मनोज कुमार सिँह 'मयंक'

राष्ट्र, धर्म, संस्कृति पर कोई समझौता स्वीकार नही है। भारत माँ के विद्रोही को जीने का अधिकार नही है॥

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हिँसक गाँधी

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तवारीखोँ मेँ कुछ ऐसे भी मंजर हमने देखे हैँ।
कि लम्होँ ने खता की और सदियोँ ने सजा पाई॥
मोहनदास करमचंद गाँधी स्वतंत्रतापुर्व आधुनिक भारतीय इतिहास का वह अध्याय है,जिसे सबसे अधिक बार पढ़ा गया है, वह नाम है, जिसकी सर्वाधिक चर्चा हुई है और वह व्यक्तित्व है, जिसके बारे मेँ सबसे अधिक लिखा गया है। गाँधी से प्रभावित होने वालोँ की संख्या करोड़ो मेँ है और उन्हेँ पूजने वालोँ की संख्या लाखोँ मेँ, किँतु मैँ गाँधी से रत्तीभर भी प्रभावित नहीँ हूँ और यदि यह कहा जाय कि मैँ उनके धुरविरोधियोँ मेँ से एक हूँ तो इसमे कोई अतिशयोक्ति नहीँ होगा। मैँ जानता हूँ कि मैँ ऐसा करके करोड़ोँ लोगोँ के कोप का शिकार हो सकता हूँ किँतु फिर भी मैँ उनसे आजीवन घृणा करता रहूँगा। इसका यह अर्थ नहीँ है कि मेरी अहिँसा जैसे सनातन मूल्योँ मेँ कोई श्रध्दा नहीँ वरन् इसका यह अर्थ है कि मेरे प्रिय भारतवासियोँ को गाँधीवाद ने अहिँसा की छद्म अवधारणा प्रस्तुत कर दिग्भ्रमित कर रखा है।
यदि मुझे गाँधी और महात्मा बुद्ध की अहिँसा मेँ से किसी एक को चुनना पड़े तो मैँ निःसंकोच भगवान बुद्ध को ही चुनूगाँ क्योँकि भगवान बुद्ध के पास अहिँसा को प्रतिस्थापित करने हेतु एक सुस्पष्ट तर्क है, एक सुव्यवस्थित दार्शनिक विचारधारा है। उन्होँने ‘अति सर्वत्र वर्जयेत्’ के महत्व को पहचाना और मज्झिम मार्ग की शिक्षा देकर मानवता को दानवी अतिवाद से रोक लिया। डाकू से मानव बना अंगुलिमाल इसका स्पष्ट उदाहरण है। गाँधी ने कितने अंगुलिमालोँ को मानव बनाया? एक को भी नहीँ। बल्कि इसके विपरीत परतंत्र भारत मेँ और भारत विभाजन के समय जितना भी खून-खराबा हुआ, 1920 से लेकर 1948 तक की उस सम्पूर्ण हिँसा के लिये एकमात्र गाँधी और उनकी अतिवादी अहिँसक विचारधारा ही दोषी है।
1 मई 1947 को एक प्रार्थना सभा मेँ गाँधी ने हिँदुओँ को अपने सामूहिक कत्लेआम के लिये तैयार करते हुए कहा था, ‘I would tell the hindus to face death chearfully if the muslims are out to kill them. I would be the real sinner if after being stabbed I wished in my last moment that my son should seek revenge. I must die without rancour.’ यहाँ तक ही नहीँ उन्होँने आगे जोड़ा. ‘You may turn round and ask whether all hindus and all sikhs should die? yes, I would say, such martyerdom will not go in vain’ गाँधी के इन उद्गारोँ को भले ही अन्य लोग अहिँसा की एक मिसाल समझेँ मेरी दृष्टि मेँ मानसिक दिवालियेपन से अधिक और कुछ भी नहीँ है। गाँधी ने अपने आपको हिँदू कहा और मेरे यह समझ मेँ नहीँ आता कि हिँदुओँ का कौन सा ग्रंथ इस तरह की कायरतापूर्ण अहिँसा को महिमामण्डित करता है? अहिँसा की प्रतिमूर्ति समझी जाने वाली माँ सरस्वती भी दुर्गा सप्तशती मेँ मंत्रयुक्त जल छिड़क कर मानवता के शत्रुओँ का संहार करती दिखाई पड़ती हैँ। ‘ब्रम्हाणी चाकरोन्शत्रून् येन येन स्म धावति’। विष्णु के पास कमल के साथ चक्र।शिव के पास ध्यान,धारणा,समाधि के साथ पापियोँ के संहार हेतु आग उगलता हुआ त्रिशूल और ब्रम्हा के पास पुस्तक के साथ ही अनंत कोटि ब्रम्हाण्ड संहारक कमण्डल मेँ संरक्षित अथाह जलराशि। हिँदुओँ का कौन सा देवता अहिँसक,लाचार और पराधीन कायर है गाँधी? हिँदुओँ का कौन सा देवता बिना युद्ध किये अपने गर्दन को कसाई के छुरे पर रखने को तैयार है, तथाकथित महात्मा? कोई भी नहीँ।
