मनोज कुमार सिँह 'मयंक'

राष्ट्र, धर्म, संस्कृति पर कोई समझौता स्वीकार नही है। भारत माँ के विद्रोही को जीने का अधिकार नही है॥

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atharvavedamanoj


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आओ शिक्षामित्र, शिक्षामित्र खेलते हैं

Posted On: 8 Jul, 2015  
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मयंक कवि विरचित मोदी चालीसा

Posted On: 13 Apr, 2014  
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निर्वाचन चालीसा

Posted On: 9 Mar, 2014  
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Others कविता में

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तो कुछ और बात ही होती

Posted On: 28 Oct, 2013  
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Others Others कविता में

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उत्तर प्रदेश, बदतर प्रदेश

Posted On: 30 Aug, 2013  
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राष्ट्रवाणी बनाम आडवाणी

Posted On: 11 Jun, 2013  
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पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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बगरयो बसंत है

Posted On: 13 Feb, 2013  
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राष्ट्र धर्म पर जीवन वारो

Posted On: 12 Nov, 2012  
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युपीटीईटी : अंधेर नगरी, चौपट राजा

Posted On: 27 Jul, 2012  
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Others लोकल टिकेट में

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

БÂ´Ã‘€Ð°Ð²ÑÑ‚вÃ׃йÑ‚е,доктор у меня была операция 29.10.2008г. по удалению желчного пузыря, плюс ко всему у меня еще был панкриотит.Мне 30 лет. Диеты придерживаюсь строго!!! Но, приступы продолжаются.Что посоветуете делать?Заранее спссибо…

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279c237inna:936c1faЯ категорически против коверкания народных сказок. Не надо делать из них что-то ÐÂôÂ°Ã‘€Ð¼ÐµÐ»Ð°Ð´Ð½Ð¾-шоколамное, они учат детей жизни. Но стоит подбирать сказки адекватно, сообразно возрасту. Некоторые действительно «Ã‘‚яжеловаты» для маленьких детей, зато в 7-8 лет — самое то..19e1

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के द्वारा: Madan Mohan saxena Madan Mohan saxena

मुझे येह लगता हे की दुसरे धर्मों पे ऊँगली उठाने के बाद येह कहना की में धर्म के खिलाफ नही हुईं पर सिर्फ सच बता रहन हुईं येह अपने आप में सबसे बड़ा झूठ हैं और जिस तरह से उदहारण और आयते लिखे गए हैं और समझाए गायें हे उसके लिए एक बात कहूँगा जो संत कबीर ने कही थी के पोथी पड़े से कोई पंडित न बने . हम दुसरे के ऊपर ऊँगली उठाये उससे पहले आपने कमियों को दूर करे . पहले एक सच इंसान बने फिर किसीके पैरवी करे. हर धरम में गलत सही लोग होते हे जो इंसान के नाम पे कलंक होते हे जिन्हें सिर्फ एक वेहिशी दरिंदा कहा जा सकता हे इंसान नही बके गीता में बहोत कुछ कहा गया हे जिसमे येह भी कहा गया हे सब धर्म एक सा हे तो हम क्यों दुसरे धरम की बातें गलत हैं वो कह रहे हे और दूसरी बात अगर धरम में इतना गलत कहा गया होता तो आज कोई मुस्लिम और हिन्दू दोस्त नहीं होता . साथ रहता खाते नही तो बंद करो यह कहा वो कहा वो कहा और दम हे तो कुछ करके दिखावो समाज की कुरीतिय मिटावो बस सिर्फ तर्क वितर्क न करके समाज को रहने लायक बनावो और अगर एक भी कुरीतियों की खिलाफ आवाज उठाया हे या मिटाया हे तो सबको बतवो नहीतो सिर्फ बातें मातें करो और फिर येह मत कहो की ज्ञान बाँट रहा हूँ .

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भाई जलालुद्दीन जी.. आपके गवेषणापूर्ण टिप्पड़ी को पढ़ कर मन आनंदित हुआ...लगा की आज भी भ्रष्टाचार से संघर्ष करने वाले लोग हैं ..अन्यथा मैं तो यही समझे बैठा था की अन्ना हजारे भी लाख बुखारी की खिदमत कर लें|इस नामुराद भ्रष्टाचार का जिन्न पीछा ही नहीं छोड़ने वाला है...खैर झारखण्ड राज्य के सन्दर्भ में नियुक्तियां बिना टीईटी करवाए ही की गयी थी जो एनसीटीइ के प्रावधानों के विपरीत होने के कारण प्रथम दृष्टया ही अवैध है|जो अभ्यर्थी कोर्ट गए उनके पीछे विधि की शक्ति ही नहीं थी|उत्तर प्रदेश के संदर्भ में संजय मोहन के हवाले से भ्रष्टाचार किये जाने का जो भी आरोप लगाया जा रहा है वह पूर्णतया राजनीति प्रेरित है और यह बात जावेद उस्मानी द्वारा राज्य सरकार को प्रेषित रिपोर्ट का समाचार पत्रों के आलोक में पूर्णतया साफ़ नजर आता है|इस प्रक्रिया को कानूनी दाव पेंच में उलझाने का श्रेय भी एक खास राजनितिक दल को जाता है जो पूरे देश में MY (muslim+yadav) जैसे अपवित्र,राष्ट्रद्रोही और साम्प्रदायिक भावनाओं को उभारने वाली राजनीति करती है|आप मुस्लिम है इसलिए सपा समर्थक हैं ऐसा मैंने कभी नहीं कहा लेकिन मियां मुलायम और स्वयं आपका भी प्रकारांतर से यही मानना है|अब इसमें मैं क्या कर सकता हूँ|जागरण मुझे पसंद नहीं करता इसलिए मैं अब जागरण पर नियमित नहीं लिखता|देर से नजर पड़ी अतः देर से प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए खेद है|युपीटीईटी के पीछे विधि का मजबूत आधार है या फिर दुसरे शब्दों में अंगद का पाँव है टस से मस नहीं होगा ---बाधाएं चाहे जितनी आये --अंतिम विजय हमारी होगी और वह सब पर भारी होगी|क्योंकि राम नाम सत्य है

के द्वारा: atharvavedamanoj atharvavedamanoj

वैसे तो हम भ्रष्टाचार से लड़ने की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं,पर जब भ्रष्टाचार पर लगाम कसने की बारी आती है तो हम अपना नुकसान-फायदा देखने लगते हैं.यही वजह है कि देश में भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिल रहा है.आप भी वही कर रहे हैं.यदि किसी चयन प्रक्रिया में भ्रष्टाचार हुआ है तो उस चयन प्रक्रिया का रद्द होना तय है.इसके लिए सपा सरकार को दोषी ठहराना किसी भी तरह उचित नहीं है.यदि मायावती की सरकार होती तो वह भी भ्रष्टाचार का आरोप लगने के बाद इस चयन प्रक्रिया को किसी कीमत पर नहीं बचा पाती.हालाँकि सपा सरकार टी.ई.टी.को रद्द होने से बचने का प्रयास कर रही है.जावेद उस्मानी साहब का सुझाव इसी के मद्देनज़र है कि टी.ई.टी.में प्राप्त अंकों के आधार पर भर्ती न किया जाये.अब शायद आप यह कहेंगे की मुसलमान होने की वजह से मैं सपा का पक्ष ले रहा हूँ.जी नहीं यह बात कहने का मेरे पास आधार है,आप भी गौर से देखिये और पढ़िए- नई दिल्ली [जागरण ब्यूरो]। सुप्रीम कोर्ट ने प्राथमिक शिक्षक भर्ती प्रक्रिया रद करने के झारखंड हाई कोर्ट के आदेश पर अपनी मुहर लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया। याचिका भर्ती प्रक्रिया में चयनित अभ्यर्थियों ने दायर की थी। झारखंड हाई कोर्ट ने 22 नवंबर, 2011 को प्राथमिक शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया अनियमितताओं के आधार पर निरस्त कर दिया था। राज्य सरकार ने 26 मार्च, 2011 को करीब 18 हजार प्राथमिक शिक्षकों की भर्ती का विज्ञापन निकाला था। इसमें करीब 4000 उर्दू शिक्षकों की भर्ती होनी थी। राज्य सरकार द्वारा कराई गई भर्ती परीक्षा में सिर्फ 8500 अथ्यर्थी सफल घोषित हुए थे। विफल अभ्यर्थियों ने भर्ती प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए इसे निरस्त करने की मांग की थी। एक जनहित याचिका में भी भर्ती प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए थे। हाई कोर्ट ने याचिकाएं स्वीकार करते हुए भर्ती प्रक्रिया निरस्त कर दी थी और राज्य सरकार को नए सिरे से भर्ती करने का निर्देश दिया था। भर्ती परीक्षा में सफल रहे 30 अभ्यर्थियों ने हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। सोमवार को चयनित अभ्यर्थियों की ओर से वकील पीपी राव व विक्रम पत्रलेख ने हाई कोर्ट के आदेश का विरोध करते हुए कहा कि याचिकाकर्ताओं ने परीक्षा पास की है। नियुक्ति निरस्त करने का आदेश गलत है। लेकिन न्यायमूर्ति एचएल दत्तू व न्यायमूर्ति सीके प्रसाद की पीठ ने सारी दलीलों को ठुकराते हुए याचिका खारिज कर दी। पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता नई भर्ती प्रक्रिया में भाग ले सकते हैं। जागरण.कॉम पर यह खबर 15 मार्च को थी.यही नहीं एक और भर्ती परीक्षा में धांधली हुई थी.उसे रद्द करके दूसरा इम्तहान हुआ.पहली परीक्षा में चयनित अभ्यर्थी अदालत की शरण में गए.हाई कोर्ट में उस समय माननीय न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू थे उन्होंने पहली भर्ती परीक्षा को रद्द करने के सरकार के फैसले को उचित ठहराया.पहली परीक्षा में सफल अभ्यर्थी मामले को सुप्रीम कोर्ट ले गए.इस मुक़दमें का अंतिम फैसला 15 वर्षों में आया और सुप्रीम कोर्ट ने भी हाई कोर्ट के फैसले पर मोहर लगा दिया.तो समझ लीजिये कि जहाँ भ्रष्टाचार हुआ है वहां सुप्रीम कोर्ट भी आपसे सहानुभूति नहीं कर सकता.बहरहाल मैं इस विषय पर सरकार को कुछ सुझाव देना चाहता हूँ.जो शीघ्र आपके समक्ष होगा.आशा है मेरी बात अन्यथा नहीं लेंगे.वरना हम तो पहले से बदनाम हैं और हो जायेंगे.

