मनोज कुमार सिँह 'मयंक'

राष्ट्र, धर्म, संस्कृति पर कोई समझौता स्वीकार नही है। भारत माँ के विद्रोही को जीने का अधिकार नही है॥

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कहीँ तुम्हारा ग्रंथ जले

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कहीँ तुम्हारा ग्रंथ जले और कहीँ फूँक दो तुम सिँहासन।
किससे जाकर कहेँ राजगद्दी पर बैठा भ्रष्ट दुःशासन॥

कागज के जलने से बढ़कर निन्दित रक्त प्रवाह नहीँ है?
उनको क्या बतलाये जिनको मानवता की चाह नहीँ है॥
माना ग्रंथ जलाना निन्दित किँतु तेरा अभिनन्दन क्योँ हो?
जब सब कुछ ही खण्डन लायक, फिर महिमा मण्डन ही क्योँ हो?
क्या हमको भी तक्षशिला और नालन्दा की याद नहीँ है?
अथवा अलक्षेन्द्र ग्रंथालय की कोई परवाह नहीँ है?

किँतु कहाँ से सीखा तुमने तेरा ग्रंथ नहीँ बतलाता।
जो खुद को पापी कहता है, वह क्योँकर हो पाप सिखाता॥
क्षमा,दया,करुणा ही हमको नत कर देती जीसस बन्दे।M_Id_165872_Kashmir_violence
किँतु बताओ हमेँ कहाँ से आग लगाना सीखा तुमने?
जिसने तेरी पोथी फूँकी वह पापी सचमुच पापी है।
लेकिन इस पर रक्त बहाने वाला तू भी अपराधी है।
मैँ भी अपराधी हूँ क्योँकि मैँने जो जाना समझा है।
बिना किसी भय पक्षपात के जनता के सम्मुख रक्खा है।ॐ

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699 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rajan,sunderpur,vns के द्वारा
November 3, 2010

प्रिय मनोज जी !! लगता है की अंतर्रात्मा से आपका जुड़ाव है . तभी आप इतनी सुंदर लिखते है जो दिल को छूती है . आपको बहुत -बहुत धन्यवाद ..

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
September 19, 2010

प्रिय मनोज जी ! सुन्दर रचना जिसकी प्रत्येक पंक्ति सच को उद्घाटित करती….. क्षमा,दया,करुणा ही हमको नत कर देती जीसस बन्दे। किँतु बताओ हमेँ कहाँ से आग लगाना सीखा तुमने? जिसने तेरी पोथी फूँकी वह पापी सचमुच पापी है। लेकिन इस पर रक्त बहाने वाला तू भी अपराधी है। अतिउत्तम हैं … बधाई

    atharvavedamanoj के द्वारा
    September 19, 2010

    प्रिय मित्र शैलेश जी वन्देमातरम आपको कविता अच्छी लगी यह जानकार हर्किक प्रसन्नता की अनुभूति हुई है….आज का युवा वर्ग दिग्भ्रमित है उसे क्रिकेट और फिल्मों से ही संजीवनी मिलती है किन्तु आज के इस दौर में भी श्रिंगार की जगह वीर रस को पसंद करने वालें आप जैसे युवा हैं ….यह जानकर मन को संतोष मिलता है…आभार

vijendrasingh के द्वारा
September 18, 2010

सुभाष चन्द्र बोस जी (मनोज जी ) बहुत सुन्दर कविता के लिए धन्यवाद ……….

    atharvavedamanoj के द्वारा
    September 19, 2010

    प्रिय मित्र श्रीमान विजेंद्र सिंह जी यह तो आपका स्नेह ही है जिसने मेरी तुलना उस महान स्वतंत्रता सेनानी से करवा दी है….अन्यथा मैं तो उस वीर प्रवण की तुलना में उनके नख के बराबर भी नहीं हूँ| मुझे क्षमा करें यह आपकी व्यक्तिगत मान्यता है…मैं सुभाष चन्द्र बोस, नहीं मैं मनोज कुमार सिंह मयंक हूँ| जहाँ तक साहस की बात है तो इस तरह का ब्लॉग लिखना उतना साहस का कम नहीं है जितना उसे पढना और उस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करना…. वन्देमातरम और धन्यवाद आपका मित्र

    Bubba के द्वारा
    July 12, 2016

    Ajaariga ama liinta la-keydiyey waa wax aad u-sahlan sayimskeisa. Annaga mar walba waan sameysannaa. Insha-Allah waan soo gelin doonnaa.

