मनोज कुमार सिँह 'मयंक'

राष्ट्र, धर्म, संस्कृति पर कोई समझौता स्वीकार नही है। भारत माँ के विद्रोही को जीने का अधिकार नही है॥

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वंदेमातरम शब्द नहीँ,यह भारत माँ की पूजा है

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bharatma

विगत कई दिनोँ से मंच पर घमासान मचा हुआ है।कुछ नये लेखकोँ का आगमन हुआ है,तो कुछ पुराने लेखकोँ ने सत्य को पूरी तरह से उलझा दिया है।जिसको स्वयं मार्ग नहीँ मिला,वह मार्ग दिखाने चल पड़ा है और इन दिग्भम्रित लोगोँ ने पूरे मंच को ही दिग्भम्रित कर दिया है।जहाँ तक मेरा विचार है,सत्य मेँ जीने वाला सत्य के साथ प्रयोग नहीँ किया करता और जिसको परमपिता परमेश्वर का साक्षात्कार हो गया है,वह ब्लाँग नहीँ लिखा करता।चातक जी ने अपने आपको विधर्मी कहा है,सही बात है,यदि अन्याय और असत्य के विरुद्ध बोलना धर्म के विरुद्ध है तो मैँ भी विपरीतधर्मी होने के कारण विधर्मी हुआ और मुझे खुशी होगी,जब,मंच पर इस तरह के विधर्मियोँ की तादाद बढ़ती जाएगी।
चातक जी की हार्दिक इच्छा है कि मैँ वंदेमातरम के बारे मेँ कुछ लिखूँ और सौभागय से मैँ इस महामंत्र के बारे मेँ पहले ही कलम चला चुका हूँ।चातक जी के मार्गदर्शन कविता तकनीकि रुप से भी निखर गई है।इस बार की कविता मंच के समस्त राष्ट्रवादी मित्रोँ के प्रति समर्पित है।-