1889 मेँ गाँधी का श्रीमद्भगवद्गीता से प्रथम साक्षात्कार हुआ।सर एविन आर्नोल्ड के अनुवाद को पढ़कर गाँधी ने अंग्रेजी मेँ कहा -”When doubts haunts me. when disappointments stare me in face and i see not one ray of light on the horizon. I turn to the Bhagwad Gita and find a verse to comfort me” गाँधी का श्रीमद्भगवद्गीता के संदर्भ मेँ इस तरह का उच्च विचार निःसंदेह प्रशंसनीय है किँतु मेरी यह समझ मेँ नहीँ आता कि ‘हतो वा प्राप्यसि स्वर्गँ,जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्।तस्माद् उत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः॥’ का उद्घोष करने वाली गीता गाँधी का स्पर्श पाते ही एकाएक अहिँसक कैसे हो गयी? मैँ अड़गड़ानन्द जैसे महामण्डलेश्वरोँ द्वारा रचित कल्पित ‘यथार्थ गीता’ की बात नही कर रहा और न ही मैँ गीता के किसी आध्यात्मिक रहस्यात्मक पचड़े मेँ पड़ना चाहता हूँ। निःसंदेह गीता मेँ क्षमा,करुणा,दया जैसे मानवीय मूल्योँ की बार-बार चर्चा की गयी है किँतु इसी ग्रंथ मेँ समस्त मानवीय मूल्योँ को सात्विक,राजस और तामस नाम के तीन भागोँ मेँ वर्गीकृत भी किया गया है।
स्वामी विवेकानन्द भी अहिँसक थे किँतु उनकी अहिँसा राजयोगी की अहिँसा थी।महात्मा बुद्ध की अहिँसा सतोगुणी अहिँसा थी जबकि गाँधी की अहिँसा तमोगुणी अहिँसा का अतिरेक है, जो मात्र अपने शरीर को पीड़ित करने तक ही सीमित नही है वरन् अपने पूरे परिवार,समाज,धर्म और राष्ट्र को भयंकर विपदा मेँ डाल देने वाला है।यह भ्रामक,त्रुटिपूर्ण,धर्मविरोधी, राष्ट्रद्रोही और गलत मान्यताओँ पर आधारित है। यह सत्यम्,शिवम और सुन्दरम् के आदर्श का खण्डन करता है और समाज मेँ असत्य का प्रचार करता है।महात्मा विदुर ने दो ही प्रकार के व्यक्तियोँ को मोक्ष का अधिकारी बताया था- योगसंयाससंयुक्तो,रणेश्चाभिमुखो हतः- या तो योगनिष्ठ संयासी या फिर वीरगति को प्राप्त योद्धा। गाँधी अगर संयासी होते तो हिमालय जाते और अगर योद्धा होते तो युद्धक्षेत्र मेँ जाते। गाँधी इन दोनोँ मेँ से कुछ भी नहीँ थे।उनमेँ पुरुषत्व का कोई भी लक्षण नहीँ था। उन्होँने अपनी पत्नी पर हाँथ उठाया और इस बात की बहादुरीपूर्वक चर्चा की। वे महात्मा नहीँ हो सकते। महात्मा का अपने इन्द्रियोँ पर नियन्त्रण होता है जबकि गाँधी अपने जीवन के उत्तरार्द्ध मेँ काम (सेक्स) की ही सर्वाधिक चर्चा किया करते थे।
नोआखाली दंगे का नेतृत्व करने वाले सुहरावर्दी को उन्होँने शहीद कह कर पुकारा।वंदेमातरम के विरोध पर मौन रहे।मोपला नरसंहार के विरुद्ध एक शब्द नहीँ बोला।भगतसिँह और राजगुरु की सार्वजनिक भर्त्सना की।नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को हतोत्साह

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