के द्वारा: jalaluddinkhan jalaluddinkhan

एक तरफ आप पूर्व में हुए भ्रष्टाचार के कारण प्रतिभाशाली उपाधि धारकों के चयन से वंचित होने का रोना रो रहे हैं तो दूसरी तरफ चाहते हैं कि टी.ई.टी.पर धांधली का आरोप लगने के बाद भी सरकार आँख बंद करके चयन प्रक्रिया जारी रखे.यह सच है कि टी.ई.टी.उत्तीर्ण अभ्यर्थियों में कुछ हज़ार ही धांधली के रास्ते से आये होंगे,लेकिन उनकी पहचान कैसे की जा सकती है,इसका कोई प्रभावी तरीका नज़र नहीं आता है.यदि चयन प्रक्रिया जारी रहती है तो इन्हें रोकना संभव नहीं है.ज़ाहिर है यदि इनका चयन होता है तो इसकी कीमत कम अंक पाने वाले सफल उम्मीदवारों को चुकानी पड़ेगी और अपात्र लोग मौज मस्ती करेंगे.ऐसे लोगों को रोकने का एक ही रास्ता यह है कि टी.ई.टी.उत्तीर्ण अभ्यर्थियों को बी.एड.उपाधि प्राप्त करने के साल की वरिष्ठता के अनुसार चयन किया जाये.इस तरह धांधली करने वालों के इरादे पर कुछ हद तक पानी फेरा जा सकता है.

के द्वारा: jalaluddinkhan jalaluddinkhan

प्रिय चातक भाई, सादर वन्देमातरम| पता नहीं क्यों इस मंच पर प्रतिक्रियाओं के सन्दर्भ में मुझे बड़ी परेशानी का सामना करना पड़ता है,अधिकांशतः प्रतिक्रियाएं खो जाया करती हैं|मित्र,लाठी,गोली और दमन से राष्ट्रवादियों का प्रारम्भ से ही साबका पड़ता रहा है और जितनी ही बार हमने लाठियाँ खायी हैं हम उतने ही मजबूत होकर उभरे हैं|अब तो इस तरह की लाठियां फूल से अधिक कुछ नहीं लगती|हमें गर्व है की लखनऊ की सड़कों पर अभिषेक ने हम बेरोजगारों का जलाभिषेक किया और लाठियों से स्वागत भी|हम प्रसन्न है और इस बार बीस हजार तो अगली बार ५० हजार की तर्ज पर बढते ही जायेंगे| जिन लोगों को अभी भी दिवास्वप्नों ने घेर रखा हो वे कम से कम इतना तो समझदारी दिखाएँ ही की बांस की कोठी में आम की फसल नहीं लगती और सांप का बच्चा संपोला ही होता है जब बाप मुलायम है तो बेटा कठोर कैसे हो सकता है!...इस बात से मैं पूरी तरह सहमत हूँ|जय भारत, जय भारती|

के द्वारा: atharvavedamanoj atharvavedamanoj

स्नेही मयंक जी, सर्वप्रथम तो राष्ट्रवाद की देह पर तथाकथित समाजवाद की लाठी खाने पर आपको मैं हार्दिक बधाई देता हूँ| शिक्षक सिर्फ जरियाने और लतियाने की चीज़ रह गए हैं इसे हर वह व्यक्ति जानता है जो गलती से शिक्षक बन गया है| महिलाओं को समाजवादी विचारधारा ने पहले ही रोजगार देने के लिए नायब तरीका बता रखा है (बलात्कार करवाओ नौकरी पाओ) नाहक वे धरना प्रदर्शन में चली गईं| वैसे गलती आप लोगों की भी कम नहीं है यदि आप लोग महिलाओं की सुरक्षा की चिंता में साथ न होते तो पुलिस वाले कुछ महिलाओं की नौकरी तो पक्की करवा ही देते (यू.पी. पुलिस को तो इसमें विशेष योग्यता हासिल है)| जिन लोगों को अभी भी दिवास्वप्नों ने घेर रखा हो वे कम से कम इतना तो समझदारी दिखाएँ ही की बांस की कोठी में आम की फसल नहीं लगती और सांप का बच्चा संपोला ही होता है जब बाप मुलायम है तो बेटा कठोर कैसे हो सकता है! आपके साहस के लिए एक बार फिर आपको हार्दिक बधाई! वन्देमातरम!

के द्वारा: chaatak chaatak

प्रिय संतोष भाई... पहले तो पंचनद की उस पवित्र भूमि को नमन जहाँ आप रहते हैं तत्पश्चात आपकी प्रतिक्रिया को मैं अभी तक संबोधित नहीं कर पाया..इसका मुझे खेद है|मैं यदि इस अग्नि को प्रसारित करने में थोडा भी योगदान दे पाया तो जीवन को धन्य समझूंगा...मुझे उस दिन की बड़ी तत्परता से प्रतीक्षा है जब पुरे भारतवर्ष में स्वार्थ नहीं परमार्थ की मखशाळा प्रदीप्त होगी|कोटि कोटि कंठों में "ओम् राष्ट्राय स्वाहा...इदं राष्ट्राय..इदं न मम" के मन्त्र एक स्वर में गूंजेगे और और प्रत्येक आहुतियाँ हुत होने के लिए व्यग्रतापूर्वक अपने अपने क्रम की प्रतीक्षा करेंगी|मुझे लगता है इस तरह के धुएं से हमारा देश एक बार फिर अनंतकाल के लिए पवित्र हो जाएगा|आपसे मेल के मार्फ़त शीघ्र ही संपर्क करूँगा....जय भारत, जय भारती|

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आदरणीय बड़े भ्राता| सादर वंदे मातरम| आपने इतना कुछ कह दिया है की अब मैं क्या कहूँ?देश की तो छोडिये मुगलसराय, रामनगर और बनारस (जिसकी माटी की सोंधी सोंधी खुशबू में आज भी शास्त्री जी की स्मृतियाँ शेष है) भी शास्त्री जी को श्रद्धांजलि देने के मामले में दो कदम पीछे ही रहा...एक पुरुष के काल्पनिक आभामंडल से शेष सबही महापुरुषों को उदरस्थ कर लिया है भाई|भगत सिंह सरीखे तो आतंकवादी हो गए हैं न बड़े भाई|अब तो नरसी मेहता को भी कोई नहीं पूछता जिनके ''वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीर पराई जाणे रे'' नामक भजन ने आतंकवादियों को भी उसी तरह की प्रेरणा दी थी जैसी की धीवादियों को|अब यह तो movie on demand है|पैसा pay कीजिये और तमाशा देखिये|पाकिस्तान ही क्या भाई जिस चीनी को हिन्दुस्तानी बड़े चाव से खा जाते थे..शर्बत बना कर पी जाते थे, वह चीनी भी पंचशील के मानवीकरण अलंकार से अलंकृत होकर बड़े मजे से हिंदुस्तानियों को चूस रहा है|शेष का इन्तजार रहेगा|आप गूगल टॉक पर क्यों नहीं आ रहे हैं बड़े भैया?आप से बात किये बिना कुछ अच्छा ही नहीं लगता|जय भारत, जय भारती|

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प्रिय राजकमल भाई, सादर वंदे मातरम| आपकी उक्त प्रतिक्रिया ने एक प्रेरक का काम किया है|सहवास नामक व्याधि पर लिखे जा रहे मेरे लेख में आपकी इस चिंता का समाधान करने का प्रयास करूँगा|परिवर्तन प्रकृति का नियम है और यह इतनी तीव्र गति से परिवर्तित होती है की बड़े बड़े विद्वानों की बुद्धि चकरा जाती|भला यह कोई कल्पना कर सकता है की भोग की पीठिका पर स्वामी विवेकानंद का अद्वैत वेदांत भी कभी गूँज सकेगा|इसमें कोई भी आश्चर्य नहीं की जब पश्चिमी संस्कृति द्रुत गति से हमारा अनुगमन करना चाह रही है...हम उससे भी तीव्र गति से पश्चिम की ओर भाग रहे हैं|मुझे आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास है की चक्र फिर घूमेगा लेकिन शायद तब हमारे पास हाँथ मलने के सिवा कुछ न् रह जाए|प्रतिक्रिया का आभार...जय भारत, जय भारती|

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सराहनीय विश्लेषण मनोज जी … बधाई ! 'लिव इन रिलेशनशिप' शब्द से यह भी प्रतीत होता है कि ऐसा जीवन संकीर्ण रिश्ते के अन्दर घुस कर ही जिया जा सकता है, छाती ठोंककर समाज के अन्दर घुसकर नहीं । छाती ठोंकें भी तो कैसे, ऐसे रिश्ते सिर्फ़ कायर बनाया करते हैं, जो बाई नेचर पलायनवादी होते हैं, खाया-पिया, बारह आने का गिलास तोड़ा, और चल दिये । इसमें के दोनों लिंगी बेईमान तवीयत के होते हैं, क्षणिक काम-पिपासा के मारे । जहां सचमुच के भावनात्मक संबन्ध होते हैं, उन्होंने किसी की भी परवाह न करते हुए दूसरा विवाह तक छाती ठोंक कर कर डाला, और समाज को मान्यता भी देनी पड़ी । धर्मेंद्र-हेमा के विवाह जैसे हज़ारों उदाहरण पौराणिक काल से लेकर आज तलक चले आ रहे हैं । कानून ने मात्र मानवीय आधार पर इस रिश्ते को मान्यता दी है, अन्यथा ऐसी मान्यता कहीं से तर्क़संगत नहीं है ।

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प्रिय संतोष भाई, सादर वंदे मातरम| अमीर खुसरो साहब की यह गजल बड़ी ही अर्थपूर्ण है...इसमें अपने महबूब से फरियाद की गयी है की ये मेरे महबूब (ईश्वर) मुझ गरीब मिसकीन की हालत से यूँ बेखबर न रहो|हे महबूब! कभी आँखे मिलाते हो, कभी आँखे चुराते हो और बाते बनाते हो|जुदाई की रातें तुम्हारी काली जुल्फों की तरह लंबी और घनी हैं और मिलने के दिन उम्र की तरह छोटे|ये मेरे रब!तू मुझे छाती से क्यों नहीं लगा लेता| इसमें उलाहना भी है मित्र...ठीक उसी तरह की उलाहना जिस तरह की उलाहना महामाया भैरवी से की गयी है...इन शब्दों में....बैल बुढ़ान की सिंह हेरान की गोद लिए हर को फिरती हो? मोहिं पुकारत देर भई..जगदम्ब बिलम्ब कहाँ करती हो? खेद का विषय है की कुछ अनर्गल लोगों ने उच्चस्तरीय साहित्य का सस्ता अर्थ प्रस्तुत कर लोगों को भ्रमित कर रखा है|आपकी प्रतिक्रिया का आभार...जय भारत, जय भारती|

के द्वारा: atharvavedamanoj atharvavedamanoj

प्रिय मनोज जी, सादर वन्देमातरम, लिव-इन-रिलेशन शब्द का जन्म उन कोठरियों में हुआ है जिसमे कुत्सित वासना को मिटाने के लिए न जाने कितने मासूम का बलात्कार हुआ और हर बार बलात्कारी जो कि नेहरू सा विद्वान् और जिन्ना सा सदाचारी था यही तिकड़म लड़ाता रहा कि कभी इन गुनाहों का अदालत में सामना करना ही पड़े तो दंड संहिता में वह कौन सा छेद कर दूं जिससे साफ़ निकल जाऊं और हमेशा के लिए कल्याणकारी भी बना रहूँ| इसी चिंतन का मूर्तमान रूप है| अभी तो इस क़ानून का पूरा इस्तेमाल भी लोग नहीं सीख पाए हैं और लिव-इन-रिलेशन के खरबूजे काटने शुरू हो गयें हैं अब चाहे जो चाहे जिस पर गिरे कोई चिता नहीं खरबूजे कटते रहेंगे और यदि छुरी के पास धन रुपी भारी मुठिया है (जो कि उपरोक्त विद्वान बलात्कारी के पास थी) तो काटने के बाद हर खरबूजा अदालत में चीख-चीख कर कहेगा, "न जी ये मुझपर न गिरा था (बलात्कार नहीं हुआ) मैं खुद इस पर गिरी थी (मैं सहमती से रिलेशन में थी)| अब छुरी भी जायज और खरबूजा भी| जय हो!