बेशक तुमने अपमान किया।खण्डित भारत का मान किया॥
यह वंदेमातरम सम्प्रदाय का परिचायक है,मान लिया॥
आओ,मै तुम्हे बताता हूँ,इस वंदेमातरम की सत्ता।
तुमको उसका भी ज्ञान नहीँ जो जान चुका पत्ता-पत्ता॥
जो ज्ञानशून्य भू पर बरसी,बन,शून्य-ज्ञान की रसधारा।
दशमलव दिया इसने तब,जब था बेसुध भूमण्डल सारा॥
जब तुमलोगोँ के पुरखोँ को ईमान का था कुछ भान नहीँ।
कच्चा ही बोटी खाते थे, वस्त्रोँ का भी था ज्ञान नहीँ।
जंगल-जंगल मेँ पत्थर ले, नंगे-अधनंगे फिरते थे।
सर्दी-गर्मी-वर्षा अपने उघरे तन पर ही सहते थे।।
तब वंदेमातरम के साधक, माँ चामुण्डा के आराधक।
अज्ञान तिमिर का जो नाशक,था ढूँढ़ लिया हमने पावक॥
मलमल के छोटे टुकड़े से, उन्मत्त गजोँ को बाँध दिया।
दुःशासन का पौरुष हारा, पट से पाञ्चाली लाद दिया॥
जब वंदेमातरम संस्कृति को था किसी सर्प ने ललकारा।
तब लगा अचानक ही चढ़ने जनमेजय के मख का पारा॥
यह वंदेमातरम उसी शक्तिशाली युग की शुभ गाथा है।
जिसके आगे भू के सारे नर का झुक जाता माथा है॥
इसका प्रथमाक्षर चार वेद,द्वितीयाक्षर देता दया,दान।
तृतीयाक्षर माँ के चरणोँ मेँ,अर्पित ऋषियोँ का तप महान॥
पञ्चम अक्षर रणभेरी है,अंतिम मारु का मृत्युनाद।
चिर उत्कीलित यह मंत्र मानवोँ की स्वतंत्रता का निनाद॥
जो स्वतंत्रता का चरम मंत्र,जो दीवानोँ की गायत्री।
जो महाकाल की परिभाषा,भारत माँ की जीवनपत्री॥
जो बलिदानोँ का प्रेरक है,जो कालकूट की प्याली है।
जो है पौरुष का बीजमंत्र, जिसकी देवी माँ काली है॥
जो पृथ्वीराज का क्षमादान, गोरी का खण्डित हुआ मान।
जो जौहर की हर ज्वाला है, जो आत्मत्याग की हाला है॥
जिसमेँ ऋषियोँ की वाणी है, जो शुभदा है, कल्याणी है।
जो राष्ट्र-गगन का इन्द्रधनुष,उच्चारण मंगलकारी है॥
जिसमेँ दधीचि की हड्डी है, हाँ,हाँ जिसमेँ खुद चण्डी है।
जो पुरुषोत्तम का तीर धनुष,हाँ जिसमेँ हैँ नल,नील,नहुष॥
राणा-प्रताप का भाला है, विष कालकूट ने डाला है।
जो प्रलय मचाने वाला है,इसको विद्युत ने पाला है॥
इसमेँ शंकर का दर्शन है, जिसका भावार्थ समर्पण है।
जो बजरंगी का ब्रम्हचर्य, जो आत्मबोध का दर्पण है॥
यह वागीश्वरी का सौम्य तेज,अम्बर से झरता झर-झर है।
यह चामुण्डा के हाँथो मेँ शोणित छलकाता खप्पर है॥
जो मनुपुत्रोँ के लिये स्वर्ग, सर्वात्मवाद की धुरी रही।
जिसमेँ देवोँ की दैविकता अमृत बरसाती सदा रही॥
उस ऐक्य मंत्र के ताने को,तेजस्वी गैरिक बाने को।
उर्जा की दाहक गर्मी को, उस मानवता को,नरमी को॥
गंगाधर के शिव स्वपनोँ मेँ, नेताजी के बलि भवनोँ मेँ।
गौतम के मंगल कथनोँ मेँ, मीरा के सुन्दर भजनोँ मेँ॥
यह किसने आग लगाया है, जग को उल्टा बतलाया है॥
यह किसने आग लगाया है, जग को उल्टा बतलाया है॥
यह वंदेमातरम शब्द नहीँ यह भारत माँ की पूजा है।
माँ के माथे की बिँदिया हैश्रृंगार न कोई दूजा है॥
इसमेँ तलवार चमकती है मर्दानी रानी झाँसी की।
इसमेँ बलिदान मचलता है,दिखती हैँ गाँठे फाँसी की॥
मंगल पाण्डे की यादेँ हैँ।शिवराज नृपति की साँसेँ हैँ॥
यह बिस्मिल के भगवान वेद।यह लौह पुरुष का रक्त स्वेद॥
यह भगत सिँह की धड़कन है।आजाद भुजा की फड़कन है॥
यह गंगाधर की गीता है, चित्तू पाण्डे सा चीता है।
जलियावाला की साखी है।हुमायूँ बाहु की राखी है॥
यह मदनलाल की गोली है।मस्तानी ब्रज की होली है॥
यह चार दिनोँ के जीवन मेँ चिर सत्य,सनातन यौवन है।
यह बलिदानोँ की परम्परा अठ्ठारह सौ सत्तावन है॥
हिन्दू,मुस्लिम,सिख,ईसा के बन्दे सब इसको गाते हैँ।
सब इसे सलामी देते हैँ,इसको सुन सब हर्षाते हैँ॥
लेकिन कुछ राष्ट्रद्रोहियोँ ने है इसका भी अपमान किया।
इस राष्ट्रमंत्र को इन लोगोँ ने सम्प्रदाय का नाम दिया॥
जाओ,जाकर पैगम्बर से पूछो तो क्या बतलाते हैँ?
वे भी माता के पगतल मेँ जन्नत की छटा दिखाते हैँ।
यह देखो सूली पर चढ़कर क्या कहता मरियम का बेटा।
हे ईश्वर इनको क्षमा करो जो आज बने हैँ जननेता।।
ये नहीँ जानते इनकी यह गल्ती क्या रंग दिखलायेगी।
इस शक्तिमंत्र से वञ्चित हो माँ की ममता घुट जायेगी॥
गोविन्द सिँह भी चण्डी का पूजन करते मिर जायेँगे।
शिव पत्नी से वर लेकर ही संघर्ष कमल खिल पायेँगे।
फिर बोलो माँ की पूजा का यह मंत्र कम्यूनल कैसे है?
माँ को महान कहने वाला शुभ तंत्र कम्यूनल कैसे है?
तुम केवल झूठी बातोँ पर जनमानस को भड़काते हो।
गुण्डोँ के बल पर नायक बन केवल विद्वेष लुटाते हो॥
लेकिन,जब यह घट फूटेगा।जब कोप बवंडर छूटेगा॥
जब प्रलय नटी उठ नाचेगी।भारत की जनता जागेगी॥
तब देश मेँ यदि रहना होगा।तो वंदेमातरम कहना होगा॥
मनोज कुमार सिँह ‘मयंक’

