मनोज कुमार सिँह 'मयंक'

राष्ट्र, धर्म, संस्कृति पर कोई समझौता स्वीकार नही है। भारत माँ के विद्रोही को जीने का अधिकार नही है॥

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नारद गुरु

Posted On: 21 Mar, 2010 Others में

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अयोध्यामथुरामायाकाशीकाञ्चीह्यवन्तिका।पुरी द्वारवती चैव सप्तैता मोक्षदायिका॥ नारदगुरु मायावती पहुँच कर कुछ आशवस्त हो गये,शायद यहाँ पर कोई पंगा न हो।पर होता वही है,जो विधाता को मंजूर होता है।कहा भी गया है ,’अपनी सोची होत नहि, हरि सोची तत्काल।आये थे हरि भजन को ओटन लगे कपास॥’अब यह कपास ओटने की क्या कहानी है?कभी फुर्सत मेँ सुनाऊँगा।आगे चलते है,मायावती में आजकल कुंभ स्नान का महान उत्सव चल रहा है।सो,नारदगुरु की इच्छा हुई कि लगे हाँथोँ पुण्यसलिला मंदाकिनी की पावन धारा मेँ स्नान कर कुछ पुण्य ही क्योँ न संचित कर लिया जाय?लिहाजा नारदगुरु गंगा की ओर बढ़ने लगे।अभी वह गंगा की निर्मल धारा को निहार ही रहे थे कि भयंकर कोलाहल का स्वर सुनाई पड़ा,नारदगुरु ने गर्दन घुमा कर देखा तो दंग रह गये।उनकी नालिज के अनुसार आद्य शंकराचार्य ने भारत के चार कोनोँ मेँ चार पीठोँ की ही स्थापना की है।इस हिसाब से चार ही शंकराचार्य होने चाहिये।पर,यह क्या?यहाँ तो अमाँ!पाड़े में भी पाड़े कि तर्ज पर शंकराचार्योँ का हुजुम खत्म होने का नाम ही नहीँ ले रहा था। नारदगुरु के सामने से दनादन 36 शंकराचार्योँ,सैकड़ोँ महामंडलेश्वरों और हजारोँ पीठों के अधिपति गुजर रहे थे और वे कुछ इस स्टाइल से अपना गर्दन उचका-उचका कर देख रहे थे जैसा उन्होंनेँ माया स्वयंवर मेँ देखा था।बाप रे बाप, कहीँ फिर से कोइ जय,विजय न देख ले,नहि तो बड़ी भद्द हो जायेगी?नारदगुरु थोड़ा सँभले,लेकिन उनका दिमाग अभी भी घूम रहा था।आखिर उनसे रहा नहीँ गया और उन्होंने एक चित्र-विचित्र किस्म के नंग-धड़ंग रुद्राक्ष,त्रिशूल,जटा,भभूत और मोबाइलधारी साधु से पूछ ही लिया,’बाबा! इ का होत हौ?.फिर क्या था? उस विचित्र वेशधारी साधू ने आंखे तरेर कर अपने अद्भुत ज्योतिष ज्ञान का प्रदर्शन करते हुए कहा,’बच्चा!शायद तुम्हे पता नहीं है की प्रत्येक १२ वर्षों में गुरुदेव कुम्भ राशी में पदार्पण करते हैं,तब ग्रहों के विचित्र संयोग से कुम्भ महापर्व पवित्र भारत भूमि के चार महान स्थानों पर आयोजित होता है और… बस बाबा बस,समझ में आ गया|इससे पहले की वह साधू और कुछ बोल पाता नारदगुरु ने बीच में ही टोक दिया| नारदगुरु खिन्न हो गए और बिना स्नान किये ही वहां से खिसक लिए|इच्छा विचरण का वरदान प्राप्त नारद सोचने लगे की अब कहाँ चला जाय की तभी उनके मन में विचार आया की क्यों न तीनो लोकों से न्यारी काशी का भ्रमण किया जाय और देखा जाय की भूतभावन भगवान भोलेनाथ की नगरी इस घोर कलियुग में कैसी है?एक समय था जब वहां महाराज दिवोदास का शासन था और भगवान इन्द्र भी शासनतंत्र से स्पर्धा किया करते थे|अब तो लोकतंत्र है,स्थितियां पहले से भी अधिक सुन्दर हुई होंगी,नारद अभी इन्ही विचारों में खोये हुए थे की उनके शरीर की समस्त संहिता अणु-परमानुओं में परिणत हो गयी और उनका शरीर क्षण मात्र में काशी के मणिकर्णिका घाट पर आकार लेने लगा|जय हो जगदीश्वर की,तेरी महिमा अपरम्पार है प्रभु|जो सोचा,वह हो गया|जहाँ चाहा, वहां पहुंच गए|नारदगुरु आज अपने भाग्य पर फूलें नहीं समां रहे थे|

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