीं कंडोम बिकेगा खुलेआम बाजारों में |
बकरी की मिमियाहट होगी पौरुष के हुंकारों में |
कर्णधार को सेक्स मिलेगा अब कवि के उद्गारों में |
और निराशा का दर्शन अब होगा गीता-सारों में |
उनकी खिचड़ी पका करेगी, नहीं गलेगी दाल जी |
इस मिटटी का क्या करना है,तुम्ही बताओ लाल जी||
वन्देमातरम,वन्देमातरम ||
न दैन्यम न पलायनम
क्रमशः
monkey

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24 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

K M MIshra के द्वारा
October 19, 2010

वाह वाह । अभी पोस्ट फीचर्ड भी नहीं हुयी और टिप्पणियों की बरसात होने लगी। एक एक पंक्ति भारत देश का बंटाधार करने वालों, देश की सनातन संस्कृति को झुठलाने वाले और सत्ता और लोकतंत्र की तिजारत करने वाले राजनीतिज्ञ, चिंतकों को समर्पित है । ये इनकी कुत्सित नीतियों का प्रताप है कि न तो इनके घरों से कोई सेना में भर्ती होता है और न ही देश की युवा पीढ़ी आज भारतीय सेना में भर्ती होना चाहती है । इन्होंने देशप्रेम और देशहित को ही ढकोसला साबित कर दिया । आज के युवाओं के आदर्श शरद पवार, लालू, मुलायम जैसे नेता हैं । आप देखें कि ग्लोबलाईजेशन के बाद से सिर्फ दैहिक सुख ही परम ध्येय बन गया । जब सारी नैतिकता, मूल्यों, आदर्शों को बाजार में बेच दिया जायेगा तब धीरे धीरे विघटनवादी शक्तियां सिर उठाने लगेंगी और फिर तमाम तरह की समस्याएं शुरू हो जायेंगी । देश के वास्तविक इतिहास के साथ व्यभिचार करके उसको रखैल की भी इज्जत नहीं बख्शी लेनिन और मार्क्स के पुत्रों ने । भारत की सच्ची तस्वीर पेश की है आपने । बहुत बहुत आभार । न दैन्यम न पलायनम

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 19, 2010

    आदरणीय मिश्र जी सादर वन्दे मातरम, यह आपलोगों के स्नेह का ही परिणाम है जिसके कारण टिप्पड़िया छप्पर फाड़ कर बरसाती हैं ..अन्यथा इस नाचीज में क्या दम है?भाई अगर सेना में राजनेताओं और उद्योगपतियों के लड़के जाने लगें तो ब्रिटेन में बैठ कर history of india कौन लिखेगा?और उस history की mistry solve करते करते अपनी chemistry तो अपना physics ही बदल देती है?ससुरा छक्का छुट जाता है यह सिद्ध करने में की नवाब दशरथ के साहेबजादे राम की पैदाइश अयोध्या में ही हुई थी| लेनिन और मार्क्स तो कब के मर चुके लेकिन उनका भुर करात दंपत्ति के ही सर चढ़ कर नहीं बोलता…इस महँ परंपरा में बापू के लकुतिये वरद पुत्रों का भी कुछ कम योगदान नहीं है…आपकी प्रतिक्रिया को वंदन है…आपकी प्रतिक्रिया तर्क युक्त साहित्य की एक नयी विधा का दर्शन करवाती है..जय भारत,जय भारती

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 19, 2010

    मिश्रा जी पता नहीं मेरे ब्लॉग पर मधुर संगम क्यों आ रहा है? पूजा सिंह Mgmt student (lucknow),23 yrs,Hindu, UP…अब इसका क्या मतलब है? pay nothing until you get response….

Ramesh bajpai के द्वारा
October 19, 2010

प्रिय श्री मनोज जी वन्दे मातरम .बहुत ही सधी हुयी रचना . कवी के कोमल भावो के उदगार , समाज की कोख में पल रहे भ्रष्टाचारो पर जा बरसते है .तो फिर यु ही नहीं बरसते . इसका प्रमाण तो गीता में भी है वेद में भी .