के द्वारा: chaatak chaatak

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

मनोज जी, नमस्कार! आपके द्वारा वर्णित अवांछनीय सम्बन्ध की पराकाष्ठा पर विश्लेषित है, जिसका भयंकर परिणाम दिखने लगा है. इसका अंत आत्महत्या का रूप लेने के बाद और कहाँ जायेगा अनुमान लगाना कठिन न होगा. पर पानी की धार जैसी नवयुवकों की परमाण्विक सोंच को हम और आप चाहकर भी रोक पाएंगे क्या? समय परिवर्तनशील है और डार्विन के सिद्धांत के अनुसार कुछ चीजें अपने आप बदलती हैं या जन्म लेती है. आप तो पुरानों और भारतीय संस्कृति में आस्था रखने वाले, प्रलय के बारे में भली भांति जानते हैं, तो हम क्यों न उस दिन का इन्तजार करें, क्योंकि ' जब जब होंही धरम की हानी ---------' मेरे ख्याल से -- काफी लम्बा हो गया! एकबार पुन: आभार क्रांतिकारी लेखन के लिए.- जवाहर.

के द्वारा:

प्रिय सईद भाई, वंदे मातरम| आपकी स्नेहमयी प्रतिक्रिया से ह्रदय प्रफुल्लित हो गया और जहां तक मुझे लगता है की मात्र आप ही नहीं बल्कि कोई भी राष्ट्रवादी मुसलमान इस सरकार के घृणित कार्यों को कभी भी जायज नहीं ठहरा सकता लेकिन यह बात इस सरकार के शीर्षस्थ नेताओं को पता चले तब तो|उन्हें लगता है की स्वामी रामदेव पर लाठी बरसा कर वे हिन्स्तान के १५ करोड़ मुस्लिम अवाम को अपने हक में कर लेंगे और जरूरत पड़ी तो किसी मौलाना को कांग्रेस के साथ जोड़ कर अल्पसंख्यकों की बुनियादी समस्याओं पर पर्दा डाल सकेंगे|भाई उन्होंने स्वामी रामदेव के समर्थकों पर लाठी तो इसी उद्देश्य से चलाई थी, यह बात दीगर है की कोई भी मजहबी मुसलमान उनके इस कार्य का कभी समर्थन नहीं करेगा|आपने भी इस विषय पर लिखने का मन बनाया था यह जानकार अतीव प्रसन्नता हुई|मैं चाहूँगा की आप इस विषय पर इसी शीर्षक से फिर लिखें|हो सकता है कालनेमि के मार्ग पर चल रही इस सरकार को सद्बुद्धि आये और वह अपने ही नागरिकों को प्रताडित करने से बाज आये|आपकी ख़ूबसूरत प्रतिक्रिया का एक बार फिर शुक्रिया|जय हिंद|

के द्वारा: atharvavedamanoj atharvavedamanoj

आदरणीय मनोज जी , सादर नमस्कार ! सत्यता को दर्शाती बहुत सुन्दर भावाभ्यक्ति, बधाई .......| आपने मेरे ब्लॉग पर अपना बहुमूल्य समय दिया आपका धन्यवाद ! सर्वप्रथम आपका मेरे ब्लॉग पर स्वागत है, वैसे तो मैं प्राकृतिक चिकित्सक हूँ परन्तु लाफिंग थेरेपी भी ड्रगलेस थेरापी है इसलिए इसे भी प्राकृतिक चिकित्सा में शामिल कर लेते हैं | परन्तु इस रचना के विषय में एक राज की बात आपको बताऊँ --- यह मेरी आपबीती घटना है, जो मेरे साथ लगभग १० वर्ष पहले घटित हुयी थी | आप शादीशुदा होने के बाबजूद खुलकर हंस लिए, मेरा परिश्रम सार्थक हो गया | प्राकृतिक चिकित्सा में यदि आपकी रूचि है तो मेरे दूसरे ब्लॉग - http://naturecure.jagranjunction.com विजिट कर सकते हैं | समय देने के लिए आपका पुनः बहुत-बहुत आभार !

के द्वारा: Dr.KAILASH DWIVEDI Dr.KAILASH DWIVEDI

प्रिय अनुज शुभरात्री ,,यार क्यों उकसा रहे हो ,किसी हरामी को क्यों मरवा रहे हो ,,ओह च च आज गांधी जयंती है भूल गया था पर मेरा धर्म तो सनातनपंथी है ,आना जाना तो लगा ही रहता है ,कब्र का पत्थर क्या हमेशा खड़ा रहता है,क्या किसी ने लाल बहादुर को याद किया ,जिसकी खुश्बू ने इस गुलशन को आबाद किया ,जिसने हाथ उठाते ही तमाचा जड़ दिया बदले में मोहतरमा ने देश को केक बनाकर दे किया ,भाई पाकिस्तान बड़े प्यार से खा रहा है ,और डाईबटीज इधर फैला रहा है ,भाई लोग मर रहे हैं फिर भी अफजल को भज रहे हैं भाई उसके तो बड़े ठाठ हैं और इधर बत्तीस में आबाद हैं देश में घमाशान है आदमी परेशान है लेकिन क्या गम है अम्मा जो आ गयी हैं बापू की समाधि पर फूल चढ़ा गयी हैं अरवी बोला अब सब ठीक हो जायेंगे दोनों बाबू मोशाय कॉर्निश बजा जायेंगे ....... भाई बाकी अगली रचना पर .....जय भारत

के द्वारा:

प्रिय मनोज भाई, बेशक यह सरकार पैसे के लालच में अंधी हो गयी है....इसे सच्चे और सीधे लोग नहीं भाते...यह हर ऐसे आन्दोलन को ख़त्म कर देना चाहती है जो ...इनके भ्रष्ट चेहरे को उजागर करता हुआ हो... यह शर्न्म्नाक है इस देश के लिए की कसब जैसे राक्षसों के लिए बिरयानी की व्यवस्था कर रही है सरकार...और साधू सन्यासियों पे लाठी चार्ज... ये असुरों की प्रविर्ती वाली बात है.... बेशक चार जून को को ऐसी घटना हुयी जिसके सामने जनरल डायर भी शर्मा जाए...वोह खबर को सुनकर मेरे मन में एक लेख 'आज का जनरल डायर' शीर्षक से लिखने का विचार आया था जो किसी कारणवश नहीं लिख सका था.. लेकिन वह कमी आप ने यहाँ पूरी कर दी... सिर्फ एक बात जिससे मई सहमत नहीं हूँ वह यह है की यह लाठी चार्ज मुसलमानों का वोट हासिल करने के लिए की गयी...मेरे विचार में यह सिर्फ अपने भ्रष्ट चेहरों को छिपाने के लिए... और सच्चाई को दबाने के लिए की गयी कार्यवाही थी.... बेहतरीन लेख के लिए बधाई के पात्र हैं... http://syeds.jagranjunction.com

के द्वारा: syeds syeds

आदरणीय जवाहर जी, सादर वंदे मातरम| फेविकोल का मजबूत जोड़ हो या फेविकुइक का मुझे तो लगता है की पहले ही चुनाव में मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन करने वाली इस सरकार का अपवित्र जोड़ टूटने वाला ही नहीं है|बिल्ली (सत्ता पक्ष) के गले में बिल्ली (माननीय अन्ना हजारे) ही घंटी बाँधने का असफल प्रयास कर चुकी है अबकी बार कुछ और प्रबंध करना होगा|भाजपा से भी तो कोई विशेष लाभ होता नहीं दिखता|मुझे तो लगता है राजनाथ सिंह जैसे आधारविहीन नेता इसको पूरी तरह लीप कर ही मानेंगे|शायद इसीलिए परम पूज्य डॉक्टर साहब संघ के राजनैतिक क्षेत्र में प्रवेश के विरुद्ध थे|अब तो इन महोदय ने संघ के कुछ नेताओं को भी पता नहीं कौन सी घुट्टी पिला दी है जो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को भी ''त्वदीयाय कार्याय बद्धा: कटीयं'' छोड़कर बाबा नाम ही केवलम में ही पूर्ण विश्वास हो चला है| आपकी स्नेहमयी प्रतिक्रिया को सादर नमन...जय भारत, जय भारती|

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आदरणीय AKRaktle जी, सादर वंदे मातरम| निःसंदेह जनता द्वारा चुनी गयी यह सरकार जनता का विश्वास खो चुकी है वैसे भी कुछेक मतों के हेर फेर से सरकार बना देना और चलती हुई सरकार को फोड कर बीच में ही गिरा देना कांग्रेसियों की पुरानी आदत है|"पट्टाभिसीतारमैया की हार मेरी हार है'' कह कर कांग्रेसी भावनाओं का शोषण करना भी खूब जानते हैं|तिहाड तो एक ऐसा वी आई पी जेल हो गया है की बस पूछिए मत, भला जिस जेल में खरबपति कैदी हो उस जेल में जाने का किसका मन नहीं करेगा? मुझे भी लगता है की सारे माननीय अब वहीँ रेस्ट करने का प्रोग्राम बना रहे है हो सकता है कल को संसद भवन ही स्थानान्तरित करना पड़े|आलेख पर आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया को कोटिशः नमन ...जय भारत, जय भारती|

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प्रिय संतोष भाई सादर वन्देमातरम| इटली माता ने जिस दिन यह घोषणा की थी की मैं भारतीय राजनीति में भाग लेने की अपेक्षा इटली की सड़कों पर भीख मांगना अधिक पसन्द करुँगी मुझे उसी दिन ऐसा लग गया था की अब भारत की खैर नहीं है, फिर सीताराम केशरी को जिस तरह से हटाया गया|पुराने क्षत्रप पी ए संगमा और माधव राव सिंधिया को जिस तरह ठिकाने लगाया गया|शरद पवार के राष्ट्रवादी कांग्रेस की हवा निकाली गयी और चुन चुन कर सोनिया के प्रशंसको को कभी सीधे राजनैतिक तो कभी विभिन्न दवाब समूहों में नियुक्त किया गयाउससे यह पूरा विश्वास हो गया की अब शीघ्र हो केन्द्रीय सत्ता का सोनियाकरण होने जा रहा है और यही हुआ भी|आपकी प्रतिक्रिया का कोटिशः आभार ...जय भारत, जय भारती|