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363 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rakesh gupta के द्वारा
October 7, 2010

वन्दे मातरम बंधु वर, इस ब्रह्म वाक्य पर कुछ भी कहना सूरज को दिया दिखाना है

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 8, 2010

    आदरणीय राकेश गुप्ता जी सादर वन्देमातरम आपकी छोटी पर बहुत ही उत्साहजनक टिप्पणी प्राप्त हुई,आपका कोटि कोटि धन्यवाद…जय भारत ,जय भारती

Amit kr Gupta के द्वारा
October 7, 2010

वन्दे मातरम शब्द बोलने में किसी को भी हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए. यह भारत माँ की पूजा हैं. बेहतरीन लेख. ]www.amitkrgupta.jagranjunction.com

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 8, 2010

    अमित जी आप सच कहते हैं, ऐतराज तो किसी को भी नहीं होना चाहिए,लेकिन हो रहा है,क्या करे भाई ये पब्लिक है सब जानती है …आपका आभार

Amit kr Gupta के द्वारा
October 7, 2010

नमस्कार मनोज जी .अतिसुन्दर रचना. मैंने कुछ ब्लॉग लिखे हैं कभी फुर्सत मिले तो पढ़कर अपने शिकायतों और सुझाव से अवगत करावे. जय हिंद जय भारत. http://www.amitkrgupta.jagranjunction.com

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 8, 2010

    आदरणीय अमित जी सादर वन्देमातरम, आपकी प्रतिक्रियाओं का आभारी हूँ…मैं निश्चित रूप से आपके ब्लॉग को पढना चाहूँगा…जय भारत,जय भारती

arun kumar singh के द्वारा
October 6, 2010

वन्देमातरम, अतीव सुन्दर रचना है,

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 6, 2010

    सादर वन्देमातरम अरुण जी धन्यवाद

    Amory के द्वारा
    July 12, 2016

    Okay, as someone who actually -has- had a bookcase fall on them, I want to know where my Broody McVpnaypamts was. Why weren’t you there to stop it from happening, eh Broody? Some stalker you are, I am very disappointed in you.Also, as an aside, I love how most of us go straight to MST3K-esque names, if not outright using ones from Space Mutinty.

Dharmesh Tiwari के द्वारा
October 1, 2010

श्री मनोज जी,पढने के बाद अचानक ही आवाज निकल आती है बन्दे माँ तरम,बहुत ही जबरदस्त पेशगी,बधाई

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 1, 2010

    प्रिय श्री धर्मेश जी सादर वन्दे मातरम, प्रतिक्रियाओं का बहुत बहुत आभारी हूँ ..जय भारत,जय भारती

Arvind Pareek के द्वारा
September 26, 2010

प्रिय श्री मनोज जी, वंदेमातरम । वंदेमातरम की यह गुँज आखिर मुझे भी सुनाई पड़ ही गई । आपकी इस दहाड़ ने सोते से जगा दिया है । बहुत ही बेहतरीन रचना हैं । मेरे जैसे ना जाने कितने पाठक इसकी प्रति सहेज कर रखना चाहेंगें । आपसे अनुरोध है कि प्रतिलिपि की अनुमति कृपया मेरे साथ-साथ सभी को दें दें । ओज से भरी व उत्‍साह बढ़ाती यह वंदना पढ़तें-पढ़ते भी रोंगंटें खड़ें कर देती हैं । भारत माता की जय…. वंदेमातरम । अरविन्‍द पारीक http://bhaijikahin.jagranjunction.com/