kmmishra के द्वारा
September 16, 2010

बहुत खूब । वीररस से ओतप्रोत बहुतों को आईना दिखाती कविता के लिये बहुत बहुत आभार ।

    atharvavedamanoj के द्वारा
    September 19, 2010

    आदरणीय मिश्रा जी आपकी शुभकामनाओं से ओतप्रोत बधाई के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद्….आपका मार्गदर्शन ही इस अकिंचन को संबल प्रदान करता है….वन्देमातरम

आर.एन. शाही के द्वारा
September 16, 2010

आपकी वीररस वाली शैली का जवाब नहीं … बधाई ।

    atharvavedamanoj के द्वारा
    September 16, 2010

    आपका अनुग्रह पाकर अभिभूत हुआ..हमारा आत्मबल और बढ़ा है..धन्यवाद

    Lyndall के द्वारा
    July 12, 2016

    Odo felvetése talán nem alaptalan. Sajnos ellenÅ‘rizni nem igen lehet (IP alapján igen, de nem hiszem, hogy azzal fogsz pepecselni)…Én nem javaslok, semmit, nem akarok beleugatni a blogodba, de bizony az ide érkezett kommenteket is moderálni kellene, Péter kivételével, mert nem sok értelme van. Káromkodni jó, szeretek én is, de ennnél a postnál fölösleges harn©i…PÃytegnek:Tegnap fogtam a kezembe Jack London írásait tartalmazó két kötetet. Legalább tudom, hogy melyiket érdemes (Poe novelláit feladtam) óvasni. Kösz.

Y.DUBEY के द्वारा
September 16, 2010

प्रिय मयंक जी, यद्यपि मैंने आपको कभी भी प्रतिक्रिया नहीं दी है, फिर भी आज के अंक को पढ़कर रुक नहीं पाया ,विचार आपके अछरशः सत्य है ,लेकिन मै यहाँ आपके शैली की बात करूंगा ,जिस तरीके से आपने कविता की सुरूआत की है जितनी प्रशंशा की जाये कम है,आपकी कविता में जहा एक तरफ राष्ट्रवाद की प्रबलता है वही दुह्शासन को उधृत कर आपने अपनी असहाय क़सक दर्शाया है ,इतिहास की विद्रूपता अपने आप आँखों के सामने आ जाती है ,ईश्वर से प्रार्थना है की आपके अन्दर की यह असंतोष की आग जलती रहे.

    atharvavedamanoj के द्वारा
    September 16, 2010

    आदरणीय दुबे जी आपकी प्रतिक्रिया पढ़कर प्रसन्नता हुई| मैं जानता हूँ की इस मंच पर एसे कई बंधू हैं जो न सिर्फ मेरी बातों से सहमत हैं बल्कि इस तरह के सत्यान्वेषी विचारों को पढ़कर संजीवनी भी प्राप्त करते हैं|शायद आपका इशारा मेरे उस ब्लॉग की ओर है जिसे मैं मिटा चूका हूँ और इसका एकमात्र कारन यह हैं की जिस तरह की अश्लील गालियाँ मुझे इस मंच पर उस ब्लॉग के चलते सुनने को मिली मैं उसे सार्वजानिक नहीं करना चाहता| इसी भांति अपना स्नेह बनाये रखियेगा| धन्यवाद

    Blondy के द्वारा
    July 12, 2016

    Hello There. I found your blog using msn. This is a really well written article. I will make sure to bookmark it and return to read more of your useful info. Thanks for the post. I will deiilfteny comeback.

rameshbajpai के द्वारा
September 15, 2010

क्या हमको भी तक्षशिला और नालन्दा की याद नहीँ है? अथवा अलक्षेन्द्र ग्रंथालय की कोई परवाह नहीँ है? किँतु कहाँ से सीखा तुमने तेरा ग्रंथ नहीँ बतलाता। मनोज जी ….. बेमिशाल udgar

Ramesh bajpai के द्वारा
September 15, 2010

जब सब कुछ ही खण्डन लायक, फिर महिमा मण्डन ही क्योँ हो? क्या हमको भी तक्षशिला और नालन्दा की याद नहीँ है? अथवा अलक्षेन्द्र ग्रंथालय की कोई परवाह नहीँ है? manoj ji be mishal उदगार जो खुद को पापी कहता है, वह क्योँकर हो पाप सिखाता॥ क्षमा,दया,करुणा ही हमको नत कर देती जीसस ब