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 19, 2010

    आदरणीय वाजपेयी जी, सादर वन्देमातरम.. आपने ठीक कहा..लेकिन हमारे प्रमाणों को प्रमाण माना तो जाये..उन्हें तो सिरे से ही ख़ारिज किया जा रहा है..और कुछ लोग उसके विशुद्ध रूप को बिगाड़ कर एक नया भाष्य ही गढने में लगे हुए हैं …प्रतिक्रिया का सादर आभिवादन…जय भारत ,जय भारती

ashvini kumar के द्वारा
October 18, 2010

वीर शिवा ने प्राण तजे,महाराणा ने बलिदान दिया , सिखों ने कर कृपाण धरा ,माता को रक्तों से शुद्ध किया,, रक्त बीज के वंशज थे जो ,प्यास न फिर भी बुझ पाई , व्यभिचारी असुरों के डर से,सतियों ने भी जान गंवाई ,, परशुराम भी साधू था ,वाणी में थी अमृत की धारा, हुआ विवश जब वह भी तो,फरसे से दुष्टों को संहारा,,

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 19, 2010

    यह बुझने वाली आग नहीं,तन मन में इसे समेटे हूँ , यदि कभी अचानक फूट पड़े विप्लव लेकर तो क्या संशय? हिन्दू तन मन हिन्दू जीवन,रग रग हिन्दू मेरा परिचय| और यही देश की थाती है,चन्दन भारत की माटी है| लेकिन कुछ सर्प विषैले हैं,लेनिन के पुत्र कसैले हैं| फन इनका पहले दमन करूँ..फिर दूजी विपदा शमन करूँ | आदरणीय अग्रज सादर वन्देमातरम

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
October 18, 2010

आपकी, हर दृष्टि कोण से दिवालिया होते जनमानस के कारण एक राष्ट्रवादी के मन की स्वाभाविक क्षुब्धता को दर्शाती, ये रचना बहुत अच्छी एवं विचारणीय है ….. एक उत्तम कृति के लिए आभार

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 19, 2010

    आदरणीय शैलेश जी, सादर वन्देमातरम. आपको रचना अच्छी लगी..इसे जानकर कृतार्थ हुआ…यदि कट,कॉपी और पेस्ट न हुआ तो आगे भी लिखता रहूँगा…जय भारत,जय भारती

chaatak के द्वारा
October 18, 2010

प्रिय मनोज जी, हिन्दुस्तान की यह झांकी बड़ो मनोहर लगी| गंगाजल में कूड़ा कचरा घोलने वाली पीढ़ी को गुमान है कि वे अब २१ वीं सदी में रहते है उन्हें कौन बताये कि बोतलों में भरा मिनरल वाटर भी इन्ही नदियों से आता है जिसमे आप २१ वीं सदी की गंदगी घोलते जा रहे हो| बहुत ही सामयिक और सधी हुई रचना है आपकी मैं तो निःशब्द हो गया हूँ इन पंक्तियों को पढ़कर| एक बार फिर अच्छी रचना पर बधाईया!

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 19, 2010

    प्रिय मित्र चातक जी, सदर वन्देमातरम. आपके और हमारे मधुर संबंधों के बारे में साड़ी दुनिया जान चुकी है..क्या करें इश्क और मुश्क छुपाये नहीं छुपते…लेकिन मैं इस मंच का आजीवन ऋणी रहूँगा क्योंकि इसके मार्फ़त इस जमादार को गंगा से कूड़ा,कचरा साफ़ करने वाले अन्य जमादारों से संवाद ही नहीं सम्बन्ध स्थापित करने का भी अवसर प्राप्त हुआ…आप और जमादारों की अग्रणी पंक्ति में आते हैं…अब इस २१ वीं सदी का कचरा साफ़ करके ही दम लेना है..आपकी प्रतिक्रिया का आभार…जय भारत,जय भारती

ashvini kumar के द्वारा
October 18, 2010

प्रिय मित्र देशवाशियों के लिए अच्छा संदेश (बहरों के लिए यह नही है ,अंधों की भांति पढकर नजर अंदाज कर दें) ,,प्रिय मित्र तुम्हे फिर से मंच पर देख कर ह्रदय प्रफुल्लित हो गया ,,कोई तो है देश हित की बात बेबाक अंदाज में करने वाला |************आभार ही नही प्यार भी …..तुम्हारा

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 18, 2010

    आदरणीय अश्विनी जी सादर वन्देमातरम, आप हमारे अग्रज हैं और आपके स्नेह से भला मैं वंचित क्यों होना चाहूँगा? यह आपके की आग्रह का परिणाम था की मैं निर्वासन से बाहर आया अन्यथा मैं तो कुछ और ही मूड बना चूका था?आपके स्नेह से गदगद मनोज कुमार सिंह मयंक …जय भारत,जय भारती

