मनोज कुमार सिँह 'मयंक'

राष्ट्र, धर्म, संस्कृति पर कोई समझौता स्वीकार नही है। भारत माँ के विद्रोही को जीने का अधिकार नही है॥

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टर्र-टर्र बरसाती मेँढक

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टर्र-टर्र बरसाती मेँढक।
फुर्र-फुर्र उड़ गयी है चिड़ियाँ।
बर्र-बर्र तुम क्योँ करते हो?
यार मेरे बर्रै की माफिक।

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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

swatantranitin के द्वारा
October 11, 2010

वाह मनोज जी ! चन शब्दों में बहुत कुछ कहे गए आप बधाई हो |

    atharvavedamanoj के द्वारा
    November 8, 2010

    प्रिय मित्र, स्वतंत्र नितिन जी…शब्द ब्रम्ह होते हैं न…तो फिर इसमें अपरिमित उर्जा अवश्यम्भावी है…आपका बहुत बहुत आभार

    Evaline के द्वारा
    July 12, 2016

    Merci Sophie ! Je vais laisser mûrir un peu l&3#©;idÃ9e et peut être que je ferai appel à toi pour récupérer mes courses un de ces samedis ! ;-DA bientôt, b.

chaatak के द्वारा
October 8, 2010

क्या बात कही है बन्धु! आप छायावाद में रहस्यवाद का संयोजन बखूबी करते हैं आज पता चला| समझने वाले समझ गए हैं, न समझे वो अनाड़ी है! बेहतरीन कटाक्ष! वन्देमातरम!

    atharvavedamanoj के द्वारा
    November 8, 2010

    प्रिय मित्र चातक जी, प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद….मेरा काम पूरा हुआ…कभी कभी चार लाइने ही लिख देता हूँ …और वे मुझे भी बहुत अच्छे लगते हैं…जय भारत,जय भारती

    Tangie के द्वारा
    July 12, 2016

    Abby,I really appreciate this. I, too, was disollusiined in the midst of starting a pro-life womem’s clinic. I could not believe all the in-fighting that took place and, seriously, all the crazies. There are just some crazy people that will never be satisfied, no matter what you do or say. They want to fight – with anyone. Plain and simple, they thrive on conflict. Keep up the good work!

सुनील दत्त के द्वारा
October 6, 2010

सुन्दर रचना

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 6, 2010

    आदरणीय सुनील जी वन्दे मातरम, शायद आप समझ गएँ की मेरा इशारा किस और है. धन्यवाद


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