Ramesh bajpai के द्वारा
September 15, 2010

जब सब कुछ ही खण्डन लायक, फिर महिमा मण्डन ही क्योँ हो? क्या हमको भी तक्षशिला और नालन्दा की याद नहीँ है? अथवा अलक्षेन्द्र ग्रंथालय की कोई परवाह नहीँ है? मनोज जी ….. बे मिशाल उदगार सहिष्णु भाव

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 16, 2010

    मनोज जी मै बार बार परेशान होकर पोस्ट कर रहा था . देखिये मुझे पता नहीं चला और सब आ गए

    atharvavedamanoj के द्वारा
    September 16, 2010

    आदरणीय रमेश वाजपेयी जी सादर वन्देमातरम चातक जी से आपके बारे में वार्ता हो चुकी है, संभवतः इस मंच पर आपका नवागमन हुआ है इस हेतु आप हमारे पूर्व के ब्लॉग से परिचित नहीं है;इससे पहले के तीन ब्लॉगों में मैंने कुरान के बारे में कुछ लिखा था, जो पूरी तरह से यथार्थ होने के कारन कुछ लोगों को रास नहीं आया, मात्र १० दिनों में २००० हिट मिलें तो कुछ लोगों ने कहा की में एसा हिट पाने के लिए कर रहा हूँ, गालियाँ भी शुरू हो गयी. विषय से हट कर बातें हुई और अगर मैं अपने ब्लॉग हटा न देता तो वह अब तक का मोस्ट commented ब्लॉग भी होता, फिर लोग कहते की एसा मैंने कमेन्ट पाने के लिए किया है, मैंने कमेन्ट पर ताला लगा दिया. अलोकतांत्रिक हो गया. अगर गाली गलौज ही लोकतंत्र है तो लो लोकतंत्र ही मिटा देता हूँ. इसी लिए आपके भी कमेंट्स नहीं आ प् रहे थे| क्षमा कीजियेगा. एसा करना मेरी मजबूरी है| आपका स्नेह मिला तो ह्रदय गदगद हो गया| स्नेह बनाये रखियेगा धन्यवाद|

chaatak के द्वारा
September 15, 2010

प्रिय मनोज जी, आपकी कविता वास्तव में हर पंक्ति पर सवाल खड़े कर रही है जिसका जवाब अपनी पूरी समझ का प्रयोग करके भी तर्क से नहीं दिया जा सकता| मुझे सिर्फ एक बात समझ में आती है कि सत्य को स्वीकार कर लेना ही सबसे बड़ा मानव धर्म है| सत्य से नजरें चुराने वाले निरीह और अनाक्रमक लोगों का एक समय दमन जरूर कर सकते है लेकिन उस सबसे बड़े न्यायी की अदालत में एक अजब और सम्पूर्ण न्याय चलता है| लगता है उसी ईश्वरीय न्याय का चक्र आज ग्रंथों से भरे पुस्तकालय के जलने की वेदना को वापस कर रहा है| क्या कहूं – \’लम्हों ने खता की थी, सदियों ने सजा काटी\’ या फिर निर्बल को न सताइए जाकी मोटी हाय, मुई खाल की स्वांस से सार भसम होई जाय\’ या फिर बाढय पुत्र पिता के धरमे, खेती उपजय अपने करमे\’ एक साथ बुजुर्गों और महात्माओं की कही बाते चरितार्थ होती नज़र आ रही हैं मानो प्रारब्ध सुरसा की भाँती मुंह बाए खड़ा हो| दूसरी तरफ दूसरों की भावनाओं को आहत करने वाले हाथों पर ऊपर वाले की कौन सी गाज और कब गिरेगी सोचकर फिर से मस्तिष्क अपनी सीमाओं में विवश हो जाता है| \’अनहोनी होनी नहीं, होनी हो सो होए|\’ बेहतरीन सारगर्भित कविता पर बधाई!

    atharvavedamanoj के द्वारा
    September 16, 2010

    वाह भाई चातक जी आप तो हमेशा लाजबाब ही कर देते हैं| कहा गया है न सौ सोनार की और एक लोहार की | आपके लिए श्याम नारायण पाण्डेय की कुछ पंक्तिया प्रस्तुत कर रहा हूँ वेद विहित,व्याकरण शुद्ध,रस भरी तुम्हारी वाणी है| ह्रस्व,दीर्घ झंकृत उच्चारण,कथन शक्ति कल्याणी है|| वन्देमातरम


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