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आदरणीय अग्रज, सादर वन्देमातरम, वाह मजा आ गया बड़े भैया|फेसबुक पर आपकी व्यंय रचना ये मुर्ग ये मुसल्लम भी पढ़ी|हँसते हँसते लोट पोट हो गया|कहाँ से लाते हैं भाई?................ एक ने चीन के युद्ध के समय पंचशील अपनाया साला ऐसी कम्पनी को आर्डर दिया कि माल अभी तक बन के नही आया|एकदम तगड़ा प्रहार किया है भाई और तब से अब तक ऑर्डर पर आर्डर दिए जा रहे है लेकिन माल है की कमबख्त बन के आने का नाम ही नहीं ले रहा है|वैसे हम भारतीय होते बड़े संतोषी है अभी तक यह उम्मीद लगाये बैठे हैं की आज नहीं तो कल..इस जनम में नहीं तो अगले जन्म में, धरती में नहीं तो स्वर्ग अथवा नरक में कहीं न कहीं लोकपाल भी बनेगा, काला धन भी वापस आएगा और हो सकता है माल के साथ मालदार भी मिल जाय| शंकराचार्य ने लिखा भी है न .....अंगम गलितं, पलितं मुंड, दशन विहीन जातं तुंड ....तदपि न मुन्च्त्याशा पिण्डं ....आशा जाय नाहीं तन स्वासा|जय भारत, जय भारती|

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प्रिय श्री राजकमल भाई सादर वन्देमातरम, मैंने कहीं पढ़ा था की महान पुरुषों की दो ही गति होती है, जंगल में खिले पुष्प की भाँती या तो वे वनदुर्गा के मस्तक पर विराजते हैं अथवा यूँ ही सूख कर समाप्त हो जाते हैं|हमारे देश का राष्ट्रीय आन्दोलन इसका साक्षी है|पता नहीं कितनी अज्ञात हुतात्माओं ने स्वातंत्र्य यग्य में अपनी आहुति किन्तु पूजन के अधिकारी चंद व्यापारी ही बने|आज की स्थिति और परतंत्र भारत की स्थिति में मुझे कोई विशेष अंतर नहीं लगता|सब कुछ तो वैसे ही चल रहा है, बल्कि और बदतर रूप में|काले अंग्रेजों ने मैकाले की उपासना में कोई कोर कसार बाकी नहीं रखी है|आपका आदेश सर माथे पर ...ज्योंही कुछ समय मिला मैं शहीद संत निगमानन्द पर भी लिखूंगा|जय भारत, जय भारती|

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आदरणीय मनोज भाई ,.वन्देमातरम .... माता ने बड़ी समझदारी से पहले कांग्रेस पर कब्ज़ा किया ,...फिर भाड़े पर मोहन प्यारे को लेकर देश पर ,...अब बाबा रामदेव से खतरा लग रहा है तो,..उनको निपटाने के लिए पूरा जोर लगा दिया ,..सत्ता, चर्च,..चमचों ,...मिडिया ,....सबकी ताकत साथ होते हुए भी उनको हार साफ़ दिखने लगी है ,..तो अब शायद अवैध रूप से बनी NAC के द्वारा उन गरीबों को रिझाने का प्रयास करेंगे ,..जिनकी गरीबी का सबसे बड़ा कारण नेहरू खानदान ही है ,......तुष्टिकरण तो उनका सबसे गन्दा हथियार है ही ,...आम जनता मूरख है ,.. भूखा थाली में सड़े गेंहू की रोटी पाकर खुश हो जाता है ,...फिर सत्ता का हाथ चाहे धीरे धीरे उसके गले पर फंदा कस ही रहा हो ,... अत्यंत प्रखर सार्थक आलेख ,....हार्दिक साधुवाद जय भारत ,जय भारती

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

अनुज सुप्रभात ,,,,भारतीय मीडिया मौन है राहुल को भी चैन है मनमोहन मुस्कुरा रहे हैं काश फिर ऐसा करने का सुअवसर प्राप्त हो यही मना रहे हैं ,,यार अल्पसंख्यकों का वोट तो हाथ आयेगा राजबाला का खून रंग तो लाएगा ,,उनको तो बस अल्पसंख्यक ही भा रहे हैं ,यार लोग उन्हें अपना दामाद बना रहे हैं मोदी तो देश द्रोही है कांग्रेश ही खालिश दूध से धुली है कमीनेपन की भी हद होती है शैतान की भी एक सरहद होती है लेकिन यहाँ तो बेलगाम घोड़े हैं शुरू से आखिर तक कातिल और लुटेरे हैं एक ने चीन के युद्ध के समय पंचशील अपनाया साला ऐसी कम्पनी को आर्डर दिया कि माल अभी तक बन के नही आया भाई देश अपना तिनसुखिया मेल बन गया है अम्मा जी खिंचवा रही हैं और यह चल रहा है दिग्गी के बोल और चिदम्बरम के होल प्रणव का अंदाज और मनाने का अनोखा रिवाज वाह वाह यही तो बहुरंगी भारत है एक ने कहा जनता में दस पैसा पंहुचता है पर नब्बे तो आखिर उसको ही मिलता है अब स्विस बैंक वाले रो रहे हैं अपने आसुवों से रामदेव को भिगो रहे हैं बेचारों का पन्द्रह प्रतिसत खत्म हो गया वह तो अम्मा जी के बेनामी बांड में जज्ब हो गया अब रामदेव क्या ख़ाक पायेंगे अधिक हो हल्ला मचाएंगे तो भाग जायेंगे इटली थोड़े ही बताएगा यह तो उसके सगे वाले हैं इनको पालने में बैठाएगा................जय भारत

के द्वारा:

प्रिय मनोज भाई ....वन्दे मातरम ! हम तो हमेशा से ही सुनते आये है की परीक्षा में 33 नम्बर वाला पास होता है लेकिन आज पता लगा की 32 रूपये पाने वाला गरीबी की रेखा से उपर होता है अरे कम्बख्तो एक रुपया काहे को कम रख दिया 32 की बजाय 33 की सीमा रेखा बना देते तो तुम्हारे बाप का क्या चला जाता ?…. सच ही कहा है की पढ़ाई में और वास्तविक जीवन में अंतर होत है …. **************************************************************************************************** आपसे यह उम्मीद है की कभी आप स्वामी निगमानंद (शहीद ) जी पर भी चंद शब्द लिख कर अगर बताए तो मुझको बहुत ही खुशी होगी ..... क्योंकि उन पर नाममात्र ही लिखा गया है -क्योंकि उनकी शाहदत को जागरण ने अपना साप्ताहिक टापिक नहीं बनाया था ..... इस देश में से भ्रष्टाचार रूपी रावण का समूल नाश हो तभी आदरणीय राजबाला जी की आत्मा को शांति मिल पायेगी ...... जय भारत जय हो माता जगत जननी जी की :) :( ;) :o 8-) :| http://rajkamal.jagranjunction.com/2011/09/30/“आदरणीय-निशा-मित्तल-–-दा-ल/

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

प्रिय अनुज सुप्रभात ,, प्रथम माँ दुर्गा को समर्पित ,,,,नमस्ते शरण्ये शिवे ,सानुक्म्ये ,न्मस्त्ये जगत व्यापिके विश्वरूपे ,,न्मस्त्ये जगद्वन्द पादारविन्दे ,नम्स्त्ये जगत्तारिणी त्राहि दुर्गे ,,नमस्ते जगन्चित्य्मान स्वरूपे नम्स्त्ये म्हायोगिनी ज्ञान रूपे,,नमस्ते नमस्ते स्दानन्दरूपे ,नमस्ते जगत्तारिणी त्राहि दुर्गे ,,सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके ,शरण्ये त्रयम्बिके गौरी नारायणी नमोस्तुते ,ब्रम्हरूपे सदानन्दे परमानन्द स्वरूपिणी ,दूत सिद्धिप्रदे देवि नारायणी नमोस्तुते ,शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणी नमोस्तुते ,,,सिह्स्था शशिशेखरा मर्कात्प्रख्येश्चतुभिर्भुर्जेः शंखं चक्रधनुः शरांश्च दधती नेत्रेसित्रिभिः शोभिता ,,, सुस्वागतम ,,,ना दैन्यं ना पलायनम .............................................................जय भारत

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अहह, प्रेम शाश्वत, सुन्दर है – सत्य, सनातन धारा है – किन्तु हमारी चिंतन पद्यति को पछुवा ने मारा है| विकल रागिनी जब प्राणों में – बजती, स्वर्ग दहल जाता| निष्ठा और श्रद्धा की गर्मी से पाषाण पिघल जाता| यह तो जिनका ह्रदय सरस है और चेतना बाकी है| जिनको अपने से भी बढ़कर – गैरों की आजादी है| कण-कण में जिनको शिव शंकर, अणु अणु में जिनको भगवान| उन्हें प्रेम की सुधा मिलेगी, उन्हें प्रेम की है पहचान| खड्ग बनाकर प्रेम उतारो, गर्दन झुकने को तैयार| किन्तु प्रेम से तुम्हे शत्रुता, बचो, कर रहा हूँ मैं वार| आदरणीय वाजपेयी जी....सादर चरण स्पर्श| माँ भारती को समर्पित आपकी बेहतरीन काव्यात्मक प्रतिक्रिया का कोटिशः आभार, जय भारत, जय भारती|

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के द्वारा: Arunesh Mishra Arunesh Mishra

आदरणीय अलका जी.. सादर प्रणाम| अवश्य ही नारी का भारतीय संस्कृति में गौरवमय स्थान है और होना ही चाहिए|नारी न सिर्फ नर की जननी है बल्कि उसकी संरक्षिका भी है|एक पुरुष के रोम रोम पर स्त्री के अनंत ऋण हैं|स्त्री ने न सिर्फ पुरुष को आकृति प्रदान किया और उसके शरीर को भोजन देकर पुष्ट भी किया|स्त्री ही सम्पूर्ण राष्ट्र की जननी है|वेदों के राष्ट्र सूक्त में नारी की ही वंदना हुई है|माता भूमी पुत्रोऽहं पृथिव्याः, अर्थात धरती मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूँ|इन सभी में नारीत्व ही तो गुंजित हुआ है|मैंने कभी भी स्वतंत्रता का विरोध नहीं किया किन्तु स्वछंदता का सदैव विरोधी रहा हूँ|स्त्री और पुरुष दोनों को ही अपनी मर्यादा में रहना चाहिए और यही एक स्वस्थ्य और सबल समाज की मुलभुत अनिवार्यता है|आपका कोटिशः आभारी हूँ|जय भारत, जय भारती||

