मनोज कुमार सिँह 'मयंक'

राष्ट्र, धर्म, संस्कृति पर कोई समझौता स्वीकार नही है। भारत माँ के विद्रोही को जीने का अधिकार नही है॥

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एक टुकड़ा रोशनी

Posted On: 30 Sep, 2010 Others में

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एक टुकड़ा रोशनी का चाँद-तारे ने लिया था।
एक टुकड़ा रोशनी को गोरी चमड़ी ने पिया था॥
एक टुकड़ा रोशनी पर उसने आरक्षण लिया है।
एक टुकड़ा रोशनी का राहु ने भक्षण किया है॥
एक टुकड़ा रोशनी की बन गयी सीमा हमारी।
एक टुकड़ा रोशनी पर हो रहा आदेश जारी॥
निष्कर्ष-
सब कुछ फूँक-ताप बैठा हूँ,मरघट के उजियारे मेँ।
आवाजे भी नहीँ सुनायी पड़ती अब अँधियारे मेँ॥
उधर एक रोशनी हुई थी, अब तक जिसकी यादेँ हैँ।
अब तो बस अँधेरा ही है और बाते ही बाते हैँ॥

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