    atharvavedamanoj के द्वारा
    September 27, 2010

    प्रिय श्री अरविन्द जी सादर वन्दे मातरम, मैं जो कुछ भी लिखता हूँ वह स्वान्तः सुख के लिए लिखता हूँ …आपको मेरी कविता पसंद आई इसके लिए आपको धन्यवाद,मैंने इस कविता पर कोई copyright नहीं रखा है,मुझे प्रसन्नता होगी यदि आप इस कविता को सवयम पढने के साथ-साथ अन्य लोगों को भी पढने के लिए प्रेरित करेंगे..मैंने आपके लेख पढ़े हैं और मैं हृदय से आपके कृतियों की भूरी भूरी प्रशंसा करता हूँ ..क्या करूं ..कमेन्ट देने का अवसर ही नहीं मिल पाता..चलिए मैं यहीं पर आपको बधाई दे देता हूँ ..आशा है आप निराश नहीं करेंगे …आपका बहुत बहुत धन्यवाद …जय भारत जय भारती

swatantranitin के द्वारा
September 25, 2010

मनोज जी ! सर्वप्रथम तो मैं आपके इस लेख को और आपकी देश के प्रति इस सोंच को दंडवत प्रणाम करता हूँ | आपने भारत माता का एक अदबुध, अलोकिक दर्शन कराया है मुझे और हम सभी को | जब-जब पढता हूँ तब-तब पूरे शरीर में कुछ होने लगता है और पढने की रफ़्तार भी तेज होती जाती है | बहुत ही सुन्दर तथा झंझोर देने वाला सत्य लिखा है आपने | बहुत बहुत बहुत ………. बधाई हो भारत माता की जय……….. वन्देमातरम…

    atharvavedamanoj के द्वारा
    September 27, 2010

    नितिन जी वन्दे मातरम इस कविता के प्रति आपकी भावनाओं को मैं प्रणाम करता हूँ,आपका आभार| वन्देमातरम

सुनील दत्त के द्वारा
September 23, 2010

भारतविरोधियों को इसे ध्यान से पढ़कर अमल करना चाहिए या फिर भारत में की पवित्र धरा से रूपसत हो  जाना चाहिए । अन्यथा देशभक्ति के इस जवार द्वारा रूफसत कर दिए जायेंगे। मनोज जी आपने देशभक्ति की जबरदस्त अभिवयक्ति हम सबके सामने रखी है हम जरूर वीरों के रास्त पर आगे बढ़ेंगे। सुन्दर रचना पर आपको हार्दिक बधाई

    atharvavedamanoj के द्वारा
    September 23, 2010

    माननीय सुनील जी आपका आशीर्वाद मिला यही हमारे लिए बहुत है …राष्ट्र्घातियों के विरुद्ध प्रचंड ज्वर की आवश्यकता स्वयंसिद्ध है ….वन्दे मातरम

div81 के द्वारा
September 23, 2010

ये तो गागर में सागर है ………………….वन्देमातरम मनोज जी ये वंदना जितनी बार पढ़ रही हूँ हर बार रोंगटे खड़े हो जा रहे है | मुझे गर्व है की मैं हिन्तुद्स्तानी हूँ

    atharvavedamanoj के द्वारा
    September 23, 2010

    वन्दे मातरम बहन वन्दे मातरम मन्त्र ही कुछ ऐसा है जो प्रत्येक व्यक्ति को झिंझोड़ कर रख देता …शायद इसके पीछे हमारे महान पूर्वजों का दिव्यतम बलिदान हो….पितृ पक्ष में यह रचना शायद हमारे पूर्वजों का शब्दमय श्राद्ध बन सके…और उनके आशीष से वन्दे मातरम फिर से भारत मन्त्र बन जाये …जय भारत ..जय भारती

vijendra singh bhadoria के द्वारा
September 23, 2010

बहुत ही सुंदर शब्दों में भारत माता की आरती …………..

    atharvavedamanoj के द्वारा
    September 23, 2010

    प्रिय मित्र विजेंद्र जी सदर वन्दे मातरम, क्या बात है आजकल आपका मंच पर बहुत कम आना हो रहा है …आपका बहुत बहुत आभार जय भारत जय भारती