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अनीता जी... मेरे इस आलेख में आपको हस्यास्पद जैसा भी कुछ लगा यह जानकार मन को अतीव प्रसन्नता हुई...दिखों से भरे इस संसार में यदि कुछ पल हंसी के भी मिल जाएँ तो निःसंदेह जीवन का खिसकना कुछ सुगम हो जाता है|क्रूर व्यक्तव्यों से सज्जित है इसमें कोई दोराय नहीं|जिनको स्वत्व का बोध है वही प्रतिशोध भी लेते हैं|तमाम नहीं बस दो ही धारणा और मान्यता का उद्धरण दिया है...स्त्री विरोध की मानसिकता है ही नहीं तो ध्वनित कहाँ से होगी? शास्त्रोक्त वचन, सामाजिक नीति-नियम, परंपरा, आचरण की शुद्धता, नैतिक चर्या, चारित्रिक शुचिता यह तो अनंत काल से ही दिग्भ्रमित मानवता का पथ प्रदर्शन करते आयें है, इसमें नयी बात क्या है? आप ये समझाने में पूर्णतया असफल रहे हैं कि आखिर स्त्री से ये दुराग्रह क्यूं? स्त्री से तो दुराग्रह पाला ही नहीं| प्राकृतिक स्वतंत्रता से आपका आशय फ्रायडवादी इड से है तो यह पशुओं के स्तर की चीज है| बंदिश भरी जीवनशैली का पालन एक सामाजिक पशु होने के कारण प्रत्येक इंसान (चूँकि मैं इस शब्द के ही विरुद्ध हूँ इसलिए मानव) करता है और करना ही चाहिए| जिस शानदार ढंग से आपने उकेरा है (धन्यवाद)| उसमें कहीं भी स्त्री को इंसान समझने की भूल आपने नहीं की है (लगता है आपने मेरा लेख ही नहीं पढ़ा है| आपकी चातुरी इस बात में अवश्य सामने आयी है कि आपने अपने आक्रोश से अधिकांश लोगों को अभीभूत किया और लोग आपके वाग्जाल की काट कर पाने में अपने को अक्षम पा रहे हैं.(आपके मेरे प्रति इस स्नेह को कोटि कोटि नमन और मैं वास्तव में अभिभूत हुआ)| आपके विचार स्त्री द्रोही, स्त्री को दास समझ उस पर शासन की मंशा रखने वाले, क्रूर, रुढ़िवादी, परंपरावादी और अपनी सीमित दुनियां को ही पूरा संसार समझने की भूल करने वाले तथाकथित राष्ट्रवादी के विचार पेश करते हैं|राष्ट्रवादी तथाकथित ही होता है आपने कोई नयी बात नहीं कहा|कामल है ग्लोबल विलेज के इस दौर में भी दुनिया असीमित है..यह हुई नयी बात|एक दास किसी को क्या दास समझेगा?जिसका अपने मन पर ही शासन नहीं वह किसी और का शासन करने में समर्थ ही नहीं है, फिर जगन्माया पर शासन करने की सामर्थ्य है ही किसके पास?क्रूर यह मैं कब हुआ?रुढिवादी मैं हूँ ही? परम्परावादी कहलाने में गर्व का अनुभव होता है|स्त्री द्रोही मैं कभी रहा ही नहीं| उम्मीद है कि आप कठोर वक्तव्यों का बुरा मानने की बजाय सार्थक संवाद में रुचि लेंगे|मैंने बुरा माना ही नहीं बल्कि मुझे सबसे अच्छी टिप्पडी आपकी लगी और बड़ा मजा आया|सार्थक संवाद जब तक नहीं होगा तब तक निरर्थक प्रलाप नारी के नारीत्व को अंधी कुत्सित पश्चिमी जगत में धकेल कर उसका सम्पूर्ण नाश करते ही रहेंगे..इसलिए सार्थक संवादों के लिए मैं सर्वदा उद्यत हूँ| हॉ, मुझे पूरी उम्मीद है कि शीघ्र ना सही निकट भविष्य में आपके विचार अवश्य परिवर्तित होंगे और आप स्त्री गरिमा को समझ सकेंगे. इति…..मेरे विचार कभी भी परिवर्तित नहीं हो सकते क्योंकि यह पत्थर पर लिखी हुई अमिट इबारत है और नारी गरिमा की रक्षा के लिए सर्वदा कटिबद्ध हूँ...शक्ति मन्त्रों में इति नहीं होती|बिलंबित प्रतिक्रिया के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ|ओं तत्सत|

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प्रिय भाई मुनीश जी.. सादर वन्देमातरम| लगता है आपने चुगली कर ही दिया है..देखिये न ठीक आपकी प्रतिक्रिया के ऊपर अनीता जी ने भी एक शिकायतों भरी पाती चुपके से चिपका दिया है|भाई मैं नारी स्वतंत्रता का विरोधी थोड़े ही हूँ बस स्वछन्दता का एक हल्का सा प्रतिरोध किया है|मुझे लगता है की यदि कपडे उतारने को ही नारी स्वतंत्रता का सबसे बड़ा इष्ट समझा जाता रहा तो हिंदुस्तान जल्दी ही नगा साधुओं और साध्वियों की बढती हुई जनसँख्या से परेशान हो जाएगा|इन अग्रगामी ओशोवादियों की मंडली की कल्पना मात्र से ही सिहर उठता हूँ क्या करूँ परम्परावादी हूँ न|आपकी गुदगुदाती प्रतिक्रिया का आभार|जय भारत, जय भारती||

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स्नेही पुंज जी.. सादर वन्देमातरम| धुरंधर हास्य महोत्सव के बाद आपसे मुलाक़ात नहीं हो पायी तो भी आपकी प्रतिक्रिया का मेरे लिए ख़ासा महत्व है|आप मेरे सहपाठी होने के कारण मुझे अन्य लोगों की अपेक्षा काफी निकट से जानते हैं|खैर, वह सब बातें और कभी|आपकी प्रतिक्रिया ने मुझे गदगद कर दिया|देह को मात्र एक माध्यम मानने के कारन बस किसी तरह से जीवन यापन होता रहे यही बहुत है|राष्ट्रिय स्तर पर जो कुछ भी घट रहा है अथवा घटाया जा रहा है वह सब एक दूसरे से सम्बंधित है|छोटे छोटे समूहों ने सत्ता की खासी मज्ज्मत की है|दिग्विजय बौखला गए हैं और पशु का बौखलाना किसी भी तरह से मानवीय हित में नहीं होता|एक श्वेत वस्त्र धारी कल्पित महापुरुष का भारतीय जन जीवन पर बड़ी तेजी से नियंत्रण होता जा रहा है|युरोप ने भारतीय साडी धारण कर लिया है और पगड़ी मूक होने का अभिनय करता हुआ राष्ट्र को बेचने के लिए उद्यत है|आपका कोटिशः आभार|जय भारत, जय भारती|

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आदरणीय विनीता जी| प्रणाम| आपकी प्रतिक्रिया और प्रोत्साहन से अभिभूत हुआ|इस देश में आदिकाल से ही नारी की प्रतिष्ठा रही है और रहेगी|मैं स्वतः जगज्जननी महाकालिका का उपासक हूँ और मैं गर्व के साथ कहता हूँ की मेरी भगवान ही एक महिला हैं और अनंत कोटि ब्रम्हांड की रचयिता, संरक्षिका और हन्त्री भी|किन्तु मर्यादा का तो उद्घोष उन्होंने ही किया है| विद्या समस्तास्तव देवी भेदाः, स्त्रिया समस्ता सकला जगत्सु| त्वयैकया पूरीतमंब येतत, का ते स्तुति स्तव्यपरा परोक्ति| अर्थात हे देवी समस्त विद्याएँ तेरे ही विविध भेद हैं, हे अम्बे! समग्र विश्व की समस्त स्त्रियों में तुम ही विराजती हो|वह कौन सी स्तुति है जिससे तुम्हारी उपासना की जा सके, वस्तुतः तुम शब्दों के भी परे हो| जय भारत, जय भारती|

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आदरणीय निशा जी, चरण स्पर्श| समग्र नारी जाती कभी भी अतिवादी नहीं होती|मैंने बचपन में अपनी दादी का अपने माँ पर होने वाला अत्याचार देखा है और उन्ही की बहन का मेरे माता के प्रति अपार स्नेह भी|दोनों ही प्रकार के विपरीत ध्रुव मेरे जिंदगी में एक साथ रहे हैं|विपत्ति के समय ने मुझे उग्र बनाया है और मेरी माता ने मुझे प्रचंड धार्मिक..अब अगर कोई मुझे रुढिवादी कहता है तो यह मेरी माँ की शिक्षाओं का अपमान है|मैंने उन्हें अकेले ही घर का सारा काम करते हुए देखा है और बाहर की जिम्मेदारियां भी उन्होंने बखूबी संभाली मेरी पत्नी का चयन उन्होंने ही किया और मैं इस चयन का आजीवन ऋणी रहूँगा|कहने का आशय यह है की यदि मेरी माँ पूरे पुरुष वर्ग की शत्रु होती तो मेरी शिक्षा दीक्षा तो दूर की कौड़ी है मेरी कोई वैचारिकी ही न बन पाती, दुसरी ओर यदि मेरे पिताजी की मौसी भी मेरे माँ की शत्रु होती तो उन्हें रहने का कोई आश्रय ही न मिल पाता|कुछ लोगों के विचारों से मैं अपना विचार नहीं परिवर्तित कर सकता|आपकी संतुलित प्रतिक्रिया का सादर अभिवादन|जय भारत, जय भारती|