    Mohd.khalid.khan-Bareilly के द्वारा
    October 18, 2010

    अश्वनी जी सादर, कुटिल वचन सबसे बुरा, जा से होत न चार | साधू वचन जल रूप है, बरसे अमृत धार ||

    ashvini kumar के द्वारा
    October 19, 2010

    भाई दीपक ही था दीपक ही हूँ , दीपक ही मुझको रहने दो,, मंद मंद मै जलता था ,मुझे मंद मंद ही जलने दो ,, अंधियारे से था बैर मेरा,मुझे उसको दूर तुम करने दो,, बाती ना खिसकाओ तुम,ज्वाला ना भडकाओ तुम ,, अगर भडक उठी जल जाओगे,मुझे मंद मंद ही जलने दो ,, दीपक ही था अब भी हूँ ,मुझे दीपक ही तुम रहने दो ,,

    ashvini kumar के द्वारा
    October 19, 2010

    भाई मै सदैव ही संयमित लेखन में विश्वाश करने वाला व्यक्ति हूँ , (पर उपदेश कुशल बहुतेरे ) व्यक्ति विशेष के लिए कभी नही किया ,संयम ही हमारी संस्कृति है (निराकार ओंकार मूलं तुरीयम ,गिरा ज्ञान गोतीत मीशं गिरीशं) पर सदा विश्वाश करने वाला (परित्राणाय साधूनाम विनाशायच दुष्कृताम) को सदा से ही प्रसंसित करने वाला,,लेखन की सार्थकता उसकी ओजस्विता पढने वाले को तृप्त कुछ हद तक ज्ञान पिपासा को शांत करने में है (पाठक उसके अच्छे अंश को ग्रहण करें अगर ग्रहणशील हों तो ,अन्यथा लेखन तो सतत प्रवाहित जल धरा के स्द्रिस्य है जो स्वान्तः सुखाय के लिए भी की जाती है,जिससे लेखक खुद भी परिष्कृत होता है ……आशा है सकारात्मक समझेंगे |

Mohd.khalid.khan-Bareilly के द्वारा
October 18, 2010

भईया मनोज, भगवान महावीर, भगवान बुद्ध और महात्मा गाँधी की अहिंसा की धारणाएँ अलग-अलग थी। फिर भी वेद, महावीर और बुद्ध की अहिंसा से महात्मा गाँधी प्रेरित थे। हम जब भी अहिंसा की बात करते हैं तो अक्सर यह खयाल आता है कि किसी को शारीरिक या मानसिक दुख न पहुँचाना अहिंसा है। मन, वचन और कर्म से किसी की हिंसा न करना अहिंसा कहा जाता है। यहाँ तक कि वाणी भी कठोर नहीं होनी चाहिए। फिर भी अहिंसा का इससे कहीं ज्यादा गहरा अर्थ है।

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 18, 2010

    वन्देमातरम खालिद जी.. मैंने कहीं भी हिंसा की बात नहीं की है…आप हमें समझने का प्रयास करें ..मैंने हमेशा शक्ति संतुलन की बात की है …असंतुलित होकर तो नहीं जिया जा सकता है न…आप ही देखिये निर्बल बकरी को तो दुर्गा मैया भी खा जाती हैं …लेकिन क्या कोई शेर की बलि देने जाता है?भगवान् बुद्ध,महावीर और गांधी की अहिंसा की धारणाएं अलग अलग है|बुद्ध की दैहिक,महावीर की दैविक और गाँधी की भौतिक…और जहाँ तक मैं जानता हूँ गाँधी जी वेदों का क ख ग भी नहीं जानते थे…गीता उनका आदर्श था और वह भी पता नहीं कौन सी गीता?मैत्री,मुदिता,करुणा और उपेक्षा को तो वे शायद जानते भी नहीं थे…गाँधी की अहिंसा लियो तोल्स्तोय की अहिंसा थी…surmon on the mountain की अहिंसा थी..वह एक राजनैतिक अहिंसा थी…और एकपक्षीय होने के कारण धर्म विरुद्ध थी|मैं आपके बात से पूरी तरह सहमत हूँ की अहिंसा का अर्थ इससे भी बहुत अधिक गहरा है…सादर वन्देमातरम

    Mohd.khalid.khan-Bareilly के द्वारा
    October 18, 2010

    मनोज जी सप्रेम, जल में बसे कमोदनी, चंदा बसे आकाश | जो है जा को भावना सो ताहि के पास ||

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 18, 2010

    आदरणीय मोहम्मद खालिद जी, साभार … कुछ सलिल मात्र है बस गंगा,एक पशु मात्र बस है गैया| है भूमि मात्र जो मिटटी की वह हो सकती किसकी मैया? पर इन्हें भावना भी तेरी जो छु देती जड़ता हरणी- तो हो जाती गंगा मैया,गोमाता,मातृभूमि धरणी|| सच कहा आपने भावना और संवेदनहीन प्राणी मृतक के समान है…जय भारत,जय भारती