आर.एन. शाही के द्वारा
September 23, 2010

बंदेमातरम की इससे बेहतरीन और कोई व्याख्या नहीं की जा सकती । बधाई मनोज जी ।

    atharvavedamanoj के द्वारा
    September 23, 2010

    आदरणीय शाही जी सादर वन्दे मातरम आपके स्नेह से बड़ा कोई पुरस्कार हो ही नहीं सकता …

vijai kaushal के द्वारा
September 23, 2010

यह कविता मयंक जी की प्रभावशाली बंदेमातरम-चालीसा को समर्पित है. बन्दे……………………………मातरम! यह कविता नहीं चालीसा है, भारत माँ का गुणगान है. ये तथाकथित सेकुलर क्या समझे,मेरा भारत महान है. जो दूजे देश की संस्कृति, को अपना समझ अपनाते हैं. जो अपनी माँ को भूल चुके, दूजे को माँ,माँ चिल्लाते हैं. ये हैं पड़वा ,दिल के काले, खींचे लकीर ,मजहबी दीवारें. इनको किससे क्या मतलब है, जन-गण तो बस वोटर सारे. जो फिलिस्तीन ,और इराक के खातिर,शेम-शेम चिल्लाते हैं. सिखों को जब पाक में मारा जाता है,तो पल्लू में छुप जाते हैं. ये कैसा दोहरा मापदंड, क्या हिन्दू होना पाप है. क्या सिख -इसाई नहीं वोटर हैं, क्या हिंदुस्तान अभिशाप है. मुस्लिम -मुस्लिम रटते रहते, हिन्दू-मुस्लिम को खींच रहे. गीता-कुरान की धरती को, वोटों के खातिर नीच रहें. सदियों से रहते आयें हम सब,हिन्दू-मुस्लिम-सिख-इसाई. क्यूं सत्ता के खातिर, हम सबमे करवाते हो लड़ाई. क्या बंदेमातरम केवल , हिन्दू ही गाता था. क्या ५७ की लड़ाई में. मुस्लिम यह न,चिल्लाता था. अब आज तुम्हे बंदेमातरम में , साम्प्रदायिकता नजर आती है. माँ की जय-जय में भी, अब राजनीति चढ़ जाती है. कब तक ,कब तक धर्म ,मजहब पर हम सब को भड़काओगे. क्या आजादी की दूसरी लड़ाई लड़वाओगे

    atharvavedamanoj के द्वारा
    September 23, 2010

    कौशल विजय जी आपकी इस कविता पर तीन तीन प्रतिक्रियाएं भी मिलीं और इस पर आधारित एक स्वतंत्र काव्य रचना भी पढने को मिली …भावनाओं का अतिरेक ही कविता है …आपका विनम्र आभार …जय भारत ..जय भारती आपके अन्दर भी एक महान कवि है….आपकी रचना को प्रणाम आजादी की दूसरी लड़ाई अब हमारी अपरिहार्यता बन चुकी है किन्तु मित्र आपसे एक प्रार्थना है की भावनाओं के अतिरेक में भाषा को संयत रखना ही सबसे बड़ा आदर्श है …मै भी कभी कभी असंयत हो जाता हूँ और भाषा पर से अपना नियंत्रण खोने लगता हूँ …किन्तु हमारी संस्कृति हमे हमेशा ऐसा करने से रोक देती है ..आपके आक्रोशित स्वर को मेरा नमन

nishamittal के द्वारा
September 23, 2010

भारत माता की वंदना प्रस्तुत करने पर बधाई.एक आशा की किरण दिखाई देती है जब राष्ट्र प्रेम से ओतप्रोत उदगार पढने को मिलते हैं.अतीव सुन्दररचना मनोज जी.