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प्रिय राज भाई... सादर वन्देमातरम... एक कहावत है...जर, जोरू और जमीं के लिए युद्ध हो जाता है|अब उन्मुक्त नारीवाद इसकी क्या व्याख्या करेगा यह तो मुझे नहीं पता किन्तु मैं नारीवाद में ही दो स्पष्ट अंतर देखता हूँ|पहला, विवेक पर आधारित सार्थक नारीवाद अथवा आध्यात्मिक नारीवाद और दूसरा उन्मुक्त नारीवाद जो सीमा के अस्तित्व पर प्रश्नचिंह उठाते उठाते स्वयं को इतना सिमित कर देता है की उसके पास अनर्गल देहवाद से अधिक सोचने और समझने को कुछ होता ही नहीं|प्रथम प्रकार का मैं समर्थक हूँ दूसरे प्रकार का घनघोर विरोधी|आपका अपने देह पर पूर्ण अधिकार है और यदि कोई इसका शोषण करता है तो उसे जिन्दा रहने का कोई अधिकार नहीं किन्तु आपका अपने देह पर अधिकार है इसको आधार बनाकर यदि आप स्वयं को मानव बम के रूप में विकसित करने का प्रयास करते हैं, तो उसी क्षण आपका वध होना चाहिए|यह मानना भी की स्त्रियां ही स्त्रियों की घोर शत्रु होती हैं आधा सत्य ही है..यह तो स्वाभाविक है और जन्मजात भी|पुरुष, पुरुष से संघर्ष करता है तो महिलायें महिलायों से क्यों न करें|इसमें जातीयता का कोई सवाल ही नहीं उठता|मेरी पत्नी ने मुझसे मेरे ही बच्चे का लिंग परिक्षण करवाने की जिद की..मैंने प्रथम दृष्टया ही खारिज कर दिया|मैं यह नहीं जानता की अन्य पुरुष ऐसा करते हैं की नहीं|धार्मिक विचारों का होने के कारण भ्रूण हत्या को मैं महापाप समझता हूँ और यह भी मानता हूँ की जो भी इस घृणित कार्य में सहयाग करता है उसके हाँथ का जल पीने से श्रेष्ट स्वतः मृत्यु का वरण करना है|किन्तु शायद यह मातृत्व का बेसिक इंस्टिक्ट है जो नर संतति जनन करने के लिए प्रेरित करता हो|कुल मिलाकर इससे यही बात निकल कर आती है की एक नारी और एक नर एक दुसरे की शत्रु कभी नहीं हो सकती और जो भी इस प्रकार की कृत्रिम शत्रुता को प्रचारित कर रहा है|उसकी मानसिक स्थिति समझ से परे है|जय भारत, जय भारती|

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मनोज जी, हास्यास्पद और क्रूर वक्तव्ययों से सज्जित आपका ये आलेख प्रतिशोध से भरा हुआ है. आपने तमाम ऐसी पूर्व प्रचलित धारणाओं और मान्यताओं के उद्धरण दिए हैं जिनसे केवल स्त्री विरोध मानसिकता ध्वनित होती है. शास्त्रोक्त वचन, सामाजिक नीति-नियम, परंपरा, आचरण की शुद्धता, नैतिक चर्या, चारित्रिक शुचिता के लिए आपने अपने आलेख में तमाम बल दिया किंतु आप ये समझाने में पूर्णतया असफल रहे हैं कि आखिर स्त्री से ये दुराग्रह क्यूं? प्राकृतिक स्वतंत्रता से बिलकुल विपरीत एक बंदिश भरी जीवनशैली को जिस शानदार ढंग से आपने उकेरा है उसमें कहीं भी स्त्री को इंसान समझने की भूल आपने नहीं की है. आपकी चातुरी इस बात में अवश्य सामने आयी है कि आपने अपने आक्रोश से अधिकांश लोगों को अभीभूत किया और लोग आपके वाग्जाल की काट कर पाने में अपने को अक्षम पा रहे हैं. अन्यथा आपके विचार स्त्री द्रोही, स्त्री को दास समझ उस पर शासन की मंशा रखने वाले, क्रूर, रुढ़िवादी, परंपरावादी और अपनी सीमित दुनियां को ही पूरा संसार समझने की भूल करने वाले तथाकथित राष्ट्रवादी के विचार पेश करते हैं. उम्मीद है कि आप कठोर वक्तव्यों का बुरा मानने की बजाय सार्थक संवाद में रुचि लेंगे. हॉ, मुझे पूरी उम्मीद है कि शीघ्र ना सही निकट भविष्य में आपके विचार अवश्य परिवर्तित होंगे और आप स्त्री गरिमा को समझ सकेंगे. इति.....

के द्वारा: Anita Paul Anita Paul

स्नेही राजकमल जी... सादर वन्देमातरम| आपके कथन से अधिकांश में सहमत हूँ...मनोविज्ञान का एक विद्यार्थी होने के नाते मैं जोर देकर कहता हूँ की बलात्कार एक स्त्री के चरित्र ही नहीं बल्कि उसके स्वत्व का सम्पूर्ण हनन है और बलात्कारी को मृत्युदंड से कम तो किसी भी परिस्थिति में नहीं देना चाहिए किन्तु समस्या का सर्वाधिक दुखद पहलू यह है की बलात्कारी, समाज अथवा स्वयं बलात्कार की पीडिता इसको आधार बना कर सनातन मूल्यों पर कुठारघात क्यों करेगा? और क्या प्रत्येक समस्या के लिए धर्म और भगवन को दोष देना किसी भी दृष्टि से न्यायसंगत है? वैसे भी मैंने प्रस्तुत लेख में बलात्कार की ओर मात्र एक इशारा भर किया है|बलात्कार का समग्र विवेचन कई परिस्थितियों पर निर्भर करता है|मैं तो इसे एक हत्या ही समझता हूँ और उसी नजरिये से इस पर विचार किया जाना उचित भी है|बहुत से ऐसे भी मामले हैं जब किसी पादरी ने किसी नन का दीर्घकाल तक यौन शोषण किया तो क्या उसकी पीडिता सम्पूर्ण ईसाइयत के विरुद्ध होकर हिंदू अथवा मार्क्सवादी बन गयी| MCC अपने ही महिला कामरेड का यौन सहन करते है...इस तरह के समाचार भी मिडिया प्रभु की कृपा से कभी कभार सुनने को मिल जाती है...तो क्या इस आधार पर वे MCC छोड़कर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल हो जाती हैं|कमाल है समाज को विघटित करने वालों का यौन शोषण अथवा यौन हिंसा अपराध की श्रेणी में नहीं आता क्या? उच्च पद प्राप्त करने के लिए जब कोई महिला स्वतः अपना देह परोसती है..तो क्या यह अपराध नहीं है? मानदंड अलग क्यों? मेरा सवाल न तो महिला है और न ही पुरुष..मेरा प्रश्न है जब सामान कार्य के लिए समान वेतन तो समान अपराध के लिए समान दंड क्यों नहीं? और इस आधार पर चारित्रिक स्वछन्दता को अनुमति क्यों दी जाय? सभी नारीवादी बलात्कार की पीडिता नहीं होती और न ही मुझे नारी के अबाध भ्रमण को प्रतिबंधित करने में मजा आता है किन्तु पश्चिम का माडल नहीं चलेगा|आप स्वतंत्रता का भारतीय माडल लेकर आइये आपका स्वागत है|जय भारत, जय भारती||

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के द्वारा:

प्रिय मित्र चातक जी... आपकी टिप्पडी का आभारी हूँ .....निःसंदेह स्वाध्याय एक दैवीय सम्पदा है जिसका वपन करने के उपरान्त ही कोई ठोस वैचारिक दृष्टिकोण रूपी फसल लहलहा सकती है|गांधी जी का अहम राष्ट्रिय अहम से बड़ा नहीं हो सकता और होना भी नहीं चाहिए|स्वाध्याय स्व को अक्षुण्ण रख के होना चाहिए और मैं जानता हूँ आपका स्व इतना अटल है जितना की हिमालय|दार्शनिक दृष्टि से हीगल का अनुकरण करने के कारण thesis और antithesis के बाद ही synthesis की प्रवृत्ति रखने वाला मैं गांधी के साथ ही सावरकर और सुभाष के अध्ययन का भी अनुरोध करता हूँ|साथ ही गाढ़ी जी द्वारा रचित हिंद स्वराज, ब्रम्हचर्य और अहिंसा पर उनके लेखन का और समय समय पर पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित उनके निबंध और सम्पादकीय दृष्टव्य हैं|मुखिया मुख को चाहिए खान पान को एक, पाले पोसे सकल जग तुलसी सहित विवेक|

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भ्राता श्री ...कुछ मत पूछिए बस ह्रदय की वह गति हुई की शब्दों से बयां नहीं किया जा सकता ...कैफे में बैठे हुए लोग भौचक हैं...यह इसको हो क्या गया है?आँखों से टपटप आंसू और उंगलियाँ की बोर्ड पर|जयशंकर प्रसाद जी की यह अमर रचना मैंने पहली बार पढ़ी हैं और नन्हकू के चरणों पर लोटने का मन करने लगा|प्रसाद जी के गुंडा शब्द की व्याख्या से तो मैं पहले ही परिचित हूं|जिस देश में धर्म और सक्न्स्कृति की रक्षा करने वाले ऐसे बिना दाम के सेवक हों|मानवता की रक्षा करने वाले गुंडे हों उस देश की ओर कोई आँख उठा कर भी नहीं देख सकता|धन्य हैं उस युग की भैरवी जिन्होंने नन्हकू के पवित्र रक्त का पान किया होगा और फिर आक्रताओं की ओर रोष में भरकर उनकी भृकुटी वक्र हुई होगी|आज तो रणचंडीका एक एक बूंद को तरसती हैं|वर्तमान में तो ऐसा लगता है की जैसे पूरा देश ही हिजड़ा हो गया है|जय भारत, जय भारती

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प्रिय मित्र वाहिद जी, सादर वन्देमातरम| मेरा इस मंच पर पुनरागमन मात्र कांटेस्ट के लिए ही नहीं है| हम सभी तो एक सूत्र में ही पिरोये हुए हैं|आपसे आपेक्षा है की आप भी इस कांटेस्ट में भाग ले, कारण मैं तो कांटेस्ट को एक चुनौती मानता हूँ...और चुनौती मानकर ही इसे स्वीकार किया है|पिछले कांटेस्ट में प्रिय मित्र चातक जी और आदरणीय निशा जी का विजयी होना ही यह सिद्ध करता है की युद्ध हो या प्रेम राष्ट्रवादी ही हमेशा विजयी होते हैं...और होली तो इस प्रेममय जगत की सर्वोच्च भारतीय अभिव्यक्ति है|वसंतोत्सव से लेकर होली तक पूरा एक माह तक चलने वाली पवित्र प्रेम की यह विशुद्ध भारतीय अभिव्यक्ति अंतर्राष्टीय स्तर पर भी विख्यात है....जागतिक से पराजागतिक तक|जय भारत जय भारती

के द्वारा: atharvavedamanoj atharvavedamanoj

मनोज कुमार! मुझे सबसे पहले यह बताओ कि आप किस अनुवादक के नुस्ख़े से हवाले(सन्दर्भ) दे रहे हैं? क्यों कि हिन्दी में आज तक किसी भी सुन्नी आलिम का अनुवाद उपलब्ध नहीं है.आलमे सुन्नियत में आलाहज़रत इमाम अहमद रज़ा के उर्दू अनुवाद जिसका हिन्दी रूपांतर सैयद आलेरसूल हसनैन मियां का कलामुर रेहमान के नाम से बरकाती पब्लिशर(मुंबई) के द्वारा प्रकाशित हुआ है वो ही एक मान्य हिन्दी रूपांतर है.देवबन्दी आलिमों ने कुराने पाक के अनुवाद में तो हद करदी है! हराम को हलाल ओर हलाल को हरम! जाइज़ को नाजाइज़ ओर नाजाइज़ को जाइज़! मअज़ल्लाह अम्बिया को आम आदमी जैसा लिख दिया है देवबन्दियों ने.न जाने क्या-क्या अनुवाद कर बेठे हैं ये लोग.गैरे-सुन्नी आलिमों के अनुवाद हमारे लिए अस्वीकृत है. महत्व की बात तो यह है की ये लोग ही गैर मुस्लिमों के हाथों में कुरान जैसी मुक़द्दस किताब (जो सिर्फ किताब नहीं है अल्लाह का कलाम है) थमा देते हैं.जिसको आम मुसलमान समझने में असमर्थ हैं.जिसे समझ ने के लिए मुसलमान मदरसे में जाकर हदीस सीखते हैं,अरबी ग्रामर, शाने नुज़ूल(क्यों ओर किसके लिए), ओर फ़िक़ह सीखते हैं तब जाकर कहीं कुराने पाक का ज्ञान सीख पाते हैं. तो भला कोई गैर-मुस्लिम को कुरान दे भी दीया जाए तो उस से वो फायदा नहीं उठा सकता क्यों कि कुरान ईमान वालों के लिए हिदायत(निर्देश) है.ziyada jaankaari ke liye mera blog:www.haqaaya.blogspot.com dekh sakte hain.....