    K M MIshra के द्वारा
    October 19, 2010

    प्रिय मो0 खालिद खान जी, सादर वंदेमातरम ! जैसा कि अभी मनोज जी ने अभी महात्मा गांधी की अहिंसा के बारे में कहा मैं उनसे सहमत हूं । गांधी की अहिंसा राजनैतिक थी । उस अंग्रेजी साम्राज्य के विरूद्ध बंदूकों से कैसे लड़ा जा सकता था जिसका सूरज कभी डूबता ही नहीं था । ब्रिटेन पहले विश्वयुद्ध के शुरू होने तक दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश था । उसके खिलाफ तो असहयोग और अहिंसा का सफल हथियार ही चल सकता था । जो हमला ही नहीं कर रहा है उसपर आप कब तक लाठियां, गोलियां बरसाओगे । बीसवीं सदी की शुरूआत में मनवाधिकार और राजनैतिक अधिकारों का समर्थन करने वाले बहुत से देश थे । अमेरिका और फ्रांस की क्रांतियां उससे बहुत पहले हो चुकी थीं । 17 वी और 18 वीं सदी के तमाम यूरोपिय राजनैतिक चिंतकों ने हजारों साल से चले आरहे सिद्धांतों को मिटा कर नये सिद्धांत रचे । दुनिया सामंती और अंधधार्मिक युग से निकल कर मानवतावादी विचारों की तरफ करवट बदल रही थी । दूसरे विश्वयुद्ध में पूरा यूरोप तहस नहस हो गया । ब्रिटेन बरबादी के कगार पर था । ऐसे वक्त पर महात्मा गांधी ने अहिंसा की नीति को छोड़ कर सन 1942 में ”करो या मरो“ या नारा दिया था । भारत छोड़ो आंदोलन विशुद्धरूप से एक हिंसक आंदोलन था जिसे महात्मा गांधी का समर्थन प्राप्त था । बापू का मैं सम्मान करता हूं लेकिन बापू अपने व्यक्तिगत जीवन में खुद हिंसक थे । उनका उनके परिवार और आश्रमवासियों के प्रति तानाशाह जैसा वर्ताव उनकी हिंसक प्रवृत्ति को दिखाता है । ”सत्य के प्रयोग“ उनकी आत्मकथा है । अपनी आत्मकथा में उन्होंने बहुत कुछ सच लिखा है लेकिन बहुत कुछ जो वो छिपा गये उसे उनके समकालीनों की आत्मकथाओं में पढ़ा जा सकता है जिसे भारत सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया ।

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 19, 2010

    कमाल है यह ऊपर की लाइन कैसे बदल गयी? जब की इस id का उपयोग मैं ही करता हूँ …कोई बात नहीं यह तो स्थापित हुआ ही की इन तीन महापुरुषों का अहिंसा के पार्टी दृष्टिकोण भिन्न भिन्न था…हाँ ठीक यही बात है..खालिद जी…वन्देमातरम

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 19, 2010

    आदरणीय मिश्रा जी.. एक और बात मैं जोड़ना चाहूँगा…नीचे विभिन्न नेताओं के नारे और कथन दिए हुए है…कौन अधिक हिंसक है पाठक स्वयं विचार करें…. इन्कलाब जिंदाबाद ….भगत सिंह वेदों की ओर लौटो ….स्वामी दयानंद गर्व से कहो की हम हिन्दू हैं ….स्वामी विवेकानंद दिल्ली चलो, तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आजादी दूंगा….नेताजी सुभाष चन्द्र बोस स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा …लोकमान्य जागते रहो …जवाहर लाल नेहरु मैं इस देश की मिटटी से भी कांग्रेस से बड़ा संगठन बना दूंगा,पाप को मारो पापी को नहीं(दिखाई पड़ता है क्या),यदि कोई तुम्हे एक गाल पर मारे तो दूसरा गाल आगे कर दो (और दोनों पर मारे तो..गर्दन?) करो या मरो इत्यादि …गाँधी आगे आप खुद समझदार हैं

    Chris के द्वारा
    July 12, 2016

    Shame it didnt get a little wider audience since im sure graduates can use the info. I remember during my residency that most of these issues were discussed by my program director at several corcsnenfee. Several residents thought it was weird for such a topic during residency. I really didnt know what to think at the time but now i realize he really was trying to help.How the heck did you get that into my field by not yours?


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