    atharvavedamanoj के द्वारा
    September 27, 2010

    निशा जी सादर वन्देमातरम, रचना की प्रशंसा करने आपका कोटि कोटि धन्यवाद जय भारत,जय भारती

kaushalvijai के द्वारा
September 23, 2010

“यह कविता नहीं ,चालीसा है, भारत माँ का गुणगान है. यह तथाकथित सेकुलर क्या जाने,भारत मेरा महान है. जो दूजो की संस्कृति को ,अपना समझ अपनाते हैं. जो अपनी माँ को छोड़,दूजी को माँ बुलाते हैं. ये सारे पड़वा है, इनको क्या है माँ का ज्ञान. पड़वा तो केवल भैंसा हैं,इनको इसका है अभिमान.” मनोज जी , आपने बहुत ही सुन्दर कविता लिखी. बन्दे…………..मातरम

    atharvavedamanoj के द्वारा
    September 23, 2010

    कौशल विजय जी आपकी इस कविता पर तीन तीन प्रतिक्रियाएं भी मिलीं और इस पर आधारित एक स्वतंत्र काव्य रचना भी पढने को मिली …भावनाओं का अतिरेक ही कविता है …आपका विनम्र आभार …जय भारत ..जय भारती

kaushalvijai के द्वारा
September 23, 2010

\"यह कविता नहीं ,चालीसा है, भारत माँ का गुणगान है. यह तथाकथित सेकुलर क्या जाने,भारत मेरा महान है. जो दूजो की संस्कृति को ,अपना समझ अपनाते हैं. जो अपनी माँ को छोड़,दूजी को माँ बुलाते हैं. ये सारे पड़वा है, इनको क्या है माँ का ज्ञान. पड़वा तो केवल भैंसा हैं,इनको इसका है अभिमान.\" मनोज जी , आपने बहुत ही सुन्दर कविता लिखी. बन्दे…………..मातरम

    atharvavedamanoj के द्वारा
    September 23, 2010

    कौशल विजय जी आपकी इस कविता पर तीन तीन प्रतिक्रियाएं भी मिलीं और इस पर आधारित एक स्वतंत्र काव्य रचना भी पढने को मिली …भावनाओं का अतिरेक ही कविता है …आपका विनम्र आभार …जय भारत ..जय भारती आपके अन्दर भी एक महान कवि है….आपकी रचना को प्रणाम

kmmishra के द्वारा
September 23, 2010

वंदेमातरम ! भारत मां के चरणों में कोटि कोटि नमन । भारत मां के सच्चे वीर पुत्र मनोज कुमार सिंह मयंक को भी मेरा कोटि कोटि प्रणाम । भारत मां की इस स्तुति को पूरा पढ़ने की अभिलाषा है । भारत मां की इस ओजस्वी वंदना को काॅपी करने की अनुमति चाहता हूं । जय हिंद ।

    atharvavedamanoj के द्वारा
    September 23, 2010

    श्रीमान मिश्रा जी आपका बहुत बहुत अभिवादन… वन्देमातरम …कोटि कोटि भरतवंशियों का तन मन जीवन सब कुछ है …इसे मंच पर पूर्ण रूप में रखने का प्रयास करूंगा ..क्या करूं विषय ढेर सारे हैं और समय बहुत कम मिल पाता है …आप इसे कॉपी करेंगे तो मुझे अतीव प्रसन्नता होगी …आपका आभार …वन्देमातरम

    Rock के द्वारा
    July 12, 2016

    - Hello there. I was thinking of adding a website link back to your site since both of our websites are centered around the same subject. Would you prefer I link to you using your site address: or website title: Cam Caddie Starter Kit | Steadicam merlin2 review. Please make sure to let me know at your earliest coenvnience. Many thanks

Ramesh bajpai के द्वारा
September 23, 2010

जब वंदेमातरम संस्कृति को था किसी सर्प ने ललकारा। तब लगा अचानक ही चढ़ने जनमेजय के मख का पारा॥ यह वंदेमातरम उसी शक्तिशाली युग की शुभ गाथा है। जिसके आगे भू के सारे नर का झुक जाता माथा है॥ प्रिय मनोज जी आपने भारत माता का इस ओजस्वी बंदना से अभिनन्दन किया है कोटिश धन्यवाद . बार बार पढने पर भी आत्मा तृप्त नहीं हो प् रही . हार्दिक शुभ कामनाये.

    atharvavedamanoj के द्वारा
    September 23, 2010

    श्रीमान रमेश वाजपेयी जी आपका कोटि कोटि अभिवादन भारत माता की यह वंदना जन जन तक पहुंचे …यही मेरी कामना है …वन्देमातरम