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मनोज कुमार! मुझे सबसे पहले यह बताओ कि आप किस अनुवादक के नुस्ख़े से हवाले(सन्दर्भ) दे रहे हैं? क्यों कि हिन्दी में आज तक किसी भी सुन्नी आलिम का अनुवाद उपलब्ध नहीं है.आलमे सुन्नियत में आलाहज़रत इमाम अहमद रज़ा के उर्दू अनुवाद जिसका हिन्दी रूपांतर सैयद आलेरसूल हसनैन मियां का कलामुर रेहमान के नाम से बरकाती पब्लिशर(मुंबई) के द्वारा प्रकाशित हुआ है वो ही एक मान्य हिन्दी रूपांतर है.देवबन्दी आलिमों ने कुराने पाक के अनुवाद में तो हद करदी है! हराम को हलाल ओर हलाल को हरम! जाइज़ को नाजाइज़ ओर नाजाइज़ को जाइज़! मअज़ल्लाह अम्बिया को आम आदमी जैसा लिख दिया है देवबन्दियों ने.न जाने क्या-क्या अनुवाद कर बेठे हैं ये लोग.गैरे-सुन्नी आलिमों के अनुवाद हमारे लिए अस्वीकृत है. महत्व की बात तो यह है की ये लोग ही गैर मुस्लिमों के हाथों में कुरान जैसी मुक़द्दस किताब (जो सिर्फ किताब नहीं है अल्लाह का कलाम है) थमा देते हैं.जिसको आम मुसलमान समझने में असमर्थ हैं.जिसे समझ ने के लिए मुसलमान मदरसे में जाकर हदीस सीखते हैं,अरबी ग्रामर, शाने नुज़ूल(क्यों ओर किसके लिए), ओर फ़िक़ह सीखते हैं तब जाकर कहीं कुराने पाक का ज्ञान सीख पाते हैं. तो भला कोई गैर-मुस्लिम को कुरान दे भी दीया जाए तो उस से वो फायदा नहीं उठा सकता क्यों कि कुरान ईमान वालों के लिए हिदायत(निर्देश) है. देवबन्दी आलिमों के अनुवादों में बे-हिसाब ख़ामियां मोजूद है जिसे साबित करने के लिए आप मेरा ब्लॉग देख सकते हैं.www.haqaaya.blogspot.com

के द्वारा: Muhammad Naaz Muhammad Naaz

के द्वारा:

मनोज जी, आपका लेख बेहतरीन है...... इससे कोई फर्क नहीं पड़ता की हम कौन थे.... कहाँ से आये.... फर्क तो तब पड़ता है जब हम स्वयं को पहचान पायें..... गर्व से कहो हम हिन्दू हैं..... शायद विवेकानंद का पूर्ण चित्रण नहीं है..... क्यूंकि हिन्दू या कोई और .... कोई फर्क नहीं डालता है..... ये सब सम्प्रदाय तो हमारे अहम् के द्योतक हैं..... हर धर्म या जाती स्वयं को श्रेष्ठ कह कर अपने अहम् को पूरित करती है..... सभी श्रेष्ठ हैं क्यूंकि सभी उस इश्वर की रचना हैं..... ‘इस्लामिक शरीर और वेदांती मानसिकता’ जैसा की रशीद भाई कह रहे हैं..... शब्दों का जाल है..... स्वयं का तुस्टीकरण हैं..... जानिए उस विवेकानंद को जिसने खोजा था स्वयं को...... शब्दों को मत पकडिये ये तो कालानुसार, विवेकानुसार अपना अर्थ बदल लेते हें ....... यदि मेरी बातों से किसी को ठेस लगती हो तो क्षमा चाहूँगा..... लेकिन अपनी राय प्रस्तुत करना मै अपना अधिकार समझता हूँ...... धन्यवाद.

के द्वारा: HIMANSHU BHATT HIMANSHU BHATT

प्रिय मित्र मनोज सादर वंदेमातरम ! हम सभी भारतीयों को विवेकानंद से प्रेरणा लेनी चाहिये । आधुनिक युग में जब भारत की पहचान सपेरों हाथियों के देश की थी तब उन्होंने भारत की पहचान एक विश्वगुरू के रूप में शिकागों सम्मेलन में दुनिया को करायी । वह दृष्टि, ऊर्जा रखने वाला अब कोयी युवा नहीं दिखता है । उन्होंने कहा था कि पहले देश है ईश्वर उसके बाद आता है । विवेकानंद जी से प्रेरणा लेकर ही सुभाष बाबू, गांधी-नेहरू से भी अधिक महान हुये । युवा का मतलब है ऊर्जा । दुनिया को बदलने की शक्ति । आज भारत में सबसे अधिक युवा हैं । आज के दिन सभी युवा संकल्प लें कि हम भारत को विश्वशक्ति बनाकर ही दम लेंगे । जय हिंद ।

के द्वारा: kmmishra kmmishra

प्रिय मनोज जी| यूँ तो स्वामी जी भारत वर्ष के जन-जन के हृदय में आरूढ़ हैं... फिर भी एक बार उनका पुण्य स्मरण कराने के लिए आपको सहस्त्र साधुवाद| निशाजी ने भी अपने नवीन लेख में उनका उल्लेख किया है साथ ही शास्त्री जी की पुण्यतिथि पर उन्हें याद करके भावभीनी श्रद्धांजलि देना भी हमारे आपके जैसे काशीवासियों का परम कर्त्तव्य है..| अंततः.. स्वामी जी अभी भी हमारे और आपके जैसे लोगों के बीच जीवित हैं उन्हें पुनः बुलाने या पुकारने की आवश्यकता नहीं| यदि हम आप जैसे लोग एक बार दृढ़ता से ठान लें कि इस का निष्पादन किसी भी मूल्य पर करना है तो वह होकर रहेगा.. बस सहयोग और संयम बनाये रखने की आवश्यकता है हमें... वंदे मातरम!!

के द्वारा: वाहिद काशीवासी वाहिद काशीवासी

के द्वारा: atharvavedamanoj atharvavedamanoj

राशिद भाई कमाल है...आपने भी मुझे गलत समझ लिया....मैं इस बात को अच्छी तरह से समझता हूँ की मेरी रचनाओं को सबसे अधिक हिट आप लोगों की तरफ से मिलती है....यदि मेरी रचना से आपकी भावनाओं को ठेस पहुंची है तो मैं हाँथ जोड़कर आपसे माफ़ी मांगता हूँ....प्रिय मित्र ....आप ही देखो न jahan देखो wahin..जिसे देखों वही बिना कुछ जाने समझे...बिना मतलब के हमारी जीवन प्द्ध्यती को गरियाते मिल जाता है....नेतृत्व तो पूरी तरह अंधा हो चूका है....उसे सही और गलत की कुछ पहचान ही नहीं है....कश्मीर को जान बुझ कर विवादित बनाया जा रहा है...हमारे तर्कसंगत मांग को भी अनसुना करके हमें अपने ही देश में हासिये पर धकेल दिया जा रहा है...ऐसे परिप्रेक्ष्य में मैंने एक कल्पित कट्टरता और कठोरता ओढ़ रखी है तो केवल इसलिए की हमारी बची खुची प्रतिष्ठा धुल धूसरित होने से बच जाए...मैं यह मानता हूँ की भावनाओं के अतिरेक में मैंने कुछ असंगत कहा है लेकिन उसमे कहीं भी निशाना आप लोग नहीं थे...हाँ आपलोगों के कंधे पर बन्दुक रख कर मैंने छद्म धर्मनिरपेक्ष शक्तियों पर अवश्य निशाना लगाया है....मैंने अपने घर में आर्ष ग्रंथों के ही साथ कुरान और गीता भी एक साथ ही रखा हुआ है और तिलावत भी पूरी आचार पद्यति के साथ ही करता हूँ किन्तु हिंदुत्व की कीमत पर मुझे कुछ भी स्वीकार नहीं हैं.....आप अपना धर्म निभाएं और मैं अपना धर्म निभाऊंगा....आप खुदा कहें और मैं राम कहता हूँ लेकिन अगर कोई हमारी आचार पद्यति को मुखौटा कहेगा तो उसके लिए मैं साक्षात् महाकाल ही हूँ .....आपका नजरिया कहीं भी गलत नहीं है रशीद भाई......कट्टरता जहाँ कहीं भी हो उसका कट्टरता के साथ विनाश होना चाहिए....जय भारत, जय भारती

के द्वारा: atharvavedamanoj atharvavedamanoj

के द्वारा: atharvavedamanoj atharvavedamanoj

respected sir u have done a great jobs.i have read ur two article.first is related to kuran and second is this. अब हिंदी में लिखता हूँ जो म्यूजिक ने लिखा ह उस को मई बाद में जवाब दूंगा? सर जी हम हमेशा देखते ए ह जब से २० साल हो गए,हमारे मंदिरों पर हमले हो,चाहे हमारे त्योहारों पर भरी र्सद्को पर विस्फोट हो ,हमारे नेता पाकिस्तान पर आरोप लगाकर शांत हो जाते .भारत एक बहुसंख्यक हिन्दू देश हा,अगर यहाँ कभी मस्जिदों पर विस्फोट क्यों नहीं होती,एड की नमाज पर विस्फोट नहीं होते ह,हम इनकी मस्जिदों इनके इलाके में कभी भी सुरक्षित महसूस नहीं कर सकते ह. अप कही पर ही सरे देश में देख लेना जहा हिन्दू मजोरिटी में ह ,वहा पर चाहे एक मुसल मन परिवार आराम से रह सकता ह,पर अप उल्टा करना शायद हजारो में कोई एक मुस्लमान क़स्बा या मोहल्ला होगा जहा पर कोई हिन्दू परिवार इज्जत और सम्मान के साथ रहता हो.सच तो ये ह की हम अपने देश में ही गुलाम सिर्फ अपने लोगो की वजह से.क्या यादवो के कृष्ण राम से अलग ह,कांग्रेस वाले हिन्दुओ के भगवन अलग ह,बसपा क अलग ह .यार हम अज भी वैसे ही है जैसे गोरी और गजनवी के टाइम पर थे.हम अगर हिन्दू होने की बात करे तो कट्टरपंथ है.और ये मस्जिदों और मदरसों से अन्तंक्वादी पैदा करता रहे. ये सिलसिला चलता रहा तो एक पाकिस्तान २०२५ तक पैदा हो जायेगा.