    Malerie के द्वारा
    July 12, 2016

    The real problem is when the appraiser checks ‘declining market’ on the appraisal, then you’re fu… or somethingSome large chunks of Jersey are considered &#cnl0;de82i2ing market” by lenders and mortgage insurers.

chaatak के द्वारा
September 22, 2010

प्रिय मनोज जी, राष्ट्र को समर्पित आपकी इस अनमोल रचना की एक प्रति मैं अपने लिए सुरक्षित करने का लोभ मैं संवरण नहीं कर पा रहा हूँ आपकी सहमति चाहिए |

    atharvavedamanoj के द्वारा
    September 23, 2010

    चातक जी, आप मुझे शर्मिंदा कर रहें हैं….इस कविता पर जितना अधिकार मेरा है …उतना ही अधिकार आपका भी है …यह कविता दम तोड़ रही थी ..आपकी प्रेरणा और मार्गदर्शन ने इसे पुनर्जीवित किया …आपका बहुत बहुत धन्यवाद ..वन्देमातरम

    Rayann के द्वारा
    July 12, 2016

    Les spaghettis ne sont pas les meilleures pâtes : il faut gouter les tagliatelles, les linguines, les fettucines ….Une chose est sûre : les pâtes, c’est vachement bon qu8leu&#e217;ellqs soient !!

NIKHIL PANDEY के द्वारा
September 22, 2010

मनोज जी धन्यवाद के साथ बस एक शब्द ही कहूँगा……………… वन्देमातरम

    atharvavedamanoj के द्वारा
    September 23, 2010

    बहुत बहुत धन्यवाद निखिल जी वन्देमातरम

    Kelenna के द्वारा
    July 12, 2016

    comentou em 27 de maio de 2011 às 14:24. Me explica melhor isso dos olhos. O rímel transparente da Natura é muito bom. E você pode optar por usar um rímel marrom também, que fica bem mais leve que o preto para o di.ssjassB!!!

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
September 22, 2010

सुन्दर कविता ………… भावों से भरी हुई………… इस कविता के लिए हार्दिक बधाई…………

    atharvavedamanoj के द्वारा
    September 22, 2010

    बहुत बहुत धन्यवाद पियूष जी आपका बहुत बहुत आभार वंदेमातरम

chaatak के द्वारा
September 22, 2010

प्रिय मनोज जी, आज तो आपने सचमुच मन मोह लिया| इस रचना को कविता या छंद कहना बड़ी भूल होगी भारत माता की की इस ओजस्वी वंदना को कोटि कोटि नमन! इस रचना को पढ़ते हुए भावातिरेक से जो लहरें तरंगित हुईं वे अभी तक मनो-मष्तिस्क को झंकृत कर रही हैं| आज तक की पढ़ी गई राष्ट्रवादी रचनाओं में मैं इसे सर्वोत्तम मानता हूँ| कई बार मन किया कि किसी पंक्ति विशेष को यहाँ अवतरित करूँ परन्तु पूरी रचना की एक भी पंक्ति ऐसी नहीं जिसे अवतरित न करने पर कसक न रह जाए इसलिए सिर्फ रचना को अपना भावपूर्ण नमन अर्पित करता हूँ | मैं ह्रदय से आपका आभारी हूँ कि आपने इस रचना को मंच पर रख कर हमें उपकृत किया! वन्दे-मातरम्!

    atharvavedamanoj के द्वारा
    September 22, 2010

    वन्दे मातरम चातक जी भारत ही मेरा धर्म है और वन्देमातरम इसका बीजमन्त्र….कविता बहुत ही लम्बी है ….इसलिए इसमें कुछ संशोधन किया गया है …कभी अवसर मिला तो पूरी कविता प्रस्तुत करूंगा ….भारत माता की पर्त्येक वंदना सर्वोत्कृष्ट ही होती है …और इसका विरोध मेरा विरोध है …आपका विरोध है …कोटि कोटि हिंदुस्तानिओं का विरोध है ….और जिसने भी एसा करने का कुत्सित प्रयास किया …उसपर माँ वागीश्वरी द्वारा प्रदत्त मेरी वाणी की तलवार हमेशा लटकती रहेगी …..कविता का यह आकर्षक रूप बिना आपके तकनिकी सहयोग के हो ही न पाता ….वन्देमातरम


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