के द्वारा:

प्रिय मनोज जी, मान गए आपके अध्ययन की क्षमता को ! बस इतना कहना चाहूंगा कि विवाद खोजने चलेंगे तो आँख खोलने की जरूरत भी नहीं बंद आँखों से शुरू कर दो अंतहीन विवाद मिल जाएगा और सत्य को तलाश करोगे तो मंथन करना पड़ेगा| सत्य मोम के बने कल्पनाओं के परों पर उड़ने से नहीं मिलता इसे आज आपने सिद्ध किया| वस्तुतः शब्दों में भेद करना सिर्फ एक फितूरी ललक ही हो सकती है जबकि किसी शब्द से आशय पूर्णतः स्पष्ट हो रहा हो| हिन्दू नाम चाहे हमें सिन्धु नदी से मिला हो या जलनिधि से हमारे दो दोनों पूज्य हैं इसलिए हिन्दू शब्द भी सम्माननीय है चाहे माता (नदी) से जुड़ा हो या गुरु (जलनिधि) से| उदाहरणों से भरी इस पोस्ट पर बधाई!

के द्वारा: chaatak chaatak

beta ahmad khan tum bahut bol rahe ho shayad tumhe kuch pata to hai nahi bus faltu ki bak bak kar rahe ho ye sayed tumhari galat fhmi hai ki hindu word kuran se aya balki sach to yeh he ki kuran hindu dharm se uttpan hui hai or kuran hi nahi puri duniya me jitne bhi dhram hia na unka aadhar sirf hind dhra hi to hai "Hindu Dhram sarbeSarba" hindu dhram sarbsest hai to iss baat ko yaad rakho ro ha tum jo kuch kuran ki aayto ki baat kar rahe ho to mein tumhe kuch aayte bata deta hu upar bhi likhi hai but fir bhi me bata dtat hiu Full ViewEdit Draft Kuran Ki aayte From: Varun Gupta View Contact To: -------------------------------------------------------------------------------- ये सटी प्रथा पहले अपने मन से लडकिय करती थी.बाद में इसको बंद करा दिया gaya इस्लाम धर्म चोधकर किसी भी के धर्म ग्रन्थ में दुसरे के मजहब के बारे में उल्टा नहीं लिखा.हिन्दू में कंही ये नहीं लिखा की गई गैर हिन्दू को मारो,यहूदी में नहीं लिखा गैर यहूदी को क़त्ल करो ,निचे एक से मेने कुछ पढ़ा था जो कुछ लिख रहा हु.मुझे मालूम नहीं ये सच है या झूट काफिरों पर हमेशा रौब डालते रहो .और मौक़ा मिलकर सर काट दो .सूरा अनफाल -8 :112 2 -काफिरों को फिरौती लेकर छोड़ दो या क़त्ल कर दो . “अगर काफिरों से मुकाबला हो ,तो उनकी गर्दनें काट देना ,उन्हें बुरी तरह कुचल देना .फिर उनको बंधन में जकड लेना .यदि वह फिरौती दे दें तो उनपर अहसान दिखाना,ताकि वह फिर हथियार न उठा सकें .सूरा मुहम्मद -47 :14 3 -गैर मुसलमानों को घात लगा कर धोखे से मार डालना . ‘मुशरिक जहां भी मिलें ,उनको क़त्ल कर देना ,उनकी घात में चुप कर बैठे रहना .जब तक वह मुसलमान नहीं होते सूरा तौबा -9 :5 4 -हरदम लड़ाई की तयारी में लगे रहो . “तुम हमेशा अपनी संख्या और ताकत इकट्ठी करते रहो.ताकि लोग तुमसे भयभीत रहें .जिनके बारेमे तुम नहीं जानते समझ लो वह भी तुम्हारे दुश्मन ही हैं .अलाह की राह में तुम जो भी खर्च करोगे उसका बदला जरुर मिलेगा .सूरा अन फाल-8 :60 5 -लूट का माल हलाल समझ कर खाओ . “तुम्हें जो भी लूट में माले -गनीमत मिले उसे हलाल समझ कर खाओ ,और अपने परिवार को खिलाओ .सूरा अन फाल-8 :69 6 -छोटी बच्ची से भी शादी कर लो . “अगर तुम्हें कोई ऎसी स्त्री नहीं मिले जो मासिक से निवृत्त हो चुकी हो ,तो ऎसी बालिका से शादी कर लो जो अभी छोटी हो और अबतक रजस्वला नही हो .सूरा अत तलाक -65 :4 7 -जो भी औरत कब्जे में आये उससे सम्भोग कर लो. “जो लौंडी तुम्हारे कब्जे या हिस्से में आये उस से सम्भोग कर लो.यह तुम्हारे लिए वैध है.जिनको तुमने माल देकर खरीदा है ,उनके साथ जीवन का आनंद उठाओ.इस से तुम पर कोई गुनाह नहीं होगा .सूरा अन निसा -4 :3 और 4 :24 8 -जिसको अपनी माँ मानते हो ,उस से भी शादी कर लो . “इनको तुम अपनी माँ मानते हो ,उन से भी शादी कर सकते हो .मान तो वह हैं जिन्होंने तुम्हें जन्म दिया .सूरा अल मुजादिला 58 :2 9 -पकड़ी गई ,लूटी गयीं मजबूर लौंडियाँ तुम्हारे लिए हलाल हैं . “हमने तुम्हारे लिए वह वह औरते -लौंडियाँ हलाल करदी हैं ,जिनको अलाह ने तुम्हें लूट में दिया हो .सूरा अल अह्जाब -33 :50 10 -बलात्कार की पीड़ित महिला पहले चार गवाह लाये . “यदि पीड़ित औरत अपने पक्ष में चार गवाह न ला सके तो वह अलाह की नजर में झूठ होगा .सूरा अन नूर -24 :१३ 11 -लूट में मिले माल में पांचवां हिस्सा मुहम्मद का होगा . “तुम्हें लूट में जो भी माले गनीमत मिले ,उसमे पांचवां हिस्सा रसूल का होगा .सूरा अन फाल- 8 :40 12 -इतनी लड़ाई करो कि दुनियामे सिर्फ इस्लाम ही बाकी रहे . “यहांतक लड़ते रहो ,जब तक दुनिया से सारे धर्मों का नामोनिशान मिट जाये .केवल अल्लाह का धर्म बाक़ी रहे.सूरा अन फाल-8 :39 13 -अवसर आने पर अपने वादे से मुकर जाओ . “मौक़ा पड़ने पर तुम अपना वादा तोड़ दो ,अगर तुमने अलाह की कसम तोड़ दी ,तो इसका प्रायश्चित यह है कि तुम किसी मोहताज को औसत दर्जे का साधारण सा खाना खिला दो .सूरा अल मायदा -5 :89 14 – इस्लाम छोड़ने की भारी सजा दी जायेगी . “यदि किसी ने इस्लाम लेने के बाद कुफ्र किया यानी वापस अपना धर्म स्वीकार किया तो उसको भारी यातना दो .सूरा अन नहल -16 :106 15 – जो मुहम्मद का आदर न करे उसे भारी यातना दो “जो अल्लाह के रसूल की बात न माने ,उसका आदर न करे,उसको अपमानजनक यातनाएं दो .सूरा अल अहजाब -33 :57 16 -मुसलमान अल्लाह के खरीदे हुए हत्यारे हैं . “अल्लाह ने ईमान वालों के प्राण खरीद रखे हैं ,इसलिए वह लड़ाई में क़त्ल करते हैं और क़त्ल होते हैं .अल्लाह ने उनके लिए जन्नत में पक्का वादा किया है .अल्लाह के अलावा कौन है जो ऐसा वादा कर सके .सूरा अत तौबा -9 :111 17 -जो अल्लाह के लिए युद्ध नहीं करेगा ,जहन्नम में जाएगा . “अल्लाह की राह में युद्ध से रोकना रक्तपात से बढ़कर अपराध है.जो युद्ध से रोकेंगे वह वह जहन्नम में पड़ने वाले हैं और वे उसमे सदैव के लिए रहेंगे .सूरा अल बकरा -2 :217 18 -जो अल्लाह की राह में हिजरत न करे उसे क़त्ल करदो जो अल्लाह कि राह में हिजरत न करे और फिर जाए ,तो उसे जहां पाओ ,पकड़ो ,और क़त्ल कर दो .सूरा अन निसा -4 :89 19 -अपनी औरतों को पीटो. “अगर तुम्हारी औरतें नहीं मानें तो पहले उनको बिस्तर पर छोड़ दो ,फिर उनको पीटो ,और मारो सूरा अन निसा – 4 :34 20 -काफिरों के साथ चाल चलो . “मैं एक चाल चल रहा हूँ तुम काफिरों को कुछ देर के लिए छूट देदो .ताकि वह धोखे में रहें अत ता.सूरा रिक -86 :16 ,17 21 -अधेड़ औरतें अपने कपडे उतार कर रहें . “जो औरतें अपनी जवानी के दिन गुजार चुकी हैं और जब उनकी शादी की कोई आशा नहीं हो ,तो अगर वह अपने कपडे उतार कर रख दें तो इसके लिए उन पर कोई गुनाह नहीं होगा .सूरा अन नूर -24 :60

के द्वारा:

वास्तव में मनोज जी............. आपकी इस कविता ने उन दिनों की याद ताज़ा कर दी जब हम किसी काम को अच्छे काम को करने के बदले चवन्नियां ईनाम के तौर पर घर वालों से कभी पा जाते थे....... वो सुख जो उस चवन्नी में था वो आज 500 के नोट में नहीं है.............. और जहाँ तक आपके करोर्पति बन्ने का ख्वाब था......... वो तो अब भी पूरा हो सकता हैं............ लोगों ने सारी पुरानी चवन्नियां उसी तरह गंगा और अन्य मोक्षदयानी नदियों में प्रवाहित कर दी हैं.............. जैसे उन्होंने अपने पुराने संस्कार व संस्कृति कहीं बहा दिए............. अब आगरा आप इन चवन्नियों को किसी पुरातत्व संग्रहालय में ले जाएँ तो आप फिर करोडपति बन सकते हैं......... सुन्दर कविता के लिए हार्दिक बधाई..................

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani Piyush Pant, Haldwani